इस साल मॉनसून के कमजोर रहने और सामान्य से कम बारिश के अनुमान के बीच किसानों के लिए अलर्ट जारी किया गया है. कम बारिश से फसलों, खासकर बागवानी और सब्जी फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में किसानों को सही फसल चयन, उन्नत पौध उत्पादन, खेती की पद्धतियों में बदलाव, जैविक खाद के उपयोग और पोषक तत्वों के छिड़काव जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी गई है, ताकि फसलों को सूखे से बचाया जा सके.
अचानक मौसम में हो रहे बदलाव के कारण लीची के बाग में इस कीट का हमला बढ़ गया है, जिससे फल के उत्पादन पर असर पड़ता है. ये कीट लीची के लिए बहुत खतरनाक होता है, जिससे फलों को भारी नुकसान होता है. आइए जानते हैं बचाव के उपाय.
मई-जून का महीना मिट्टी की जांच के लिए सबसे बेहतरीन है क्योंकि रबी और खरीफ की फसलों के बाद जमीन को दोबारा पोषण की जरूरत होती है. जिस तरह खून की जांच से इंसान की सेहत का पता चलता है, ठीक उसी तरह सॉइल टेस्ट से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी या अधिकता की असलियत सामने आती है. बिना जानकारी के अंधाधुंध केमिकल उर्वरकों का इस्तेमाल न केवल आपकी लागत बढ़ाता है, बल्कि खेत को भी बंजर बनाता है.
लीची के बागवानों के लिए अप्रैल का आखिरी हफ्ता और मई की शुरुआत सबसे 'सेंसिटिव' वक्त होता है. जब पारा 40 डिग्री के पार जाने लगे, तो तपती गर्मी और 'क्लाइमेट चेंज' से फसल को बचाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है. इस दौरान नमी की कमी से फल फटने लगते हैं और कीड़ों के हमले से उनकी क्वालिटी गिर जाती है. डॉ. एस.के. सिंह का मशवरा है कि किसान इन 30 दिनों में सिंचाई, कीट प्रबंधन और सही पोषण पर खास ध्यान दें.
किसान गेहूं की फसल काटने के बाद पराली को खेतों में ही जला देते हैं और अगली फसल की तैयारी में जुट जाते हैं, जिससे पर्यावरण के साथ ही खेत की मिट्टी को भी काफी नुकसान होता है. ऐसे में अगर आप इस नुकसान से बचना चाहते हैं तो पराली को जलाने के बजाय इसके सही उपयोग से मिट्टी की सेहत सुधार सकते हैं. आइए जानते हैं कैसे.
लगातार गेहूं-धान उगाने और केमिकल खाद के इस्तेमाल से हमारी मिट्टी बीमार हो रही है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है. इसका सबसे सस्ता और सटीक समाधान 'ढैंचा' यानी हरी खाद है. ढैंचा कम पानी और खराब जमीन में भी आसानी से उग जाता है और मिट्टी को नाइट्रोजन व जरूरी पोषक तत्व देता है. इसे फूल आने से पहले खेत में जोतने से जमीन को 'ह्यूमस' मिलता है और मिट्टी फिर से उपजाऊ बन जाती है. कुल मिलाकर, ढैंचा अपनाकर किसान महंगी खाद का खर्चा बचा सकते हैं और अपनी जमीन की सेहत सुधार सकते हैं.
धान की खेती में बढ़ती लागत के बीच नील-हरित शैवाल किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बनकर सामने आया है. वैज्ञानिकों के अनुसार इसके उपयोग से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत भी कम होती है.
गाजर घास किसानों की फसल का दुश्मन है. जहां इंसानों की भी पहुंच नहीं है वहां तक इसकी पहुंच हो चुकी है. अब इसके खात्मे में के लिए जबलपुर स्थित खरपतवार अनुसंधान निदेशालय ने एक कीट की खोज की है जिससे इसका नियंत्रण आसानी से होगा.
अप्रैल महीने में बढ़ती गर्मी ने लोगों के साथ-साथ किसानों की चिंता भी बढ़ा दी है. खासकर लीची जैसी नाजुक और संवेदनशील फसल पर तेज गर्मी का असर अधिक दिखने लगा है. इसलिए इस समय लीची उत्पादक किसानों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है. आइए जानते हैं कैसे.
अप्रैल का आखिरी सप्ताह आते ही गर्मी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. यह मौसम आम लोगों के साथ-साथ किसानों के लिए भी परेशानी बढ़ाने वाला है. खासकर जायद फसलों की देखभाल इस समय बड़ी चुनौती बन जाती है. ऐसे में आइए जानते हैं फसलों को गर्मी से कैसे बचाएं.
लीची की फसल के शुरुआती चरण में कीटों का खतरा सबसे अधिक रहता है, जिससे फल गिरने और उत्पादन में भारी कमी हो सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार लीची स्टिंक बग, दहिया कीट और लीची माइट से समय रहते बचाव जरूरी है. सही दवाओं के छिड़काव और बाग की देखभाल से किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और बेहतर क्वालिटी वाले फल प्राप्त कर सकते हैं.
मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनती जा रही है. बेहतर उत्पादन के साथ यह मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती है. हालांकि, कीट और रोगों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए दलहन विकास निदेशालय ने किसानों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जिसमें फसल की सुरक्षा और बेहतर उत्पादन के लिए जरूरी उपाय बताए गए हैं.
टमाटर के पौधों को तेज धूप और गर्मी से सबसे ज्यादा नुकसान होता है. गर्म हवा चलने पर पत्तियां मुरझा जाती हैं, फल गिरने लगते हैं या फिर टमाटर छोटे रह जाते हैं. ऐसे में अगर आप भी इस परेशानी से जूझ रहे हैं, तो चिंता करने की जरूरत नहीं है.
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