
खरपतवारनाशी या जहर! 2,4-D पर सवाल. हमारी फसलों को खरपतवार से बचाने वाली 'दवा' क्या असल में हमारे ही भविष्य की कब्र खोद रही है? जिस निवाले को हम बड़े चाव से अपनी और अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए खा रहे हैं, क्या वह धीरे-धीरे हमारी रगों में कैंसर का धीमा जहर घोल रहा है? यह सवाल बेहद तीखा है, लेकिन इससे भी ज्यादा कड़वा और खौफनाक है भारत की कृषि व्यवस्था और नीति निर्माताओं का वह आंखें मूंद लेने वाला रवैया. इस लचर तंत्र ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की तमाम गंभीर चेतावनियों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और एक बेहद खतरनाक केमिकल को हमारे खेतों में खुलेआम तांडव करने का लाइसेंस दे रखा है. हम बात कर रहे हैं 2,4-D (2,4-डाइक्लोरोफेनॉक्सीएसेटिक एसिड) की. यह वही बदनाम केमिकल है जो अमेरिका-वियतनाम युद्ध में तबाही मचाने वाले कुख्यात 'एजेंट ऑरेंज' का मुख्य हिस्सा था.
कहने को यह 'सेलेक्टिव हर्बिसाइड' है जो सिर्फ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को खत्म करता है, लेकिन हकीकत में यह हमारी कृषि व्यवस्था की रीढ़ पर ही सीधा वार कर रहा है. फसलों में परागण कर लोगों के लिए भोजन उपलब्ध करचाने वाली बेजुबान मधुमक्खियों का यह केमिकल बड़ी बेरहमी से कत्ल कर रहा है. मुनाफे की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी कंपनियां और सिस्टम में बैठे लोग यह भूल गए हैं कि मधुमक्खियां खत्म हुईं, तो पूरा ईकोसिस्टम तबाह हो जाएगा. यह हर्बिसाइड केवल घास-फूस को नहीं मार रहा, बल्कि इंसानी सेहत और प्रकृति के सबसे वफादार पहरेदारों को भी तबाह कर रहा है.
आज जिसे हम खेती का किफायती औजार कहकर खेतों में छिड़क रहे हैं, उसका इतिहास मानवता को शर्मसार करने वाले सैन्य रहस्यों से जुड़ा है. एक केमिकल या मॉलिक्यूल के रूप में 2,4-D को सबसे पहले साल 1941 में आर. पोकोर्नी (R. Pokorny) नाम के वैज्ञानिक ने अमेरिका की एक लैब में तैयार किया था. लेकिन इसे एक घातक वनस्पति-नाशक हथियार के रूप में विकसित करने का श्रेय अमेरिका और ब्रिटेन दोनों देशों को एक समान जाता है. शुरुआत में इसका आविष्कार किसी किसान की मदद के लिए नहीं, बल्कि एक जैविक हथियार (Biological Weapon) के रूप में किया गया था.
अमेरिकी और ब्रिटिश सेनाएं चाहती थीं कि युद्ध के दौरान दुश्मन देशों की फसलों को पूरी तरह नष्ट करके उन्हें भूखा मार दिया जाए. युद्ध के कड़े गोपनीयता कानूनों के कारण वैज्ञानिकों को इसके पेटेंट तक की इजाजत नहीं थी. युद्ध खत्म होने के बाद, साल 1945 में कंपनियों ने इसे व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारा और खेतों को इस केमिकल का गुलाम बना दिया.
केमिकल 2,4-D का सबसे खौफनाक चेहरा 1955 से 1975 तक चले वियतनाम युद्ध के दौरान सामने आया. अमेरिकी वायुसेना ने वियतनाम के घने जंगलों को साफ करने और गुरिल्ला सैनिकों को बेनकाब करने के लिए आसमान से लाखों लीटर 'एजेंट ऑरेंज' (Agent Orange) नामक डिफोलिएंट का छिड़काव किया था. यह एक बेहद खतरनाक वनस्पति-नाशक रासायनिक हथियार था, जिसे 2,4-D और एक अन्य रसायन (2,4,5-T) को आधा-आधा मिलाकर बनाया गया था.
अमेरिकी सेना ने इसे वियतनाम के जंगलों पर हवाई जहाजों से छिड़का था ताकि:घने जंगलों के पत्ते पूरी तरह झड़ जाएं और वहां छिपे वियतनामी सैनिक आसानी से दिखाई दे सकें. इसका एक मकसद वियतनामी सैनिकों की खाद्य आपूर्ति खासतौर पर चावल की फसल को भी नष्ट करना था. इस केमिकल का अपना कोई रंग नहीं था. इसे जिन बड़े ड्रमों में भरकर युद्ध क्षेत्र में भेजा जाता था, उन ड्रमों की पहचान के लिए उन पर नारंगी रंग की पट्टियां बनी होती थीं, इसी वजह से इसका नाम 'एजेंट ऑरेंज' पड़ा.
वियतनाम के करीब 40 लाख लोग और कई अमेरिकी सैनिक इस जहरीले रसायन की चपेट में आए. इससे लोगों को कैंसर और नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारियां हुईं. इसका सबसे भयानक असर यह हुआ कि कई पीढ़ियों तक बच्चे गंभीर जन्मजात विकृतियों और शारीरिक विकलांगता के साथ पैदा हुए.अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दबाव के कारण अमेरिकी सेना ने 1971 में वियतनाम में एजेंट ऑरेंज का छिड़काव पूरी तरह बंद कर दिया. युद्ध के मैदान के इस जहर का एक हिस्सा 2,4-D आज भी आज हमारे नीति निर्माताओं की मेहरबानी से भारत के खेतों में अन्न के साथ उग रहा है.
जब कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने भारत में बिक रहे खतरनाक रसायनों की जांच के लिए डॉ. अनुपम वर्मा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया, तो इस केमिकल के जानलेवा लक्षण दोबारा सरकारी फाइलों में दर्ज हुए. गहन जांच के बाद सरकार ने 14 मई 2020 को बाकायदा एक ड्राफ्ट ऑर्डर जारी किया. इसका गजट हुआ, जिसमें भारत सरकार ने खुद 2,4-D को प्रतिबंधित करने के लिए जो वैज्ञानिक कारण लिखे थे, वे रोंगटे खड़े करने वाले थे.
सरकारी नोटिफिकेशन में साफ अक्षरों में लिखा गया था कि 2,4-D में 'डायोक्सीन' (Dioxin) तत्वों की भारी सघनता पाई जाती है, जो कि सीधे तौर पर कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाला) है. यह उत्पाद यूरोपीय संघ (EU) की प्राथमिकताओं के अनुसार 'एंडोक्राइन डिस्रप्टिंग केमिकल्स' (मानव शरीर के हार्मोन सिस्टम को तबाह करने वाले रसायनों) की श्रेणी-2 में शामिल था और यूएस-ईपीए (US-EPA) के विशेष स्क्रीनिंग प्रोग्राम की अंतिम सूची में दर्ज था.
देश के प्रमुख खाद्यान्नों जैसे गन्ने, आलू और मक्के की फसलों पर इसके सुरक्षा, अवशेष और पर्यावरण पर पड़ने वाले लंबे समय के असर के आंकड़े पूरी तरह अधूरे पाए गए थे. इन सब खतरों को देखते हुए इस आधिकारिक ड्राफ्ट में इसके उपयोग को भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित करने का कड़ा प्रस्ताव रखा गया था.
लेकिन असली खेल साल 2020 के ड्राफ्ट के बाद शुरू हुआ. होना तो यह चाहिए था कि खुद सरकार द्वारा कैंसरकारी माने जाने के बाद इसे तुरंत प्रभाव से बंद कर दिया जाता, लेकिन यहां से तंत्र ने एक ऐसा यू-टर्न लिया, जिसने सबको हैरत में डाल दिया.
अक्टूबर 2023 में जब सरकार ने अपना अंतिम और फाइनल आदेश (Insecticides Prohibition Order, 2023) जारी किया, तो बंद कमरों की बैठकों में बड़ा उलटफेर हो चुका था.
इसे यानी 2,4-D को बड़ी ही चालाकी से बैन की सूची से बाहर निकाल दिया गया. कृषि विभाग के अधिकारियों ने अपने ही द्वारा जारी 2020 की चेतावनी पर पानी फेरते हुए इसे 'हरी झंडी' दे दी और केवल इसके उपयोग पर कागजी सावधानियां लिखकर पल्ला झाड़ लिया. सवाल यह है कि जब सरकारी फाइलों में खुद इसके कैंसरकारी होने की बात कबूल की गई थी, तो किस रसूखदार लॉबी की घुड़की के आगे घुटने टेककर अधिकारियों ने देश के करोड़ों किसानों और उपभोक्ताओं की सेहत का खुला सौदा कर लिया?
भारत सरकार भले ही मेहरबान हो, लेकिन दुनिया के जागरूक देशों ने 2,4-D के जहरीलेपन को देखते हुए इस पर ताला लगा रखा है. कुवैत, वियतनाम और ओमान जैसे देशों में कृषि कार्यों के लिए 2,4-D के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है.जबकि अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी ने इसकी कई घातक एस्टर श्रेणियों को 'असक्रिय' घोषित कर दिया है. यूरोपीय संघ के देशों (जैसे स्वीडन, नॉर्वे और डेनमार्क) में इसके अंधाधुंध छिड़काव और एस्टर फॉर्म (गैस वाली दवा) के व्यावसायिक उपयोग पर बेहद सख्त पाबंदियां हैं, क्योंकि यह वहां के जल स्रोतों और जैव-विविधता के लिए काल साबित हो चुका है.
इस कहानी का दूसरा पहलू पेस्टीसाइड निर्माता संगठन मजबूती से सामने रखते हैं. जब सरकार ने 2,4-D सहित 27 रसायनों को बैन करने का मन बनाया था, तब उद्योग जगत की शीर्ष संस्थाओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. उद्योग जगत का साफ तर्क है कि केवल इसलिए कि कोई रसायन दूसरे देशों में प्रतिबंधित है, उसे भारत में बैन नहीं किया जा सकता.
एग्रो केमिकल कंपनियों के एक संगठन ने तब दावा किया था कि इन केमिकल पर प्रतिबंध लगाने से घरेलू बाजार और एक्सपोर्ट चौपट हो जाएगा. कंपनियों का तर्क यह रहता है कि वे यह लड़ाई अपनी तिजोरी के लिए नहीं, बल्कि भारतीय किसानों के हित के लिए लड़ रहे हैं. हालांकि, जब किसानों की सेहत की सुरक्षा के लिए उनसे पीसीओ रखने की बात की जाती है तो वो मैदान छोड़कर भाग जाते हैं.

एक तरफ एग्रो केमिकल कंपनियों का अरबों का टर्नओवर और 'सस्ती खेती' की दलील है, तो दूसरी तरफ मानव जीवन की सुरक्षा का गंभीर सवाल. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर अनुसंधान संस्था IARC ने 2,4-D को ग्रुप 2B (Possibly Carcinogenic) यानी इंसानों के लिए 'संभावित रूप से कैंसरकारी' केमिकल की श्रेणी में रखा है. दुनिया के कई विकसित देशों ने इसके खतरनाक एस्टर फॉर्मूलेशन पर भारी पाबंदियां लगा रखी हैं.
इसके बावजूद, भारत के नीति निर्माताओं और कृषि अधिकारियों का यह रुख कि "जब तक भारत की मिट्टी और इंसानों पर इसके पुख्ता और अकाट्य वैज्ञानिक आंकड़े नहीं मिलते, तब तक हम बैन नहीं करेंगे", पब्लिक हेल्थ के प्रति घोर संवेदनहीनता को दर्शाता है. क्या हमारे अधिकारियों को खुद अपने ही 2020 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के आंकड़ों और इसके वियतनामी अतीत पर भी भरोसा नहीं रहा? यह 'रिस्क मैनेजमेंट' के नाम पर सीधे तौर पर एग्रो केमिकल कंपनियों के हितों के आगे घुटने टेकने जैसा है. अधिकारियों ने जैसे लोगों की सेहत को दोयम दर्जे पर रख दिया है.
हमारी पूरी एग्रीकल्चर (कृषि) व्यवस्था को संचालित करने वाली मधुमक्खियों पर भी इस 2,4-D केमिकल ने बहुत बुरा असर डाला है. सीधी बात तो ये है कि 2,4-D इन्हें सीधे मौके पर भले न मारे, लेकिन उन्हें अंदर से पूरी तरह खोखला और लाचार जरूर बना देता है. प्रसिद्ध स्प्रिंगर जर्नल में प्रकाशित 'पेस्टिसाइड इंपैक्ट्स ऑन हनी बी फॉरेजिंग बिहेवियर' जैसी रिसर्च साफ बताती हैं कि इस केमिकल के धीमे असर के संपर्क में आते ही इन बेचारी मधुमक्खियों की याददाश्त, सीखने और दिशा भांपने की क्षमता इतनी कमजोर हो जाती है कि वे अपने छत्ते का रास्ता तक भूल जाती हैं.
इतना ही नहीं, यह केमिकल मधुमक्खियों के आंतरिक तंत्र को गंभीर तनाव देता है, जिससे विषैले भोजन के कारण छत्ते में पल रहे लार्वा का विकास रुक जाता है और वे दम तोड़ने लगते हैं. यह केमिकल उन जंगली फूलों को भी खत्म करता है जो इन मधुमक्खियों के भोजन का सहारा हैं.
युद्ध के मैदान में दुश्मनों की फसलें तबाह करने के इरादे से विकसित हुआ यह केमिकल आज खाद्यान्न सुरक्षा के नाम पर हमारी थाली में परोसा जा रहा है. सरकार और उसके नुमाइंदों को एग्रो केमिकल कंपनियों की तिजोरियों और तर्कों की फिक्र छोड़, देश के आम लोगों और किसानों की रगों में बहने वाले खून की चिंता करनी होगी. जब तक आम जनता और उपभोक्ता जागरूक होकर इस 'जहर' के खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक अधिकारी और कंपनियां मिलकर विकास के नाम पर हमारी थाली में 'स्लो पॉइजन' परोसते रहेंगे.
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