असम के रहने वाले गोपेन राय ने छोटे किसानों की बड़ी समस्या का एक बहुत ही सस्ता और असरदार हल निकाला है. पारंपरिक तरीके से अनाज की सफाई यानि ओसावनी करने में बहुत मेहनत लगती है और किसान को हवा चलने का इंतज़ार करना पड़ता है, जिससे वक्त और सेहत दोनों का नुकसान होता है. गोपेन ने म कम लागत में एक लकड़ी का ओसावनी यंत्र तैयार किया है, जो बिजली के पंखे की मदद से चलता है.
Mushroom Farming Story: खास बात यह है कि पप्पू देवी की यह सफलता सिर्फ उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने तक सीमित नहीं है. वे अब अपने गांव की अन्य स्थानीय महिलाओं को भी रोजगार उपलब्ध करा रहीं हैं. उनका यह मॉडल स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और ग्रामीण महिलाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन गया है.
पंजाब के तरनतारन के हरप्रीत सिंह ने अपनी मेहनत और आधुनिक तकनीक के मेल से डेयरी फार्मिंग की दुनिया में एक नई 'इबारत' लिखी है. जहां लोग खेती को मुश्किल समझते थे, वहां उन्होंने AI के जरिए पशुओं की ऐसी देखभाल की कि बीमारियां पास भी नहीं फटकतीं. आज उनके फार्म पर साफ-सफाई और अनुशासन का वो आलम है कि दूध की शुद्धता देख बड़ी कंपनियां भी मुरीद हो गई हैं. चारे के लिए उन्होंने खुद का 'पौष्टिक खजाना' तैयार किया है, जिससे पशु साल भर तंदुरुस्त रहते हैं. कमाल की बात यह है कि इतनी बड़ी तादाद में मवेशियों को वे चंद मजदूरों के साथ 'स्मार्ट मैनेजमेंट' के जरिए बखूबी संभाल रहे हैं. हरप्रीत की यह कामयाबी देखकर अगर किसान नई सोच अपनाएं, तो डेयरी का पेशा वाकई तरक्की और खुशहाली का रास्ता बन सकता है.
UP News: घर की आर्थिक जिम्मेदारी उठाते हुए बुंदेलखंड की महिलाएं अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला रहीं हैं, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बना रहीं हैं और सामाजिक रूप से भी सशक्त हो रहीं हैं. जो महिला पहले घर की दहलीज तक सीमित थीं, आज वे ग्राम स्तरीय बैठकों में निर्णय ले रहीं हैं.
स्नातक तक पढ़ीं विनीता 14 सदस्यीय संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी निभा रही थीं. पति अविनाश के साथ मिलकर वे 10-12 पशुओं के जरिए कार्य करती थीं, लेकिन निजी डेयरियों पर निर्भरता के कारण उन्हें समय पर और उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। इससे आय सीमित थी.
बुलंदशहर की रहने वाली कृष्णा यादव की कहानी एक मिसाल है कि कैसे लगन और हौसले से किस्मत बदली जा सकती है. एक वक्त था जब घर की माली हालत इतनी खराब थी कि उन्हें अपना मकान तक बेचना पड़ा. मजबूरी में वे दिल्ली आईं और दूसरों के खेतों में मजदूरी करने लगीं. लेकिन उनके दिल में कुछ बड़ा करने का जज्बा था. महज 500 रुपये से शुरू हुआ उनका सफर आज कई करोड़ों के टर्नओवर तक पहुंच चुका है.
UP News: इसके लिए 6 एकड़ में खुद गन्ने की खेती करतीं हैं और अन्य किसानों से भी गन्ना खरीदतीं हैं. उनका उत्पाद उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी सप्लाई हो रहा है. यह न केवल उनके व्यवसाय की सफलता को दर्शाता है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर बने उत्पादों की बढ़ती मांग को भी साबित करता है.
पटना के अनुभवी किसान अमरजीत कुमार सिन्हा ने आम और अमरूद जैसे रसीले फलों को 'फल मक्खी' के जानलेवा हमले से बचाने के लिए एक बेहद सस्ता और 'असरदार' देसी जुगाड़ निकाला है. अक्सर ये मक्खियां फलों को अंदर से सड़ा देती हैं, जिससे बागवानों को 90 फीसदी तक का भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इस समस्या के 'मुकम्मल' समाधान के लिए उन्होंने पके हुए केलों और बेकार प्लास्टिक की बोतलों से एक 'कीट जाल' तैयार किया है जिससे फल मक्खी खिंची चली आती हैं और जाल में फंसकर मर जाती हैं.
कानपुर देहात के रामशरण वर्मा की किस्मत सुकर पालन से बदल चुकी हैं. कम लागत में बड़ा मुनाफा देने वाला यह बिजनेस अब तेजी से किसानों की आय को दोगुना करने का साधन बन रहा है. आइए जानते हैं इनकी सफलता की कहानी.
Milk Production in UP: इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिली है और महिलाओं की आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं 6 हजार से अधिक गांवों की महिलाएं इस अभियान से जुड़कर अभूतपूर्व प्रगति कर रही हैं. जबकि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से संगठित होकर ये महिलाएं दुग्ध संग्रहण, प्रोसेसिंग और विपणन तक की पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.
आजकल गर्मी के मौसम में जब पारा 45 डिग्री के पार पहुंच जाता है, तो इंसान का बाहर निकलना दूभर हो जाता है. उन किसानों की हालत की कल्पना कीजिए जिनकी कमाई पान की कोमल बेलों पर टिकी है. पान का पत्ता इतना नाजुक होता है कि लू की एक ही लहर उसे पूरी तरह जलाकर राख कर देती है. बिहार के श्याम सुंदर ने एक खास तकनीक से एक देसी ढांचा खड़ा किया, जिससे न झुलसेंगे पत्ते, न होगी बीमारी और पान की पैदावार चार गुना बढ़ जाएगी.
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