पैराक्वाट डाइक्लोराइड तो गया, अब ग्लाइफोसेट की बारी...कैसे खत्म होगी वैज्ञानिकों और जहर बेचने वालों की यारी?

पैराक्वाट डाइक्लोराइड तो गया, अब ग्लाइफोसेट की बारी...कैसे खत्म होगी वैज्ञानिकों और जहर बेचने वालों की यारी?

Glyphosate Files: जो केम‍िकल अमेर‍िका या यूरोप की जनता की सेहत के ल‍िए खतरनाक हो सकता है वो भारत के लोगों के ल‍िए अच्छा कैसे हो सकता है? यही वो बुन‍ियादी सवाल है ज‍िससे एग्रो केम‍िकल लॉबी को बहुत डर लगता है. इसील‍िए अब केंद्र सरकार के निशाने पर ग्लाइफोसेट जैसा विवादित खरपतवारनाशक है. कृषि विशेषज्ञों का साफ कहना है कि इंसानी सेहत और पर्यावरण को दांव पर लगाकर मुनाफे की खेती नहीं की जा सकती.

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पैराक्वाट डाइक्लोराइड तो गया, अब ग्लाइफोसेट की बारी...कैसे खत्म होगी वैज्ञानिकों और जहर बेचने वालों की यारी?ग्लाइफोसेट पर बैन लगाने की मांग हुई तेज

भारतीय कृषि को केम‍िकल के चंगुल से मुक्त कराने और 'धरती मां' की सेहत बचाने की दिशा में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने एक ऐसा ऐतिहासिक कदम उठा लिया है, ज‍िसने देश की एग्रो-केमिकल लॉबी की चूलें हिला दी हैं. देश के सबसे जानलेवा और जहरीले खरपतवारनाशकों में से एक, पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) पर आखिरकार केंद्र सरकार ने देशव्यापी प्रतिबंध लगाने के लिए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. इस बड़े फैसले के बाद देश के पर्यावरणविदों, कृषि विशेषज्ञों और आम जनता की नजरें अब दूसरे सबसे बड़े खलनायक यानी ग्लाइफोसेट (Glyphosate) पर टिक गई हैं. लेकिन सवाल सिर्फ इस जहर पर पाबंदी का नहीं है, सवाल कृषि मंत्रालय और सरकारी अनुसंधान संस्थानों के भीतर बैठे उन 'भेदियों' का भी है जो जनता की सेहत से ज्यादा केमिकल कंपनियों के मुनाफे की चिंता करते हैं.

चौहान का कड़ा रुख

वर्षों के इंतजार, जन-आंदोलनों और हजारों मौतों (आत्महत्या और दुर्घटनाओं के मामलों) के बाद, मंत्रालय के ड्राफ्ट ऑर्डर 2026 ने पैराक्वाट के उत्पादन, आयात, बिक्री और इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध का रास्ता साफ कर दिया है.केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस बार नीतिगत रुख साफ करते हुए कड़ा संदेश दिया है. 'किसान तक 'से एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा-"जो भी केमिकल इंसानी जिंदगी और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं, उसे खेतों में डालने का कोई औचित्य नहीं है. देश के लोगों की सेहत सर्वोपरि है." मंत्री के इस बयान ने साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'केमिकल-फ्री' खेती के विजन को जमीन पर उतारने के लिए अब सरकार किसी भी दबाव के आगे झुकने वाली नहीं है.

अब ग्लाइफोसेट की बारी क्यों?

पैराक्वाट के बाद अब ग्लाइफोसेट को बैन करने की मांग देश में सबसे मुखर हो चुकी है. इसकी मुख्य वजहें बेहद डराने वाली हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर रिसर्च संस्था (IARC-International Agency for Research on Cancer) ने साफ तौर पर ग्लाइफोसेट को इंसानों के लिए कैंसरकारी तत्वों की श्रेणी (Group 2A) में रखा है. दुनिया भर में इस केमिकल के खिलाफ हजारों मुकदमे चल रहे हैं. ग्लाइफोसेट को जर्मनी, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, वियतनाम, ऑस्ट्रिया  और खाड़ी देशों सहित दुनिया के 30 से अधिक मुल्कों में या तो पूरी तरह बैन क‍िया जा चुका है या फ‍िर इसके उपयोग पर कड़े कानूनी अंकुश हैं. तो भारत में इसे क्यों ब‍िकने द‍िया जाए? 

ग्लाइफोसेट की वजह से देश की साख को भी नुकसान पहुंच रहा है. हाल के वर्षों में भारत से यूरोपीय संघ और अन्य देशों को भेजे जाने वाले कृषि उत्पादों (जैसे बासमती चावल, चाय और मसाले) की सैकड़ों खेप केवल इसलिए खारिज कर दी गईं क्योंकि उनमें ग्लाइफोसेट के अवशेष पाए गए. यह देश की साख और कृषि अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बड़ा झटका है. 

एग्रो केमिकल कंपनियों की चालाकी

ग्लाइफोसेट पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने पूर्व में एक बड़ा कदम उठाया था, लेकिन एग्रो केमिकल कंपनियों ने उस कानूनी प्रयास की हवा निकाल दी. हुआ ये था कि केंद्र सरकार ने एक विशेष आदेश जारी कर ग्लाइफोसेट के खुले इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. नियम के तहत ग्लाइफोसेट का छिड़काव किसान खुद नहीं कर सकते थे, बल्कि इसे केवल मान्यता प्राप्त पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों (PCOs) के माध्यम से ही किया जाना अनिवार्य किया गया था, ताकि जहर का सीधे इंसानी शरीर से संपर्क न हो.

सरकार के इस फैसले से घबराकर देश की एग्रो-केमिकल कंपनियों के संघ तुरंत दिल्ली हाईकोर्ट चले गए. कंपनियों ने दलील दी कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में PCO का कोई इंफ्रास्ट्रक्चर ही मौजूद नहीं है, इसलिए सरकार का यह आदेश "व्यावहारिक नहीं है और इससे किसानों की लागत अत्यधिक बढ़ जाएगी". कंपनियों की मजबूत लॉबिंग और तकनीकी दलीलों के चलते दिल्ली हाईकोर्ट ने इस नोटिफिकेशन पर 'स्टे' दे दिया. नतीजा यह हुआ कि सरकार का वह ऐतिहासिक सुधार आज तक कानूनी दांवपेच की फाइलों में दबा रह गया और खेतों में इस जहर की अंधाधुंध अवैध बिक्री और छिड़काव जारी रहा.

सबसे बड़ी बाधा कौन?

हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं क‍ि केम‍िकल फ्री खेती हो, हमारे कृष‍ि मंत्री भी यही चाहते हैं. लेक‍िन, इस पूरी लड़ाई में सबसे कड़वी जमीनी हकीकत यह है कि जब भी सरकार किसी खतरनाक केमिकल को बैन करने की तैयारी करती है, केमिकल लॉबी का 'अंदरूनी नेटवर्क' सक्रिय हो जाता है. सूत्रों के मुताबिक, इस नेटवर्क में कुछ कृषि वैज्ञानिक खासतौर पर काम करते हैं. सरकारी कृषि विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों के कुछ बड़े वैज्ञानिक इन कंपनियों के फंड  पर चलते हैं. जब भी किसी केमिकल पर प्रतिबंध की बात आती है, ये वैज्ञानिक ऐसी 'प्रायोजित रिसर्च रिपोर्ट' तैयार कर देते हैं जो यह दावा करती है कि 'यह केमिकल पूरी तरह सुरक्षित है और इसके बिना देश का कृषि उत्पादन ठप हो जाएगा.' 

इन वैज्ञानिक रिपोर्टों को ढाल बनाकर प्रतिबंध की फाइलों को सालों-साल ठंडे बस्ते में डाल द‍िया जाता है. जो केम‍िकल दूसरे देशों में नागर‍िकों के ल‍िए खतरनाक घोष‍ित हो चुका है उसे यहां के ब‍िके हुए कृष‍ि वैज्ञान‍िक सुरक्ष‍ित बता देते हैं. वे नीतिगत फैसलों में ऐसी तकनीकी पेच फंसा देते हैं जिससे कंपनियों को मोहलत मिलती रहे. प्रतिबंध की फाइल पर जैसे ही कोई हलचल होती है, उसकी पल-पल की जानकारी इन वैज्ञान‍िकों के जरिए कंपनियों के मालिकों तक पहुंचा दी जाती है. इस गुप्त सूचना का फायदा उठाकर कंपनियां बाजार से अपना पुराना स्टॉक रातों-रात निकाल लेती हैं या फिर अंतिम फैसले से ठीक पहले अदालतों से 'स्टे-ऑर्डर' लाने की कानूनी घेराबंदी पूरी कर लेती हैं.

इस सांठगांठ का सबसे बड़ा इनाम रिटायरमेंट के बाद मिलता है. नियामक संस्थाओं से रिटायर होने वाले बड़े वैज्ञानिक तुरंत बाद में इन बड़ी केमिकल कंपनियों में भारी-भरकम पैकेज पर सलाहकार या बोर्ड मेंबर बन जाते हैं. इंडस्ट्री में आपको ऐसे कई उदाहरण म‍िल जाएंगे. 

नेतृत्व की मंशा क्या है? 

पैराक्वाट पर लगा प्रतिबंध इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जब देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ठान लेता है, तो अंदरूनी तौर पर काम करने वाले बिके हुए वैज्ञानिकों और केम‍िकल लॉबी का यह कॉकटेल भी बेअसर हो जाता है. कृषि मंत्रालय के रणनीतिकारों का मानना है कि पैराक्वाट की 30 दिनों की ड्राफ्ट अवधि समाप्त होने और अंतिम  अधिसूचना जारी होने के बाद, अगला प्रहार निश्चित रूप से ग्लाइफोसेट पर ही होगा. कंपनियों का मुनाफा अब देशवासियों की रगों में ज़हर घोलकर नहीं कमाया जा सकेगा.

'जहर के ख‍िलाफ जंग' सीरीज को पढ़ने के ल‍िए यहां क्ल‍िक करें:

पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?

पार्ट-2: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?

पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अध‍िकारी: WHO ने ज‍िसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?

पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली व‍िदेशी दाल और न‍ियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?

पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों

पार्ट-6: सरकार ने ज‍िस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कात‍िल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?

पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?

पार्ट-8: दुन‍िया के 31 देशों में बैन, भारत में ब‍िक्री जारी...डाइमेथोएट कीटनाशक पर स‍िस्टम की 'यारी' या लाचारी?

पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान

पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में स‍िस्टम का 'चहेता' क्यों?

पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृष‍ि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?

पार्ट-12: किसान-कंज्यूमर की फिक्र कौन करे, बैन पर हुआ खेल, कृषि मंत्रालय का 'जहर' के सौदागरों से क्यों है इतना मेल?

पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी

पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फ‍िर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?

पार्ट-15: एक्सपर्ट पैनल ने पैराक्वाट पर सौंपी रिपोर्ट, किसान-कंज्यूमर या कंपनी किसके साथ खड़ी होगी सरकार?

पार्ट-16: सुरक्षित विकल्प मौजूद फिर भी भारत में बिक रहे खतरनाक कीटनाशक, यह है कोई लाचारी या कंपनियों से यारी?

 

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