राजस्थान के डूंगरपुर जिले के किसान अब्बासी चिखली ने मुर्गी पालन के क्षेत्र में एक कमाल का देसी और सस्ता इलाज खोजा है. उन्होंने रसोई में मिलने वाली चीजों जैसे — हल्दी, अदरक, लहसुन, अजवाइन, काली मिर्च और गुड़ का इस्तेमाल करके एक खास हर्बल काढ़ा तैयार किया है. यह काढ़ा मुर्गियों के लिए 'सुरक्षा कवच' का काम करता है और उन्हें रानीखेत व ई-कोलाई जैसी कई खतरनाक बीमारियों से बचाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि 100 मुर्गियों की एक हफ्ते की खुराक का खर्च मात्र 45 रुपये आता है.
पश्चिम बंगाल के एक अनुभवी किसान, कर्णदेब रॉय ने पशुपालकों के लिए एक बहुत ही उपयोगी और सस्ती मशीन बनाई है, जिसे यूरिया मिनरल मोलासेस ब्लॉक मेकर कहा जाता है. बहुत कम कीमत वाली यह मजबूत मशीन एक घंटे में 20 से 25 पोषक ब्लॉक तैयार कर सकती है. इन ब्लॉक्स के उपयोग से गायों के दूध उत्पादन में 23% और बकरियों के शारीरिक वजन में 21% तक की शानदार बढ़ोतरी देखी गई है. लगभग 65 किलो वजन वाली इस मशीन को किसान अपनी सुविधा के अनुसार आसानी से कहीं भी ले जा सकते हैं.
कुम्बी तेराखा के किसान निंगथौजम इनाओचा को कृषि के माध्यम से एक बार फिर आस जगी है. किसान निंगथौजम इनाओचा के अनुसार, सालाना कमाई 20 लाख रुपये तक की होती है. आइए जानते हैं उनके सफलता की कहानी.
आंध्र प्रदेश के अरबिन्द इंफोसिस में इंजीनियर के पद पर काम करने के साथ-साथअपने गांव में आधुनिक मुर्गी पालन के जरिए सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं. नौकरी की व्यस्तता के बीच भी उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग वाली बुद्धि का इस्तेमाल किया और मुर्गी पालन को एक बड़े बिजनेस में बदल दिया. आज वे एक मुर्गे को 12 हजार की ऊंची कीमत पर बेचकर सालाना लाखों की अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं.ऑफिस की जिम्मेदारी और गांव में किसानी का यह तालमेल वाकई काबिल-ए-तारीफ है
इटावा की रहने वाली एक ग्रामीण महिला, मंत्रवती शाक्य ने खेती के आधुनिक तरीके अपनाकर एक मिसाल कायम की है. वह स्ट्रॉबेरी, ड्रैगन फ्रूट और बाजरा उगाकर सालाना लगभग तीन लाख रुपये कमाती हैं. सेल्फ-हेल्प ग्रुप और सरकारी योजनाओं के सहयोग से उन्होंने न सिर्फ अपनी ज़िंदगी बदली है, बल्कि अपने गांव की दूसरी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया है.
गढ़चिरौली जिले के मलांडा गांव के प्रोग्रेसिव किसान कृष्ण भागरथी भुरकुरिया ने अपनी मेहनत और दूरदर्शिता से वह कर दिखाया है जिसके बारे में लोग सिर्फ सोचते ही रह जाते हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक खेती के साथ अगर वैल्यू एडिशन और इंडस्ट्री को जोड़ा जाए तो आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है. उन्होंने केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री माइक्रो फूड एंटरप्राइजेज अपग्रेडेशन (पीएमएफएमई) योजना का फायदा उठाया.
मुजफ्फरपुर जिले के सर्फुद्दीन गांव के किसान राजू कुमार चौधरी ने आधुनिक खेती की मिसाल पेश कर दी है. दरअसल, जिस आलू की खेती को इलाके में लंबे समय से घाटे का सौदा माना जाता रहा, उसी खेती को उन्होंने मुनाफे का जरिया बना दिया है.
गुजरात के आदिवासी बहुल डांग जिले के एक गांव में 10वीं तक पढ़े युवक ने खेती की परंपरा को नए प्रयोग से बदला है. सरकारी सब्सिडी और आधुनिक तकनीक के सहारे स्ट्रॉबेरी की खेती से उसने लाखों की कमाई का रास्ता खोला है. यह कहानी अब दूसरे किसानों को भी सोच बदलने को मजबूर कर रही है. पढ़ें सफलता की कहानी...
कर्नाटक की प्रगतिशील महिला किसान श्रीमती पद्मिनी गौड़ा ने खेती की दुनिया में अपनी अनोखी सोच से क्रांति ला दी है. उन्होंने जमीन के 13.5 फीट नीचे एक विशेष 'सनकन चैंबर' तैयार किया है, जो बिना किसी महंगी मशीन के मशरूम के लिए जरूरी नमी और तापमान को प्राकृतिक रूप से बनाए रखता है .
आशीष मेहता धान, गेहूं, कपास जैसी परंपरागत फसलों के साथ-साथ दलहन, तिलहन, सब्जी और फल फसलों की विविध खेती कर रहे हैं. इसके अलावा वे डेयरी और बकरी पालन भी करते हैं. जैविक गुड़ और सरसों तेल के निर्माण से उन्होंने खेती को मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) से जोड़ा है. वह खेती में ड्रोन तकनीक का भी उपयोग कर रहे हैं. ड्रोन के जरिए सटीक कीटनाशक छिड़काव और फसल निगरानी से न सिर्फ लागत घटी है बल्कि समय और संसाधनों की भी बचत हुई है.
मुजफ्फरपुर के 23 वर्षीय आरव ने बैंक की नौकरी छोड़कर बतख पालन से सफलता हासिल की. मात्र 60 हजार रुपये में शुरू किए गए उनके फार्म से रोजाना 1,300 अंडे का उत्पादन होता है. उनकी मेहनत और आधुनिक सोच ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और यह कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है.
किसान राणाप्रताप का यह सस्ता 'खाद यंत्र' खेती की दुनिया में क्रांति ला रहा है, जिससे खेती में खाद का खर्च 50 फीसदी तक कम हो सकता है. यह देसी मशीन खाद को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाती है, जिससे न तो खाद बर्बाद होती है और न ही ज्यादा मजदूरों की जरूरत पड़ती है. कम लागत में बना यह स्मार्ट जुगाड़ न केवल समय बचाता है बल्कि छोटे किसानों की मेहनत को भी बहुत आसान बना देता हैं. अपनी इसी खासियत की वजह से यह यंत्र आजकल किसानों के बीच खूब धूम मचा रहा है और कमाई बढ़ाने का बेहतरीन जरिया बन गया है.
Success Story: शिखा सिंह चौहान दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट और नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी गांधीनगर, गुजरात से फूड टेक्नोलॉजी में पोस्ट-ग्रेजुएट हैं. वहीं, सोम्या सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय से फूड टेक्नोलॉजी में बीटेक हैं.
सहारनपुर के मिर्ज़ापुर गांव के किसान अमन प्रताप सिंह ने अपने खेत में एक अनोखा A-फ्रेम ट्रीहाउस बनाया है. मालदीव की यात्रा से प्रेरित होकर, यह ट्रीहाउस प्रकृति के बीच शांति और सुकून का अनुभव देता है. यह सिर्फ़ एक घर नहीं है, बल्कि प्रकृति से जुड़ने और मेडिटेशन करने की जगह है.
राजस्थान के प्रगतिशील किसान रावल चंद जी ने यह साबित कर दिया है कि असली शोध लैब में नहीं, बल्कि सीधे खेत की मिट्टी में होता है. उन्होंने अपने अनुभव से शकरकंद की तीन खास किस्में विकसित की हैं जो मिठास और सेहत से भरपूर हैं. वहीं कम शुगर के कारण शुगर मरीजों के लिए वरदान हैं. ये किस्में न केवल कम पानी में उगती हैं, बल्कि इनमें बीमारियां भी कम लगती हैं.
मध्य प्रदेश के सीधी जिले की मनीषा कुशवाहा आज नारी शक्ति की एक जीती-जागती मिसाल बन चुकी हैं. कभी घर के चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली मनीषा ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर अपनी किस्मत बदल दी. उन्होंने न केवल जैविक खेती को अपनाकर फसलों को रसायन मुक्त बनाया, बल्कि 150 अन्य किसानों को भी इस नेक काम से जोड़ा. उनकी असल पहचान तब बनी जब वे 'नमो ड्रोन योजना' के तहत 'ड्रोन सखी' बनीं.
इंजीनियर मोहम्मद कमर तौहीद ने इंजीनियरिंग का असली जादू दिखाते हुए कबाड़ से जुगाड़ कर एक ऐसी 'सुपर मशीन' तैयार की है, जिससे अब खेती में क्रांतिकारी बदलाव आएगा. इस मशीन से किसानों के हजारों रुपये बचेंगे, क्योंकि अब बीज बोने का खर्च आधा हो जाएगा. इस देसी अवतार वाली मशीन की खासियत यह है बहुत कम डीजल में खेत की जुताई होगी, जिससे पुरानी मशीनों की छुट्टी तय है.
सेहोरे, मध्य प्रदेश की महिला किसान संगीता बाई ने HRDP की मदद से अपनी खेती और जिंदगी बदल दी. गेहूं-सोयाबीन की कम आमदनी वाली खेती अब अमरूद और सब्जियों से भरपूर फसल और उच्च आय दे रही है. HRDP ने महिलाओं को प्रशिक्षण, तकनीकी मदद और आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया.
वेदांता एल्युमिनियम ने किसान दिवस पर ओडिशा और छत्तीसगढ़ के 20,000 से अधिक किसानों को तकनीक और निरंतर खेती के तरीकों से सशक्त बनाने की अपनी बढ़ोतरी दोहराई. महिला और पुरुष किसान नई तकनीक, डिजिटल उपकरण, पानी और मिट्टी की सुरक्षा, फसल एवं पशुपालन में सुधार के माध्यम से अपनी उत्पादकता और आय बढ़ा रहे हैं.
सेब की खेती करने वाले किसानों के लिए अब बरसों का इंतज़ार बीते ज़माने की बात हो गई है. एक नए और क्रांतिकारी शॉर्टकट आइडिया ने खेती का अंदाज़ ही बदल दिया है. जहां पहले सेब के बाग तैयार होने और भरपूर फसल देने में 10 साल लग जाते थे, वहीं अब इनोवेटिव आइडिया की मदद से एक किसान मात्र 1 साल में ही 3 गुना ज़्यादा पैदावार ले रहा हैं. यह 'फार्मर सीक्रेट' न केवल समय बचा रहा है, बल्कि लागत कम करके मुनाफे को आसमान पर पहुंचा रहा है.
बिहार के नवादा की रहने वाली डॉली कुमारी ने खेती को सस्ता और आसान बनाने का एक बेहतरीन रास्ता खोजा है. उन्होंने मात्र ₹15 प्रति लीटर की लागत में एक ऐसा जैविक 'प्लांट ग्रोथ प्रमोटर' तैयार किया है, जो पूरी तरह से केमिकल-मुक्त है और खेती की लागत को भारी मात्रा में कम करता है. इससे गोभी, टमाटर और बैंगन जैसी फसलों में लगने वाले 'सड़न रोग' और 'मिट्टी जनित रोगों' का खतरा लगभग खत्म हो जाता है.
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