राजस्थान के अलवर में एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी ने पारंपरिक खेती से हटकर चंदन की खेती शुरू की. उन्होंने YouTube और सोशल मीडिया से खेती की जानकारी जुटाई और अपने खेत में 300 पौधे लगाए. उनके प्रयास से अब अलवर और आसपास के इलाकों में 10 हजार से ज्यादा चंदन के पौधे लगाए जा चुके हैं.
Amroha Farmer Story: हितेश चौधरी ने बताया कि इन उत्पादों के पीछे 3,000 किसानों और 1,000 ग्रामीण महिलाओं की कड़ी मेहनत जुड़ी है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में बदलाव लाते हुए उन्होंने कोलकाता से टिश्यू कल्चर पौधे लाकर 120 हेक्टेयर में 'एडवांस ताइवान पिंक अमरूद' की खेती कराई.
जशपुर के किसान महेंद्र कुमार यादव ने PM कृषि सिंचाई योजना से मिले 38 हजार रुपये के अनुदान का लाभ लेकर मिर्च की खेती 50 डिसमिल से बढ़ाकर एक एकड़ में की.उन्नत खेती और बेहतर सिंचाई प्रबंधन से इस वर्ष करीब 1 लाख रुपये की शुद्ध आय अर्जित की.
बिहार के जमुई के किसान चंद्रिका मंडल ने सिर्फ 2 एकड़ जमीन में पारंपरिक खेती के साथ बटन मशरूम की खेती शुरू की है. प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक की मदद से उन्होंने मशरूम उत्पादन को आमदनी बढ़ाने के नए विकल्प के तौर पर अपनाया है.
हरियाणा के नूंह जिले में किसान अब गेहूं-सरसों जैसी पारंपरिक फसलों के बजाय सब्जियों की खेती से अच्छी कमाई कर रहे हैं. खासकर अगेती मूली की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है.
Farmer Success Story: सतीश के मुताबिक, बरसात के मौसम में अधिक नमी के कारण थ्रिप्स, माइट, डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू जैसी समस्याओं का खतरा रहता है. ऐसे मौसम में फसल की नियमित निगरानी और उचित देखभाल जरूरी होती है.
घर से मशरूम उत्पादन शुरू कर मिथिला दीदी हर महीने करीब ₹50 हजार की कमाई कर रही हैं.बेहतर गुणवत्ता और स्थानीय बाजार में बढ़ती मांग ने उनके कारोबार को नई पहचान दी है.उनकी सफलता ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायक मिसाल बन गई है.
महासमुंद के किसान नारायण प्रसाद वर्मा ने धान के साथ करेले की खेती शुरू कर अपनी आमदनी बढ़ाई.राष्ट्रीय बागवानी मिशन की मदद और ड्रिप-मल्चिंग जैसी तकनीकों से उन्हें एक एकड़ में करीब 12 टन करेला मिला और खर्च निकालकर ₹1.07 लाख का शुद्ध लाभ हुआ.
लंदन की नौकरी छोड़कर भारत लौटे केमिकल इंजीनियर शुभम सिंह ने खेतों की पराली को अपना बिजनेस मॉडल बना लिया. मुरैना के क्रास्ट स्टार्टअप में पराली से पेपर, पैकेजिंग और ग्रीन बोर्ड तैयार किए जा रहे हैं. इससे किसानों को पराली से कमाई का मौका मिल रहा है.
सोनभद्र की निर्मला की कहानी बताती है कि सही अवसर और सरकारी मदद मिले तो गांव की महिलाएं भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं. कभी मजदूरी करने वाली निर्मला आज स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपना कारोबार चला रही हैं और सालाना करीब ढाई लाख रुपये कमा रही हैं.
बिहार में मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का नया रास्ता खोल रही है. योजना की मदद से हजारों महिलाएं अपना कारोबार शुरू कर रही हैं. गया की पल्लवी डायपर और सेनेटरी नैपकिन बना रही हैं, तो अरवल की आरती सिलाई सेंटर चलाकर परिवार की आमदनी बढ़ा रही हैं.
महाराष्ट्र के जालना जिले में पानी की कमी किसानों के लिए बड़ी चुनौती है. ऐसे में अंबड तालुका के दो किसानों ने पारंपरिक खेती से हटकर ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की. कम पानी में खेती के इस प्रयोग से दोनों किसानों को लाखों रुपये की आमदनी की उम्मीद है.
बस्तर की महिलाओं ने ऑर्गेनिक काजू और गुड़ से बिना शक्कर वाली खास काजू-कतली तैयार की है. वन धन विकास केंद्र, बकावंड की स्व-सहायता समूह की महिलाओं के इस नवाचार को वन मंत्री केदार कश्यप ने सराहा.बस्तर दशहरा और दीपावली पर ‘संजीवनी’ आउटलेट के जरिए इसकी बिक्री की तैयारी है.
Lakhimpur Kheri Story: प्रिन्सी ने बताया कि व्यवसाय शुरू होने के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव आया है. वर्तमान में वह अपने स्नैक्स निर्माण व्यवसाय से हर महीने लगभग 40 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं. यह आय उनके परिवार के लिए एक मजबूत सहारा बनी है और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी मिला है.
नरसिंहपुर के गाडरवारा में युवा उद्यमी सोहिल मंसूरी ने पराली को समस्या नहीं, बल्कि कमाई और स्वच्छ ऊर्जा का जरिया बना दिया.ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स के जरिए कृषि अवशेषों से बायोमास पेलेट तैयार किए जा रहे है. इस पहल से किसानों को अतिरिक्त आय, युवाओं को रोजगार और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में नई राह मिली है.
सागर के बीना विकासखंड के ग्राम बेलई में किसान विवेक दुबे ने डेढ़ एकड़ में वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद निर्माण इकाई शुरू की है. 40-50 लाख रुपये की लागत वाली इस परियोजना में 100 से अधिक बेड तैयार किए गए हैं और रोजाना 1 टन जैविक खाद उत्पादन का लक्ष्य है.
जबलपुर के युवा हृदेश राय ने कोरोना काल में करीब 12 लाख रुपये सालाना कमाई वाली आईटी नौकरी छोड़कर वर्मी कंपोस्ट का कारोबार शुरू किया। छोटे स्तर से शुरू हुआ यह काम आज करीब 1.5 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर तक पहुंच चुका है। हृदेश ने अकेले कारोबार बढ़ाने के बजाय 26-27 किसानों को अपने साथ जोड़ा और उनकी तैयार वर्मी कंपोस्ट को बाजार उपलब्ध कराया। आज किसानों के नेटवर्क से सालाना 6 हजार टन से ज्यादा वर्मी कंपोस्ट का कारोबार होता है, जिसकी सप्लाई देश के कई राज्यों तक की जा रही है।
ग्राफ्टेड बैंगन की आधुनिक खेती ने किसान सुरेंद्र की कमाई बढ़ाने का नया रास्ता खोला.144 क्विंटल बैंगन उत्पादन से उन्हें ₹2.39 लाख का शुद्ध लाभ हुआ। कम लागत में बेहतर उत्पादन और अच्छी आमदनी के लिए ग्राफ्टेड तकनीक किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है.
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