बासमती धान की खेती में ज्यादा पैदावार और बेहतर क्वालिटी पाने के लिए सिर्फ अच्छा बीज काफी नहीं है. वैज्ञानिकों ने नर्सरी तैयार करने, बीज उपचार, पौधों की जड़ों की सुरक्षा और सही दूरी पर रोपाई को अहम बताया है. सही तकनीक अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन ले सकते हैं.
देश में गहराते जलसंकट और अल नीनो के कारण कम बारिश की आशंका के बीच 'पूसा हाइड्रोजेल' तकनीक किसानों के लिए बड़े काम की है. ग्वार फली से बना यह प्राकृतिक 'वॉटर बैंक' मिट्टी में मिलकर पानी को सोख लेता है और सूखे के समय सीधे पौधों की जड़ों को नमी देता रहता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि एक एकड़ में महज 1200 रुपये की लागत आती है और यह एक बार डालने पर खेतों में 5 साल तक काम करता है. धान, मक्का, गन्ना और सब्जियों जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों में इसके इस्तेमाल से पानी की आधी बचत होती है.
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में फसल विविधीकरण का मॉडल किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रहा है। धान की जगह पॉपकॉर्न मक्का की खेती अपनाने वाले 605 किसानों ने 1763 एकड़ में उत्पादन कर 5 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री की।
हरी खाद के रूप में ढैंचा की खेती अपनाकर किसान मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च भी कम कर सकते हैं.ढैंचा के उपयोग से भूमि में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत होती है.
साल 2026 में अल नीनो के चलते सूखे और कम मॉनसून का बड़ा खतरा है, जिससे निपटने के लिए सरकारी तैयारियों के साथ-साथ किसानों को भी अपने स्तर पर कमर कसनी होगी. किसानों को पुरानी आदतें छोड़कर 'सक्रिय खेती' अपनानी होगी. जैसे कम पानी वाली फसलें चुनना, धान की सीधी बुवाई करना और समझदारी से सिंचाई करना. इन बदलावों और मौसम विभाग के सैटेलाइट अलर्ट और कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह पर पैनी नजर रखकर सूखे की मार से काफी हद तक बचा जा सकता है. मौसम विभाग के मुताबिक इस साल बारिश करीब 10% कम होगी, लेकिन सही वैज्ञानिक तरीकों और सही समय पर बदलाव करके हम अपनी खरीफ फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं.
मिट्टी की गुणवत्ता खेती की सफलता में अहम भूमिका निभाती है. पॉलीहाउस तकनीक के साथ सही मिट्टी और पानी की जांच से फसल उत्पादन बढ़ता है. यह आधुनिक खेती का तरीका मौसम पर निर्भरता कम करता है और किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है. इससे कम जगह में अधिक और बेहतर गुणवत्ता की फसल प्राप्त होती है.
धान के खेत में मछली पालन कर कम लागत में दोगुनी आय कमाएं. पाटन के किसानों को कृषि विभाग ने दी धान-मछली एकीकृत खेती की सलाह, जो जैव विविधता बढ़ाने के साथ कीटनाशक उपयोग भी कम करती है.
जबलपुर के प्रगतिशील किसान अनिल पचौरी ने नर्मदा किनारे 10 एकड़ में 2 हजार नारियल के पेड़ लगाकर नारियल खेती की नई मिसाल कायम की है। वैज्ञानिक तकनीकों और निरंतर मेहनत के दम पर वे प्रतिदिन 300 से 400 नारियल का उत्पादन कर रहे हैं तथा सालाना 30 से 40 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में नील हरित शैवाल (ब्लू-ग्रीन एल्गी) किसानों के लिए जैविक खेती का प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहा है. यह प्राकृतिक जैव उर्वरक मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, नाइट्रोजन की उपलब्धता सुधारने और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने में मदद कर रहा है.
गन्ने की खेती को आमतौर पर बहुत अधिक पानी, भारी मात्रा में यूरिया और साल भर के लंबे इंतजार के बाद कमाई देने वाली फसल माना जाता है, जिससे किसान को बीच में पैसों की तंगी झेलनी पड़ती है. लेकिन गन्ने के साथ मूंगफली की सह-फसली खेती ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है और किसानों को आमदनी का एक 'फास्ट-ट्रैक' फॉर्मूला दे दिया है.
मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत घरों की छत पर सोलर पैनल लगवाने के लिए आकर्षक सब्सिडी दी जा रही है. उपभोक्ताओं को आवेदन से लेकर योजना का लाभ लेने तक की पूरी जानकारी व्हाट्सऐप चैटबॉट ‘सोलर चाचा’ के माध्यम से आसानी से मिल रही है.
धान की खेती के मौसम में यूरिया की कमी से किसान परेशान हैं. ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों ने गोबर की खाद, बायो-कल्चर और एनपीके खाद जैसे प्रभावी विकल्प सुझाए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इन तरीकों को अपनाकर किसान कम लागत में फसल को पूरा पोषण दे सकते हैं और यूरिया की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.
बदलती जलवायु, अंधाधुंध रासायनिक खादों और खारे पानी से सिंचाई के कारण खेतों में मिट्टी की लवणता लगातार बढ़ रही है, जो केले की खेती के लिए एक "साइलेंट किलर" साबित हो रही है. जमीन में सोडियम और क्लोराइड की मात्रा बढ़ने से 'शारीरिक सूखा की स्थिति पैदा होती है, जहां खेत में नमी होने के बावजूद पौधे की जड़ें पानी नहीं सोख पातीं और पौधा प्यासा रह जाता है. केले की पत्तियों का किनारों से पीला होकर झुलसना गंभीर चेतावनी है. अगर समय रहते मिट्टी की जांच कराकर इसका वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं किया गया, तो पौधों का विकास रुक जाएगा, केले छोटे और कमजोर हो जाएगे, जिससे किसानों की आय और फसल की क्वालिटी पर भारी नुकसान पहुंचेगा.
खरीफ सीजन में मक्का की खेती करने वाले किसानों के लिए मेड़ विधि काफी फायदेमंद मानी जा रही है. बिहार कृषि विभाग ने किसानों को इस तकनीक से खेती करने की सलाह दी है. विशेषज्ञों के अनुसार, मेड़ विधि अपनाने से फसल को जलभराव से बचाया जा सकता है.
देश में तेज गर्मी और लू के बढ़ते प्रभाव से मधुमक्खी पालन प्रभावित हो रहा है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि देखभाल में लापरवाही से कॉलोनियां कमजोर हो सकती हैं और शहद उत्पादन घट सकता है.
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