Paraquat Dichloride: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?

Paraquat Dichloride: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?

क्या पैराक्वाट डाइक्लोराइड बनाने-बेचने वाली कंपनियों और नीति-न‍िर्माताओं की नजर में भारत के नागरिकों की सेहत की कोई कीमत नहीं है? जब आस्ट्र‍िया, यूनाइटेड क‍िंगडम, स्विट्जरलैंड और चीन अपने लोगों को बचाने के लिए इसे बैन कर सकते हैं, तो भारत के खेतों में इसे खुलेआम झोंकने की वकालत किस आधार पर की जा रही है? जानिए इस 'खतरनाक जहर' की पूरी कहानी

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 Paraquat Dichloride: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा? खरपतवारनाशक पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इत‍िहास.

एक ऐसा केमिकल, जिसकी महज कुछ बूंदें भी इंसानी जिंदगी के लिए काल बन सकती हैं. जिसका दुनिया में कोई एंटीडोट यानी काट तक मौजूद नहीं है, वह भारत के खेतों में खुलेआम छ‍िड़का जा रहा है. हम बात कर रहे हैं खरपतवारनाशक यानी पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) हर्बिसाइड की. इस केम‍िकल की अत्यधिक विषाक्तता और मानव जीवन के लिए इसके जानलेवा खतरों को देखते हुए ही दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश इस पर पूरी तरह बैन लगा चुके हैं, लेकिन हमारे देश में कमजोर नियामक व्यवस्था का फायदा उठाकर आज भी इस घातक 'जहर' का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दुनिया के 74 देश इसे बेहद खतरनाक मानकर बहुत पहले कचरे के डिब्बे में फेंक चुके हैं, तब देशव्यापी चिंताओं के बावजूद भारत की मिट्टी में यह जहर क्यों उड़ेला जा रहा है? क्या हमारे सिस्टम में देश के नागरिकों की सेहत की कोई कीमत ही नहीं बची है?

आश्चर्यजनक किंतु सत्य

आईए पहले पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इतिहास समझते हैं. फिर भारत मे इस जहर के खुलेआम इस्तेमाल पर बात करेंगे. पैराक्वाट को पहली बार साल 1882 में दो ऑस्ट्रियाई वैज्ञान‍िकों द्वारा प्रयोगशाला में तैयार किया गया था. शुरुआती दौर में इस केमिकल को 'मिथाइल वायलोन' के नाम से जाना जाता था. उस समय इसके घातक रूप के बारे में किसी को अंदाजा नहीं था और इसका उपयोग केवल कपड़ों और अन्य चीजों को रंगने के लिए एक रासायनिक डाई के रूप में किया जाता था.

दशकों बाद, साल 1955 में पहली बार इसके खरपतवारनाशक गुणों की खोज हुई. यूनाइटेड किंगडम के बर्कशायर में स्थित 'इम्पीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज' (ICI) की 'जिलॉट्स हिल' प्रयोगशालाओं में काम कर रहे ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि यह केमिकल पौधों को बहुत तेजी से सुखाकर नष्ट कर सकता है. इस खोज के बाद, रासायनिक प्रक्रिया को औद्योगिक रूप देकर खुद ब्रिटिश कंपनी ICI ने ही साल 1961 में यूके के भीतर इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया. इसके बाद, साल 1962 में इसे दुनिया में पहली बार 'ग्रामोक्सोन' ब्रांड नाम से व्यावसायिक तौर पर बाजार में उतारा गया.

दिलचस्प बात यह है कि जिन देशों ने इस केमिकल को खोजा और पाला-पोसा, आगे चलकर वहां की सरकारों ने भी इसे इंसानी जिंदगी के लिए बेहद खतरनाक माना. यही वजह है कि आज वहां कोई भी किसान अपनी खेती में इसका छिड़काव नहीं कर सकता. इसके जानलेवा खतरों को देखते हुए ऑस्ट्रिया की सरकार ने साल 1993 में ही अपने देश में इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था. इसी राह पर चलते हुए इंग्लैंड ने भी साल 2007 में अपने देश की सीमाओं के भीतर पैराक्वाट की बिक्री और इसके छिड़काव पर कानूनी रूप से बैन लागू कर दिया.

यहां एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है क‍ि भले ही इंग्लैंड ने साल 2007 में अपनी मिट्टी और अपने नागरिकों की सेहत की रक्षा के लिए इस घातक जहर को बैन कर दिया था, लेकिन वहां की सरकार ने इसे बनाने वाली कंपनियों को विदेशों में मुनाफा कमाने की खुली छूट दे रखी थी. इंग्लैंड की फैक्ट्रियों में इस जानलेवा केमिकल का उत्पादन लगातार होता रहा और वहां से इसे भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों में धड़ल्ले से निर्यात किया जाता रहा.

सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस जानलेवा 'जहर' को बनाने वाली प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनी 'सिंजेंटा' का मुख्यालय जिस स्विट्जरलैंड में है, उसने अपने नागरिकों की रक्षा के लिए 1989 में ही इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था. हद तो यह है कि साल 2017 में चीन ने भी अपनी सरजमीं पर इसके इस्तेमाल को पूरी तरह गैरकानूनी घोषित कर दिया, जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि अब इसे बनाने वाली मूल कंपनी का मालिकाना हक अब खुद चीन के पास है.

यानी चीन अपने नागरिकों को इस मौत के केमिकल से दूर रखता है, लेकिन इसकी मैन्युफैक्चरिंग और मुनाफे का धंधा भारत जैसे देशों के सिर मढ़कर फल-फूल रहा है. हालांकि सिंजेंटा ने यह फैसला किया है कि वह जून 2026 के अंत तक पैराक्वाट का वैश्विक स्तर पर उत्पादन बंद कर देगी. सिंजेंटा के एक भारतीय प्रतिनिधि ने 'किसान तक' से इस बात की पुष्टि की है. लेक‍िन, इसे बनाने वाली बाकी कंपनियों का कारोबार चलता रहेगा. चौंकाने वाली बात यह है कि भारत सरकार ने इसे अब तक बैन नहीं किया है.

कौन देगा जवाब 

सवाल यह उठता है कि क्या इसे बनाने और बेचने वाली कंपनियों और भारतीय नीति-नियंताओं की नजर में भारत के नागरिकों की सेहत की कोई कीमत नहीं है? जब आस्ट्र‍िया, यूनाइटेड क‍िंगडम, स्विट्जरलैंड और चीन अपने लोगों को बचाने के लिए इसे बैन कर सकते हैं, तो भारत के खेतों में इसे खुलेआम झोंकने की वकालत किस आधार पर की जा रही है? बहरहाल, वैश्विक प्रतिबंधों की कतार में यूरोपीय संघ के ताकतवर देशों-फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन ने साल 2007 में ही लोगों की सेहत को ध्यान में रखते हुए अपने देश में इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था.

ब्राजील, थाईलैंड और मलेशिया ने साल 2020 में, कनाडा ने 2023 में और इसके बाद वियतनाम, दक्षिण कोरिया तथा ताइवान जैसे बड़े कृषि प्रधान देशों ने भी अपनी मिट्टी और किसानों को बचाने के लिए पैराक्वाट पर मुकम्मल रोक लगा दी. दुनिया भर के ये तमाम देश कृषि अर्थव्यवस्था और फसल सुरक्षा से समझौता किए बिना इस जहर का विकल्प ढूंढ चुके हैं. मगर अफसोस, दुनिया के कई देशों में प्रतिबंधित हो चुके इस भयंकर खतरे के बावजूद, भारत में केंद्रीय स्तर पर अभी तक कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. सवाल यह है कि आखिर भारतीय प्रशासन इस चौतरफा खतरे को देखने के बाद भी किस दबाव या लापरवाही में मौन साधे बैठा है?

भारत में पैराक्वाट की कहानी

भारत में हरित क्रांति के दौर में जब कृषि उत्पादन बढ़ाने और मैन्युअल लेबर (निराई-गुड़ाई) की लागत कम करने का दबाव था, तब इस केम‍िकल को यहां के बाजार में एंट्री मिली. भारत में किसी भी कीटनाशक को सेंट्रल इंसेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी (CIBRC) द्वारा अनुमति दी जाती है. CIBRC ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड 24% SL को भारत में केवल 9 फसलों में इस्तेमाल के लिए रज‍िस्टर्ड किया. इसमें चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का, और अंगूर शाम‍िल हैं. लेक‍िन, सवाल यह है क‍ि जब 74 देशों ने अपने नागर‍िकों की सेहत की सुरक्षा को खतरा देखते हुए इसे बैन कर द‍िया तो वो कौन से वैज्ञान‍िक, ब्यूरोक्रेट और मंत्री थे और हैं, ज‍िनकी वजह से इस जहर का यहां पर इस्तेमाल जारी रखा गया? स्थ‍िति यह है क‍ि कोई भी कृष‍ि वैज्ञान‍िक इसके ख‍िलाफ बोलने को तैयार नहीं है. आख‍िर उनकी इस जहर को बनाने वाली कंपन‍ियों के साथ क्या ह‍ित जुड़ा हुआ है? 

कमेटी की कानूनी ढाल

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उन 66 कीटनाशकों की तकनीकी समीक्षा करने के ल‍िए 8 जुलाई 2013 को एक कमेटी गठ‍ित की जो दुनिया के अन्य देशों में बैन थे, लेकिन भारत में उपयोग के लिए रज‍िस्टर्ड थे. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व राष्ट्रीय प्रोफेसर डॉ. अनुपम वर्मा इसके अध्यक्ष बनाए गए. यह कड़वा और खौफनाक सच है कि डॉ. अनुपम वर्मा कमेटी ने 2015 में पैराक्वाट डाइक्लोराइड को एक 'कानूनी ढाल' दे दी, जो आज देश की थाली में इस खतरनाक जहर को परोसने का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है. 

कमेटी ने जिन कड़े सुरक्षा मानकों, सुरक्षित पैकेजिंग और डॉक्टरों की ट्रेनिंग जैसी शर्तों के भरोसे इस जानलेवा केमिकल को भारत में हरी झंडी दी थी, वे आज पूरी तरह कागजी साबित हो रहे हैं. आलम यह है कि हर साल 100 मीट्रिक टन से ज्यादा पैराक्वाट डाइक्लोराइड हमारी फसलों पर डाला जा रहा है. खेतों के जरिए यह हमारे भोजन में पहुंच रहा है. बिना किसी सुरक्षा गियर के इसका छिड़काव कर रहे किसानों को यह नहीं पता कि जिस देश ने इसे बनाया वहां भी यह पूरी तरह बैन है.

व्यवस्था की इस खुली लापरवाही का सबसे भयानक रूप राजस्थान और मध्य प्रदेश के खेतों में दिख रहा है, जहां लेबर खर्च बचाने के चक्कर में खड़ी मूंग की फसल को सुखाने के लिए पैराक्वाट का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है. महज दो दिनों में जबरन सुखाकर काटी गई यह मूंग सीधे तौर पर हमारी फूड चेन का हिस्सा बन रही है, जिससे इस जानलेवा जहर का अंश सीधे उपभोक्ताओं की रसोई और पेट तक पहुंच रहा है. सबसे डरावनी बात यह है कि इस जहर का आज तक कोई निश्चित इलाज या एंटीडोट ही नहीं बना है.

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