क्या पैराक्वाट डाइक्लोराइड बनाने-बेचने वाली कंपनियों और नीति-निर्माताओं की नजर में भारत के नागरिकों की सेहत की कोई कीमत नहीं है? जब आस्ट्रिया, यूनाइटेड किंगडम, स्विट्जरलैंड और चीन अपने लोगों को बचाने के लिए इसे बैन कर सकते हैं, तो भारत के खेतों में इसे खुलेआम झोंकने की वकालत किस आधार पर की जा रही है? जानिए इस 'खतरनाक जहर' की पूरी कहानी
देश में करीब 30% पेस्टिसाइड बाजार नकली और घटिया उत्पादों के कब्जे में है. राजस्थान समेत कई राज्यों में ऐसे जहर जैसे केमिकल्स खुलेआम बिक रहे हैं, जिससे फसलें बर्बाद हो रही हैं और किसानों की जान जा रही है. बैन के बावजूद खतरनाक कीटनाशक बाजार में उपलब्ध हैं, जिससे सरकार की निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
धान रोपाई का सीजन शुरू होने से पहले किसानों की चिंता बढ़ गई है। डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी, खाद की सीमित उपलब्धता और संभावित बिजली संकट के कारण खेती की लागत में इजाफा होने की आशंका है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन परिस्थितियों में धान की खेती पर प्रति हेक्टेयर करीब 1,500 रुपये तक अतिरिक्त खर्च आ सकता है, जिससे किसानों का मुनाफा प्रभावित होगा।
Side Effects of Pesticides: कीटनाशकों से किसानों की मौत की सबसे कड़वी हकीकत यह है कि मल्टीनेशनल कंपनियों ने भारत के ग्रामीण बाजारों में अपने जानलेवा केमिकल को बेचकर अरबों रुपये का मुनाफा तो कमाया, लेकिन कभी भी इसके सुरक्षित इस्तेमाल को लेकर किसानों को जागरूक करने का देशव्यापारी कार्यक्रम नहीं चलाया. आखिर पैराक्वाट डाइक्लोराइड और ग्लाइफोसेट जैसे खतरनाक केमिकल भी भारत में बैन क्यों नहीं हो रहे? क्या हमारे देश में लोगों की सेहत की कोई कीमत नहीं है?
गुना जिले में खाद संकट के कारण किसानों की परेशानियां बढ़ गई हैं. नानाखेड़ी केंद्र पर दूर-दूर से पैदल आए किसानों को पर्याप्त खाद नहीं मिल रही है. एक किसान की भावुक तस्वीर सामने आई, जहां वह अपनी पीड़ा बताते हुए रो पड़ा. प्रशासन ने व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए हैं, लेकिन किसान अभी भी संकट में हैं.
हरियाणा सरकार प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए नई नीति लाने जा रही है. मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने पंचायत भूमि पर प्राकृतिक खेती, किसानों को प्रति एकड़ 10 हजार रुपये की सहायता, जैविक उत्पादों के लिए बाजार और प्रशिक्षण सुविधाओं की घोषणा की. सरकार का लक्ष्य हरियाणा को प्राकृतिक खेती का मॉडल राज्य बनाना है.
महाराष्ट्र में खरीफ की तैयारी के बीच सरकार ने सोयाबीन, मूंग, उड़द, मूंगफली, बाजरा और कपास समेत प्रमुख फसलों के प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने का फैसला किया है. बीज वितरण पहले आओ पहले पाओ आधार पर होगा और किसानों को समय रहते आवेदन करने की सलाह दी गई है.
साठ सालों में देश का अनाज उत्पादन तो सिर्फ 4 गुना बढ़ा, लेकिन खेतों में रासायनिक खादों की खपत 40 गुना से भी ज्यादा बढ़ गई. यह खेती के घाटे का ऐसा दुष्चक्र है जिसने किसान की लागत बढ़ा दी, सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ लादा और हमारी उपजाऊ जमीन को बंजर बना दिया. सबसे बड़ी चिंता यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों की तमाम योजनाओं के तहत गांवों और ब्लॉकों में कृषि विभाग से जुड़े जमीनी स्टाफ की एक भारी फौज तैनात होने के बावजूद जमीनी हालात नहीं सुधरे. किसानों के क्षमता विकास और कृषि प्रसार के इतने बड़े सरकारी अमले के रहते हुए भी खेतों में केमिकल का अंधाधुंध इस्तेमाल जारी है. अब केवल कागजी अभियानों और बैठकों से काम नहीं चलेगा. अगर सचमुच देश की मिट्टी और किसानों का पैसा बचाना है, तो सबसे पहले ओवरडोज केमिकल वाले इलाकों में ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय करनी होगी, तभी इस व्यवस्था में सुधार की कोई गुंजाइश बनेगी.
किसान संघ ने किसानों से खाद, बीज और खेती से जुड़ी अन्य जरूरी सामग्री खरीदते समय पूरी सतर्कता बरतने की अपील की है. किसानों को जागरूक करते हुए संघ ने कहा कि जब भी वे खाद या बीज खरीदें, तो सबसे पहले बैग या पैकेट पर छपी MRP जरूर जांचें.
हरी खाद के रूप में ढैंचा की खेती अपनाकर किसान मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च भी कम कर सकते हैं.ढैंचा के उपयोग से भूमि में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत होती है.
भारत में कोल गैसिफिकेशन की तकनीक पहले भी 1990 के दशक में अपनाई गई थी, लेकिन अधिक लागत, तकनीकी समस्याएं और कम फायदे के कारण कई प्लांट बंद हो गए. वर्तमान में वैश्विक सप्लाई चेन संकट और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों के चलते सरकार ने इसे आधुनिक तकनीक के साथ फिर से शुरू करने पर जोर दिया है, ताकि देश खाद उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सके.
बिहार सरकार ने फसलों में कीट प्रबंधन और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए ड्रोन छिड़काव की जमीनी जांच के निर्देश दिए हैं. कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि अब गांव स्तर पर सत्यापन, किसानों से फीडबैक और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा ताकि योजनाओं का असर खेतों में दिखे.
किसान नकदी फसलों की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इससे किसानों की बंपर कमाई भी हो रही है. इसलिए किसान बड़े स्तर पर इसकी खेती कर रहे हैं. ऐसे में किसानों की सुविधा के लिए राष्ट्रीय बीज निगम ऑनलाइन तिल की RT-372 किस्म का बीज बेच रहा है.
Yogi Cabinet Meeting: इसके साथ ही भूमि और बोए गए रकबे का सत्यापन भूलेख पोर्टल से ऑनलाइन कराया जाएगा. योगी सरकार ने किसानों को त्वरित भुगतान सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था की है कि क्रय एजेंसियों द्वारा खरीदे गए मक्का का मूल्य पीएफएमएस पोर्टल के माध्यम से किसानों के आधार लिंक एवं एनपीसीआई मैप्ड बैंक खातों में यथासंभव 48 घंटे के भीतर हस्तांतरित किया जाएगा.
बिहार के गया जिले में 'खेत बचाओ अभियान' के तहत किसानों को मिट्टी की सेहत सुधारने और संतुलित उर्वरक उपयोग की ट्रेनिंग दी गई. वैज्ञानिकों ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्राकृतिक खेती और मिट्टी परीक्षण के महत्व पर जानकारी दी. कार्यक्रम में 110 किसानों ने भाग लिया.
खरीफ सीजन की तैयारियों के बीच बैतूल में खाद चोरी का बड़ा मामला सामने आया है. वेयरहाउस से करीब 700 बोरी उर्वरक गायब होने के बाद किसानों और प्रशासन में चिंता बढ़ गई है. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के प्रगतिशील किसान शैलेंद्र कुमार कन्नौजे ने नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग कर खेती में नई मिसाल पेश की है. नैनो उर्वरकों के इस्तेमाल से उनकी खेती की लागत घटी है, जबकि फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
कृषि मंत्रालय और आईसीएआर का 'खेत बचाओ अभियान' देश की खेती-किसानी की सूरत बदलने का एक बड़ा और चौतरफा एक्शन प्लान है. इस मुहिम में सरकार मुख्य रूप से चार मोर्चों पर काम कर रही है—मिट्टी की सेहत सुधारना, पानी की सही बचत, ड्रिप सिंचाई, नकली खाद-दवाइयों पर कड़ा एक्शन और किसानों को सीधे KCC जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ देना. विशेषज्ञों का मानना है कि इस चौतरफा रणनीति से न सिर्फ बंजर होती जमीन बचेगी और फसलों की पैदावार बढ़ेगी, बल्कि किसानों की लागत कम होने से उनकी अच्छी कमाई भी होगी. जब मिट्टी सेहतमंद होगी, तभी देश का हर नागरिक भी पूरी तरह स्वस्थ रहेगा.
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अनिश्चितता के बीच भारत खाद सप्लाई के लिए वैकल्पिक समुद्री रास्तों पर काम कर रहा है. सऊदी के यनबू पोर्ट को लेकर चर्चा तेज है. पढ़ें रिपोर्ट...
‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत के बीच खरीफ सीजन में रासायनिक खादों की मांग में गिरावट दर्ज की गई है, जिसे सरकार के लिए राहत की खबर माना जा रहा है. कम बारिश के अनुमान और देर से धान रोपाई के चलते फिलहाल खाद की खपत घट रही है. हालांकि, आने वाले समय में मांग बढ़ने और वैश्विक हालात के कारण खाद सब्सिडी 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका भी जताई जा रही है.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि राज्य में खरीफ सीजन के लिए खाद और बीज की कोई कमी नहीं है. डीएपी की उपलब्धता पर अंतरराष्ट्रीय हालात का असर जरूर पड़ा है, लेकिन सरकार ने एनपीके, एसएसपी और नैनो उर्वरकों जैसे विकल्प उपलब्ध कराए हैं. सरकार रोजाना स्थिति की समीक्षा कर रही है.
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