मधुमक्खियों के लिए जानलेवा साबित होता कीटनाशकफ्रांस की पर्यावरण परिवर्तन मंत्री मोनिक बारबट का इस्तीफा केवल एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि एग्रो-केमिकल कंपनियों के लालच के खिलाफ नैतिकता की एक ऐसी बुलंद हुंकार था, जिसने दुनिया को रीढ़ की हड्डी होने का असली मतलब सिखाया. जब कंपनियों के मुनाफे और सियासी दबाव के आगे झुककर मधुमक्खियों के लिए 'यमराज' माने जाने वाले एसिटामिप्रिड और फ्लूपाइराडिफ्यूरोन जैसे घातक कीटनाशकों को मंजूरी दी गई, तो बारबट ने अपनी कुर्सी के बजाय पर्यावरण और कृषि के प्रति अपने ईमान को चुना. इस आत्मघाती फैसले के आगे घुटने टेकने से उनका इनकार करना यह साबित करता है कि पर्यावरण की सुरक्षा किसी भी देश की सत्ता और आर्थिक लालसा से बहुत ऊपर होनी चाहिए.
इसके ठीक उलट, जब हम भारत के मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालते हैं, तो यह संवेदनशीलता एक खौफनाक विरोधाभास में तब्दील हो जाती है. हमारे देश में सरकारी तंत्र और एग्रो-केमिकल कंपनियों का एक ऐसा अनैतिक 'सिंडिकेट' फल-फूल रहा है, जिसने चंद रुपयों के मुनाफे के लिए देश की उपजाऊ मिट्टी, बेजुबान जीवों और इंसानी सेहत का खुला सौदा कर दिया है. जहां हमारे कुछ वैज्ञानिक एग्रो-केमिकल कंपनियों की फंडिंग के टुकड़ों पर पलकर जानलेवा केमिकल को सुरक्षित बताने की पैरवी कर रहे हैं, वहीं अपने नागरिकों की सेहत को लेकर संजीदा मुल्कों में इन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा रहा है. कृषि वैज्ञानिकों और नौकरशाहों के इसी अनैतिक संरक्षण में फल-फूल रही ये कंपनियां भारत की पावन मिट्टी को बंजर बनाकर और इंसानी नसों में धीमा जहर घोलकर अपनी तिजोरियां भर रही हैं.
साल 2020 में कृषि मंत्रालय ने 27 जानलेवा कीटनाशकों को बैन करने का एक ड्राफ्ट तैयार किया. तब लगा था कि सरकार को अपने नागरिकों की सेहत की कितनी चिंता है. लेकिन, साल 2023 के फाइनल ऑर्डर में इस मंशा पर पानी फेर दिया गया. एग्रो-केमिकल लॉबी के अरबों रुपये के कारोबारी दबाव और मुनाफे के खेल के आगे देश के नीति-निर्माताओं ने न सिर्फ घुटने टेक दिए. कृषि मंत्रालय ने 24 घातक केमिकल को खेती में इस्तेमाल करने की छूट दे दी. यह सिर्फ एक प्रशासनिक यू-टर्न नहीं, बल्कि पर्यावरण की हत्या का परवाना था. जिन केमिकल को दुनिया भर में मधुमक्खियों का 'यमराज' मानकर प्रतिबंधित किया जा रहा है, उन्हें हमारे रहनुमाओं ने चंद रुपयों की खनक के लिए भारतीय खेतों में तबाही मचाने की खुली छूट दे दी.
सरकार और कंपनियों की यह मिलीभगत इसलिए और भयावह है क्योंकि मधुमक्खियां हमारी पूरी कृषि व्यवस्था की प्राण हैं, जो फसलों को परागण के जरिए नया जीवन, फल और स्वाद देती हैं. आज हालात ये हैं कि हमें 'खेत बचाओ अभियान' चलाने की नौबत आ गई है. अगर यह सिंडिकेट ऐसे ही जहर बेचता रहा, तो याद रखिए कि कल भारत के सामने भीषण 'खाद्य सुरक्षा का संकट' खड़ा होना तय है, क्योंकि बिना इन नन्हीं मधुमक्खियों के आधी से ज्यादा फसलें कभी अनाज का दाना बन ही नहीं पाएंगी.
दुनिया के महानतम विचारकों और वैज्ञानिकों ने हमेशा आगाह किया है कि मधुमक्खियों के बिना इंसान का वजूद मुमकिन नहीं है. महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि "अगर धरती से मधुमक्खियां गायब हो गईं, तो इंसान के पास जीने के लिए सिर्फ चार साल बचेंगे. कोई मधुमक्खी नहीं, तो कोई परागण नहीं, कोई पौधा नहीं, कोई जानवर नहीं, और कोई इंसान नहीं." इसी तरह मशहूर प्रकृतिवादी डेविड एटनबरो ने कहा, "अगर मधुमक्खियां कल गायब हो जाएं, तो हमारी पूरी खाद्य श्रृंखला और अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी. वे इस ग्रह के जीवित रहने का मुख्य इंजन हैं." दुर्भाग्य से हमारे यहां इस मुद्दे पर कोई संजीदगी नहीं दिखती. एग्रो केमिकल कंपनियां कहती हैं कि अगर पेस्टिसाइड नहीं होंगे तो खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा होगा, लेकिन यह नहीं कहतीं कि मधुमक्खियां मर रही हैं तो इसका अंजाम क्या होगा?
एग्रो-केमिकल कंपनियों के इस जहर ने सिर्फ मधुमक्खियों को ही नहीं, बल्कि जमीन के भीतर दिन-रात बिना थके काम करने वाले किसानों के सबसे सच्चे दोस्त केंचुओं का भी कत्ल कर दिया है.
केंचुए मिट्टी को खाकर उसे उलट-पुलट करते हैं, जिससे मिट्टी में ऑक्सीजन पहुंचती है और वह उपजाऊ बनती है. जब खेतों में क्लोरोपायरीफॉस और कार्बोफ्यूरान जैसे कीटनाशकों का अंधाधुंध छिड़काव होता है, तो ये केमिकल पानी के साथ घुलकर मिट्टी के भीतर बैठ जाते हैं.
कीटनाशक का यह जहर केंचुओं की नाजुक त्वचा के जरिए उनके शरीर में समा जाता है. इससे केंचुओं का तंत्रिका तंत्र ठप हो जाता है, उनके प्रजनन की क्षमता खत्म हो जाती है और वे मिट्टी के भीतर ही घुट-घुट कर मर जाते हैं. जिस मिट्टी में लाखों केंचुए होने चाहिए थे, आज रासायनिक कंपनियों ने उसे बेजान और खोखला बना दिया है.
हम इंसानों को लगता है कि अनाज सिर्फ किसान उगाता है, लेकिन सच यह है कि बिना मधुमक्खियों के आधी से ज्यादा फसलें कभी फल या दाना बन ही नहीं सकतीं. भारत की प्रमुख फसलें जैसे सरसों, सूरजमुखी, सेब, आम, अमरूद, दलहन और कपास पूरी तरह मधुमक्खियों के परागण पर निर्भर हैं. वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, मधुमक्खियों के खेतों में होने से सरसों की पैदावार में 25% से 40% तक की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है. इंसान को मिलने वाले विटामिन और मिनरल्स का एक-तिहाई हिस्सा उन फलों और सब्जियों से आता है, जिन्हें मधुमक्खियां सींचती हैं.
साल 2023 केंद्रीय कृषि मंत्रालय के नीतिगत यू-टर्न के बाद जिन 24 केमिकल पर से प्रतिबंध हटाया गया, उनमें से सीआईबीआरसी (CIBRC) और PAN India के दस्तावेजों में अत्यधिक विषैले श्रेणी में दर्ज मुख्य कीटनाशकों का विवरण इस प्रकार है.
ऐसफेट (Acephate)
यह मधुमक्खी के दिमाग के न्यूरो-एंजाइम्स को ब्लॉक कर देता है. इसके संपर्क में आते ही मधुमक्खी के पंख और पैर बेकाबू होकर फड़कने लगते हैं और लकवा मारने से उसकी मौत हो जाती है.
क्लोरोपायरीफॉस (Chlorpyrifos)
धूप पड़ते ही यह खेतों में जहरीली गैस छोड़ता है. उड़ती हुई मधुमक्खियों के श्वसन तंत्र में यह जहर जाते ही उनका दम घुट जाता है और वे खेतों में ढेर हो जाती हैं. 2023 के आदेश में इस पर केवल फल (बेर, साइट्रस) और तंबाकू पर रोक लगी, अन्य फसलों पर यह खुला बिक रहा है. केंचुओं को मिट्टी के अंदर मारने में भी इसका बड़ा हाथ है.
मैलाथियान (Malathion)
जब यह मधुमक्खी के शरीर में जाता है, तो उसके एंजाइम इसे 'मैलाऑक्सन' में बदल देते हैं, जो 60 गुना ज्यादा घातक होता है. हवा में इसके तैरते कणों के संपर्क में आते ही मधुमक्खियां सीधे जमीन पर गिर जाती हैं. सरकार ने इस पर टमाटर, सेब, आम जैसी फसलों पर आंशिक रोक लगाई, लेकिन कपास और मच्छर छिड़काव में इसका इस्तेमाल जारी है.
कार्बोफ्यूरान (Carbofuran)
यह एक अत्यंत खतरनाक लाल त्रिकोण कीटनाशक है. यह मिट्टी के भीतर केंचुओं को और बाहर कदम रखते ही मधुमक्खियों के केंद्रीय न्यूरल सिस्टम को नैनोसेकंड में ठप कर देता है. 2023 के आदेश में इसके केवल 3% CG फॉर्मूलेशन को मंजूरी मिली जो भारत के बाजारों में सबसे ज्यादा बिकती है.
डाइमेथोएट (Dimethoate)
यह मधुमक्खी के मस्तिष्क के उस हिस्से को नुकसान पहुंचाता है जो सूर्य की स्थिति से दिशा तय करता है. इसके असर से मधुमक्खी अपने छत्ते का रास्ता भूल जाती है और बाहर ही दम तोड़ देती है, जिससे पूरा छत्ता अनाथ हो जाता है.
थायोडिकार्ब (Thiodicarb)
जब मधुमक्खियां इसके छिड़काव वाले फसलों का रस पीती हैं, तो यह उनके पाचन तंत्र को अंदर से पूरी तरह जला देता है. इसके बाद वे छत्ते तक लौटने से पहले ही खेतों में दम तोड़ देती हैं.
क्विनालफॉस (Quinalphos)
यह रसायन मधुमक्खियों के शरीर की बाहरी त्वचा को सीधे भेदकर उनके नर्वस सिस्टम को जाम कर देता है. धान और तिलहन की फसलों पर यह अभी भी धड़ल्ले से बिक रहा है.
डेल्टामेथ्रिन (Deltamethrin)
यह सिंथेटिक पाइरेथ्रोइड वर्ग का रसायन है जो नसों में बिजली के झटके जैसे सिग्नल्स दौड़ता है. मधुमक्खी अति-उत्तेजना का शिकार होकर लगातार उल्टी करने लगती है...और शरीर सूखने से मर जाती है.
मंकोजेब (Mancozeb)
यह फंगिसाइड्स 2020 की लिस्ट में शामिल थे. जब इन्हें अन्य कीटनाशकों के साथ मिलाकर छिड़का जाता है, तो यह केंचुओं... और मधुमक्खियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को शून्य कर देते हैं, जिससे वे मामूली इन्फेक्शन से भी सामूहिक रूप से मर जाते हैं.
जब तक सरकारी तंत्र रासायनिक कंपनियों के अंधाधुंध मुनाफे के आगे घुटने टेकता रहेगा, तब तक हमारी धरती की कोख बेजान होती रहेगी और हमारी थाली में सिसकती हुई मौत का जहर परोसा जाता रहेगा. यह नीतिगत असंवेदनशीलता सिर्फ किसी सरकारी कानून का यू-टर्न नहीं है, बल्कि उन नन्हीं, मासूम और सबसे वफादार मधुमक्खियों का बेरहमी से किया जा रहा सामूहिक कत्ल है जो खुद भूखी रहकर हमारी फसलों में जिंदगी का मीठा रस घोलती हैं. सोचिए, जब ये नन्हे पंख हमेशा के लिए खामोश हो जाएंगे और हमारे खेतों की यह 'जीभ' ही जहर से नीली पड़ जाएगी, तब इंसानी बस्तियों में सिर्फ सन्नाटा और भुखमरी चीखेगी. रासायनिक मुनाफे की यह सोच हमारी आने वाली पीढ़ियों को ऐसी अंतहीन भूख और अकाल की आग में झोंक रही है, जिसकी कीमत हमारे बच्चे अपनी जिंदगी देकर चुकाएंगे और इतिहास हमारे इस लालच को कभी माफ नहीं करेगा.
'जहर के खिलाफ जंग' सीरीज को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?
पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी
पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फिर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?
पार्ट-15: एक्सपर्ट पैनल ने पैराक्वाट पर सौंपी रिपोर्ट, किसान-कंज्यूमर या कंपनी किसके साथ खड़ी होगी सरकार?
पार्ट-16: सुरक्षित विकल्प मौजूद फिर भी भारत में बिक रहे खतरनाक कीटनाशक, यह है कोई लाचारी या कंपनियों से यारी?
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