ज्यादातर लोग मानते हैं कि गन्ने की पेड़ी में पैदावार कम होने लगती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वैज्ञानिक तरीके से ली गई पेड़ी आपको मुख्य फसल से भी ज्यादा मुनाफा देती है? बिना खेत की जुताई और बिना बीज का एक भी पैसा खर्च किए, आप बंपर मुनाफा कमा सकते हैं. बस ज़रूरत है उन 'खास ट्रिक्स' को समझने की, जो मिट्टी के नीचे छिपी जड़ों में नई जान फूंक देती हैं.
आम के बागों में जनवरी-फरवरी का समय बेहद नाजुक होता है और यदि इस दौरान सही प्रबंधन न किया जाए, तो पूरे साल की मेहनत बेकार हो सकती है. इस समय की सबसे बड़ी लापरवाही संतुलित पोषण और कीट नियंत्रण की कमी है. आप समय पर दवाओं का छिड़काव नहीं करते, तो कोहरे और नमी के कारण 'पाउडरी मिल्ड्यू' जैसी बीमारियां और 'भुनगा' जैसे कीट पूरे मंजर को काला कर सुखा देते हैं.
मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार दक्षिण गुजरात के कुछ जिलों में 21 जनवरी से 25 जनवरी तक बादल छाए रहने और हल्की बेमौसम बारिश की संभावना है. पूर्वानुमान को देखते हुए वलसाड के बागवानी उप निदेशक की तरफ से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में आम किसानों को खास सलाह दी गई हैं. इससे आम की फसल में फूल आने के समय किसानों को नुकसान हो सकता है.
इस समय चने की फसल में बड़े पैमाने पर कीटों का प्रकोप देखा जा रहा है. खासकर चने में लगने वाले फली छेदक (इल्ली) और कटुआ जैसे कीट और दीमक पौधों के फूल, फलियों और शुरुआती अवस्था में पौधों को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं. आइए जानते हैं बचाव के उपाय.
लहसुन की खेती में तना फटना किसानों की आम समस्या है. इसके कारण हैं- बोरॉन की कमी, ज्यादा यूरिया, गलत सिंचाई और गर्मी. हम इसे सुधारने के पक्के उपाय बता रहे हैं, ताकि लहसुन की क्वालिटी सुधरे और मंडी में बेहतर दाम मिले.
डायरेक्टोरेट ऑफ अनियन एंड गार्लिक रिसर्च (DOGR) की 5 नई उन्नत प्याज किस्मों—भीमा सुपर, भीमा डार्क रेड, भीमा रेड, भीमा श्वेता और भीमा शुभ्रा—को AINRPOG की राष्ट्रीय वर्कशॉप में देशभर के किसानों के लिए जारी करने की सिफारिश की गई है, जिससे खरीफ और रबी सीजन में प्याज उत्पादन बढ़ेगा.
क्या आप जानते हैं कि आम और लीची की भरपूर फसल का राज जनवरी की इन ठंडी रातों में छिपा है? जब जनवरी में कड़ाके की ठंड पड़ती है, तो पेड़ अपनी बाहरी बढ़ोतरी नए पत्ते निकालने को रोककर अपनी पूरी ताकत अंदर ही अंदर बौर (फूल) बनाने में लगा देते हैं. इसलिए, आम और लीची के पेड़ों में ढेर सारे बौर आने के लिए जनवरी की कड़ाके की ठंड बहुत जरूरी है.
घर की खाली जमीन को बेकार छोड़ने के बजाय उसे कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाए गए 'मॉडर्न हेल्दी किचन गार्डन' में बदलें. यह आधुनिक तरीका न केवल कम जगह में ज्यादा पैदावार देता है, बल्कि साल भर ताजी और ऑर्गेनिक सब्जियां सुनिश्चित करता है. वैज्ञानिकों के अनुसार, घर की उगी सब्जियां पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं, जो गंभीर बीमारियों से बचाकर आपको फिट रखती हैं. इस मॉडर्न तरीके को अपनाने से बाजार पर आपकी निर्भरता खत्म होगी और महीने का मोटा खर्चा बचेगा.
पंजाब में तेजी से गिरते तापमान के बीच PAU ने शीतलहर, घने कोहरे और पाले को लेकर अलर्ट जारी किया है. जानिए फसलों, सब्जियों, बागों और पशुओं को पाले से बचाने के जरूरी उपाय और विशेषज्ञों की सलाह.
यूपी में बढ़ती ठंड और गहराते कोहरे ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि गिरता तापमान और मौसम का बदलता मिजाज रबी की फसलों के लिए नई चुनौतियां खड़ा कर रहा है. अगले दो हफ्तों के दौरान मौसम मुख्य रूप से शुष्क रहने और उत्तरी तराई क्षेत्रों में घने कोहरे की संभावना है, जिससे आलू, टमाटर और मिर्च जैसी फसलों में झुलसा रोग और पाले का खतरा बढ़ गया है.
खेती में असली मुनाफा वही किसान कमाते हैं जो बाजार की चाल समझकर फसल को सही समय पर बाजार ले आते हैं. उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड के कारण अक्सर किसान पिछड़ जाते हैं, जिससे सीजन के समय फसल के दाम गिर जाते हैं. नीचे एक ऐसी 'स्मार्ट तकनीक' के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिसकी मदद से किसान कड़ाके की ठंड में भी सब्जियों की अगेती खेती कर सकते हैं। यह तकनीक न केवल बीजों को खराब होने से बचाती है, बल्कि मार्च-अप्रैल जैसे महंगे बाजार वाले महीनों में बंपर पैदावार देने का भरोसा भी देती है. कैसे इस स्मार्ट तकनीक के जरिए किसान अपनी खेती की लागत घटाकर कमाई को दोगुना कर सकते हैं और नर्सरी बेचकर भी लाखों का लाभ उठा सकते हैं। पूरी जानकारी दी गई है
शीतलहर और पाले से सर्दी के मौसम में रबी की सभी फसलों को नुकसान होता है. इसमें रबी की सबसे प्रमुख फसल गेहूं के लिए पाला को सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है. आइए आज हम आपको कुछ ऐसे तरीके बताते हैं, जिससे आप गेहूं की फसल को पाला से आसानी से बचा सकते हैं.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सर्दी को देखते हुए कृषि संबंधी सलाह जारी की है. जिसमें अगले कुछ दिनों में कई स्थानों पर शीतलहर और घने से बहुत घने कोहरे की चेतावनी दी गई है. वहीं, इस ठंड ने किसानों की मुसिबत बढ़ा दी है.
सर्दी वाली बारिश ने जहां आम लोगों को ठिठुरने पर विवश कर रहा है. वहीं, इस मौसम ने किसानों के चेहरे पर खुशी की इबारत लिख दी है. आइए जानते हैं इससे रबी फसलों को क्या फायदे होंगे.
लिली एक विदेशी फूल है जिसकी खुशबू और आकर्षक रंग इसे बेहद खास बनाते हैं. इसका उपयोग शादी-विवाह, होटल-रेस्टोरेंट डेकोरेशन, पूजा-पाठ, गिफ्ट बुके और इवेंट मैनेजमेंट में बड़े पैमाने पर होता है. यही वजह है कि इसकी मांग साल भर बनी रहती है. लिली की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 55 से 60 दिनों में फूल देने लगती है. एक बार पौधे तैयार हो जाने के बाद नियमित कटाई से किसान लगातार फूल बेच सकते हैं.
बिहार की लीची को दुनिया भर में पसंद किया जाता है, लेकिन अच्छा मुनाफा कमाने के लिए फलों का बड़ा, मीठा और चमकदार होना जरूरी है। जनवरी का महीना शुरू होते ही किसानों को बगीचों की तैयारी तेज कर देनी चाहिए.अक्सर खाद और पानी की कमी या कीटों के हमले से फलों की क्वालिटी खराब हो जाती है, जिससे बाजार में सही दाम नहीं मिल पाते। बंपर पैदावार के लिए अभी से पेड़ों के पोषण, सही समय पर सिंचाई और रोगों से बचाव पर ध्यान देना जरूरी है
सर्दियों में गेहूं की फसल को पाले से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए समय पर सिंचाई, संतुलित खाद, पाला-प्रतिरोधी किस्मों का चयन और मल्चिंग जैसे उपाय बेहद कारगर हैं. सही कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान ठंड के असर को कम कर सकते हैं और बेहतर उपज हासिल कर सकते हैं.
आलू एक ऐसी सब्जी है जिसका इस्तेमाल लगभग सभी घरों में होता है. लेकिन आजकल बाजारों में मिलने वाले आलू नकली भी हो रहे हैं, जिन्हें केमिकल की मदद से पकाया जा रहा है. ऐसे में आइए जानते हैं आखिर कैसे करें केमिकल वाले आलू की पहचान.
देश के कई राज्यों में शीतलहर और पाले का खतरा बढ़ गया है. कृषि विभाग ने रबी और सब्जी फसलों को नुकसान से बचाने के लिए सिंचाई, धुआं, मल्चिंग और छिड़काव से जुड़ी अहम सलाह जारी की है.
राजस्थान के डूंगरपुर जिले के किसान अब्बासी चिखली ने मुर्गी पालन के क्षेत्र में एक कमाल का देसी और सस्ता इलाज खोजा है. उन्होंने रसोई में मिलने वाली चीजों जैसे — हल्दी, अदरक, लहसुन, अजवाइन, काली मिर्च और गुड़ का इस्तेमाल करके एक खास हर्बल काढ़ा तैयार किया है. यह काढ़ा मुर्गियों के लिए 'सुरक्षा कवच' का काम करता है और उन्हें रानीखेत व ई-कोलाई जैसी कई खतरनाक बीमारियों से बचाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि 100 मुर्गियों की एक हफ्ते की खुराक का खर्च मात्र 45 रुपये आता है.
जनवरी का समय आम के पेड़ों के लिए 'प्री-फ्लावरिंग' यानी बौर आने से ठीक पहले का सबसे अहम चरण होता है. क्योंकि यही वह समय है जब पेड़ अपनी पूरी ऊर्जा फल देने के लिए जुटाता है. इस नाजुक अवधि में की गई थोड़ी सी मेहनत और सही वैज्ञानिक प्रबंधन यह तय करता है कि आपके बाग में बौर कितना आएगा और आने वाले फलों की क्वालिटी कैसी होगी. अगर किसान इस दौरान एक्सपर्ट द्वारा बताए गए कीट नियंत्रण मिट्टी की जुताई और पोषक तत्वों के छिड़काव जैसे उपायों को गंभीरता से अपनाते हैं, तो न केवल बौर स्वस्थ निकलता है, बल्कि फूलों के झड़ने की समस्या भी खत्म हो जाती है.
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