वाराणसी स्थित IIVR ने 8 साल की मेहनत के बाद बासमती खुशबू वाली तोरई विकसित की है. VRSG 7-17 नाम की यह किस्म 55–60 दिनों में तैयार होती है और किसानों को ज्यादा मुनाफा देगी.
पश्चिम बंगाल के एक अनुभवी किसान, कर्णदेब रॉय ने पशुपालकों के लिए एक बहुत ही उपयोगी और सस्ती मशीन बनाई है, जिसे यूरिया मिनरल मोलासेस ब्लॉक मेकर कहा जाता है. बहुत कम कीमत वाली यह मजबूत मशीन एक घंटे में 20 से 25 पोषक ब्लॉक तैयार कर सकती है. इन ब्लॉक्स के उपयोग से गायों के दूध उत्पादन में 23% और बकरियों के शारीरिक वजन में 21% तक की शानदार बढ़ोतरी देखी गई है. लगभग 65 किलो वजन वाली इस मशीन को किसान अपनी सुविधा के अनुसार आसानी से कहीं भी ले जा सकते हैं.
डिजिटल कृषि मिशन 2.0 भारत की खेती में एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया है, जहां अब हल के साथ-साथ मोबाइल और तकनीक खेतों की कमान संभालेंगे. नीति आयोग के अनुसार, इस मिशन का असली मकसद किसानों को 'स्मार्ट' बनाना है ताकि वे सटीक जानकारी के साथ बेहतर पैदावार ले सकें. जब तकनीक और मिट्टी का मेल होगा, तो खेती में लागत कम होगी और किसान की कमाई और समृद्धि बढ़ेगी. यह बदलाव न केवल किसानों की जिंदगी को आसान बनाएगा, बल्कि उनके बढ़ते कदमों से भारत दुनिया की एक बड़ी कृषि महाशक्ति बनकर उभरेगा.
Sonalika Tractors Sale December 2025: सोनालीका ट्रैक्टर्स ने दिसंबर 2025 में अब तक की सबसे बड़ी मासिक बिक्री दर्ज कर नया रिकॉर्ड बना लिया है. कंपनी का कहना है कि रबी सीजन में बढ़ी बुआई और किसानों के सकारात्मक रुख से ट्रैक्टरों की मांग को मजबूती मिली है.
बिहार के किशनगंज के एक किसान ने ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए एक शानदार और सस्ता 'देसी जुगाड़' खोज निकाला है, जिसे 'टायर मॉडल' कहा जा रहा है. आमतौर पर ड्रैगन फ्रूट के पौधों को सहारा देने के लिए महंगे सीमेंट के पोल और ढांचे की जरूरत होती है, जिसमें काफी पैसा खर्च होता है.
UP News: राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की मिशन निदेशक दीपा रंजन ने बताया कि कृषि आजीविका सखियां खेत-खलिहान में बदलाव की असली ताकत बन चुकी हैं. ये महिलाएं किसानों को तकनीकी जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने का भी काम कर रही हैं.
सोलर पैनल किसानों के लिए लंबे समय का निवेश है. सफाई में की गई छोटी-सी लापरवाही बड़ा नुकसान करा सकती है. अगर सही तरीके और सावधानी से सफाई की जाए तो सोलर पैनल सालों तक बेहतर प्रदर्शन देते हैं और किसानों को मुफ्त बिजली का पूरा लाभ मिलता है. धूल, मिट्टी, पक्षियों की बीट और परागकण पैनल की सतह पर जम जाते हैं. इससे बिजली उत्पादन 20 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है.
कर्नाटक की प्रगतिशील महिला किसान श्रीमती पद्मिनी गौड़ा ने खेती की दुनिया में अपनी अनोखी सोच से क्रांति ला दी है. उन्होंने जमीन के 13.5 फीट नीचे एक विशेष 'सनकन चैंबर' तैयार किया है, जो बिना किसी महंगी मशीन के मशरूम के लिए जरूरी नमी और तापमान को प्राकृतिक रूप से बनाए रखता है .
किसान राणाप्रताप का यह सस्ता 'खाद यंत्र' खेती की दुनिया में क्रांति ला रहा है, जिससे खेती में खाद का खर्च 50 फीसदी तक कम हो सकता है. यह देसी मशीन खाद को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाती है, जिससे न तो खाद बर्बाद होती है और न ही ज्यादा मजदूरों की जरूरत पड़ती है. कम लागत में बना यह स्मार्ट जुगाड़ न केवल समय बचाता है बल्कि छोटे किसानों की मेहनत को भी बहुत आसान बना देता हैं. अपनी इसी खासियत की वजह से यह यंत्र आजकल किसानों के बीच खूब धूम मचा रहा है और कमाई बढ़ाने का बेहतरीन जरिया बन गया है.
भारत में कॉफी ग्रेड और क्वालिटी का असेसमेंट अब डिजिटल होने वाला है, क्योंकि दिल्ली की एक स्टार्ट-अप कंपनी ने एक ऐसा ग्रेडिंग डिवाइस बनाया है जो इमेज बेस्ड प्रोसेसिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है. Agsure Innovations Pvt Ltd द्वारा डेवलप किया गया यह बॉक्स जैसा डिवाइस हाल ही में बालेहोन्नूर में सेंट्रल कॉफी रिसर्च इंस्टीट्यूट के 100 साल पूरे होने के जश्न में स्टार्ट-अप कंपनी ने कॉफी से जुड़े लोगों को दिखाया.
सहारनपुर के मिर्जापुर गांव में एक किसान की सोच ने गांव की दिशा बदल दी है. किसान अमन प्रताप सिंह द्वारा तैयार ग्रोक AI आधारित ऐप ‘पंचायत दीदी’ से अब ग्रामीण पेंशन, आवास, आधार और सरकारी योजनाओं की जानकारी मिनटों में पा रहे हैं. जानिए यह पहल कैसे गांवों के लिए नई उम्मीद बनी.
आलू की खेती से बंपर पैदावार पाने की खास तकनीक यानी सीक्रेट है. जब फसल 50-60 दिन की होती है, तो एक खास तकनीक से आलू का आकार बड़ा हो सकता है, वजन बढ़ सकता है और कुल उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है. यह कम लागत में मुनाफा बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका है, जिससे न केवल फसल की गुणवत्ता सुधरती है बल्कि किसानों की आमदनी में भी भारी इजाफा होता है. जिसके बारे में डिटेल जानकारी दी गई है.
खाद स्प्रेडेयर एक ऐसी कृषि मशीन है, जिसकी मदद से खेतों में यूरिया, डीएपी, पोटाश, कंपोस्ट या जैविक खाद को समान मात्रा में फैलाया जा सकता है. यह मशीन हाथ से चलने वाली, बैटरी चालित, ट्रैक्टर से जुड़ने वाली या पावर टिलर आधारित हो सकती है. मशीन खाद को नियंत्रित गति और मात्रा में खेत में फैलाती है, जिससे फसल को संतुलित पोषण मिलता है.
मध्य प्रदेश के सीधी जिले की मनीषा कुशवाहा आज नारी शक्ति की एक जीती-जागती मिसाल बन चुकी हैं. कभी घर के चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली मनीषा ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर अपनी किस्मत बदल दी. उन्होंने न केवल जैविक खेती को अपनाकर फसलों को रसायन मुक्त बनाया, बल्कि 150 अन्य किसानों को भी इस नेक काम से जोड़ा. उनकी असल पहचान तब बनी जब वे 'नमो ड्रोन योजना' के तहत 'ड्रोन सखी' बनीं.
अक्सर आम के बाग पुराने होने पर फल देना कम कर देते हैं, जिससे किसानों की कमाई घट जाती है. इसको काट देते हैं, लेकिन अब पुराने पेड़ों को काटने के बजाय जीर्णोद्धार तकनीक अपनाकर उन्हें फिर से जवान बनाया जा सकता है. इस विधि में पेड़ों की सूखी और घनी टहनियों की वैज्ञानिक तरीके से छंटाई की जाती है, जिससे सूरज की रोशनी सीधे तने तक पहुंचती है और नई शाखाएं निकलती हैं.
इंजीनियर मोहम्मद कमर तौहीद ने इंजीनियरिंग का असली जादू दिखाते हुए कबाड़ से जुगाड़ कर एक ऐसी 'सुपर मशीन' तैयार की है, जिससे अब खेती में क्रांतिकारी बदलाव आएगा. इस मशीन से किसानों के हजारों रुपये बचेंगे, क्योंकि अब बीज बोने का खर्च आधा हो जाएगा. इस देसी अवतार वाली मशीन की खासियत यह है बहुत कम डीजल में खेत की जुताई होगी, जिससे पुरानी मशीनों की छुट्टी तय है.
भारत में अधिकतर किसानों के पास ट्रैक्टर पुराने ही होते हैं. मगर जरूरी नहीं है कि आपका ट्रैक्टर पुराना दिख रहा है तो चलेगा भी पुराने की तरह. अगर आप अपने पुराने ट्रैक्टर के साथ कुछ देसी उपाय अपनाएंगे और रखरखाव में कुछ अहम चीजों का ध्यान रखेंगे तो पुराने ट्रैक्टर की लाइफ भी कई सालों के लिए बढ़ सकती है. बूढ़े ट्रैक्टर को जवान बनाने के लिए हम आपको कुछ ऐसी ही देसी जुगाड़ बता रहे हैं.
जहां तक इजरायल की सीड टेक्नोलॉजी का सवाल है, देश इस क्षेत्र में ग्लोबल लेवल पर लीडर माना जाता है. इजरायल क्लाइमेट-रेजिलिएंट बीज, हाई-यील्ड हाइब्रिड वैरायटीज, कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाले बीज और ड्रिप सिंचाई से जुड़े सीड सॉल्यूशंस पर काम कर रहा है. वहां बीजों को खास तौर पर सूखा, गर्मी और मिट्टी की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया जाता है.
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