नरसिंहपुर की रोशन आरा ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की. करीब ₹8 लाख की मदद से उन्होंने JCB और खाद की दुकान जैसे व्यवसाय शुरू किए और परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाया.
बागेश्वर के चौरसों गांव के किसान चंद्रशेखर पाण्डेय ने 22 साल की मुंबई की नौकरी छोड़कर आधुनिक खेती को अपनाया. करीब 150 नाली जमीन पर वे रंगीन गोभी, काला चावल, काला गेहूं, सब्जियां, दालें और औषधीय फसलें उगा रहे हैं. विविध खेती से उनकी आमदनी बढ़ी है और गांव में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं.
Lakhimpur Kheri Story: प्रिन्सी ने बताया कि व्यवसाय शुरू होने के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव आया है. वर्तमान में वह अपने स्नैक्स निर्माण व्यवसाय से हर महीने लगभग 40 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं. यह आय उनके परिवार के लिए एक मजबूत सहारा बनी है और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी मिला है.
नरसिंहपुर के गाडरवारा में युवा उद्यमी सोहिल मंसूरी ने पराली को समस्या नहीं, बल्कि कमाई और स्वच्छ ऊर्जा का जरिया बना दिया.ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स के जरिए कृषि अवशेषों से बायोमास पेलेट तैयार किए जा रहे है. इस पहल से किसानों को अतिरिक्त आय, युवाओं को रोजगार और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में नई राह मिली है.
सागर के बीना विकासखंड के ग्राम बेलई में किसान विवेक दुबे ने डेढ़ एकड़ में वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद निर्माण इकाई शुरू की है. 40-50 लाख रुपये की लागत वाली इस परियोजना में 100 से अधिक बेड तैयार किए गए हैं और रोजाना 1 टन जैविक खाद उत्पादन का लक्ष्य है.
जबलपुर के युवा हृदेश राय ने कोरोना काल में करीब 12 लाख रुपये सालाना कमाई वाली आईटी नौकरी छोड़कर वर्मी कंपोस्ट का कारोबार शुरू किया। छोटे स्तर से शुरू हुआ यह काम आज करीब 1.5 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर तक पहुंच चुका है। हृदेश ने अकेले कारोबार बढ़ाने के बजाय 26-27 किसानों को अपने साथ जोड़ा और उनकी तैयार वर्मी कंपोस्ट को बाजार उपलब्ध कराया। आज किसानों के नेटवर्क से सालाना 6 हजार टन से ज्यादा वर्मी कंपोस्ट का कारोबार होता है, जिसकी सप्लाई देश के कई राज्यों तक की जा रही है।
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के लालपुर गांव के राजकुमार हुरिया ने DAESI (Diploma in Agricultural Extension Services for Input Dealers) कोर्स के जरिए अपने करियर को नई दिशा दी. एक कृषि इनपुट डीलर के रूप में शुरुआत करने वाले राजकुमार ने वैज्ञानिक ट्रेनिंग और आधुनिक कृषि तकनीकों की मदद से खुद को किसानों के भरोसेमंद कृषि सलाहकार के रूप में स्थापित किया. MANAGE हैदराबाद और पंतनगर विश्वविद्यालय से मिली शिक्षा ने न केवल उनकी तकनीकी क्षमता बढ़ाई, बल्कि आय और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाई. उनकी प्रेरणादायक यात्रा बताती है कि ज्ञान, ट्रेनिंग और इनोवेशन के जरिये ग्रामीण कृषि विकास को कैसे नई मजबूती दी जा सकती है.
ग्राफ्टेड बैंगन की आधुनिक खेती ने किसान सुरेंद्र की कमाई बढ़ाने का नया रास्ता खोला.144 क्विंटल बैंगन उत्पादन से उन्हें ₹2.39 लाख का शुद्ध लाभ हुआ। कम लागत में बेहतर उत्पादन और अच्छी आमदनी के लिए ग्राफ्टेड तकनीक किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है.
किसान जो फसल उगाते हैं अगर उसका सही दाम ना मिले तो अच्छी खेती भी बेकार हो जाती है। मंडी में जब खुद एक किसान के तौर पर कर्नल सुभाष देसवाल अपने खेत की गाजर बेचने पहुंचे तो उन्हें भी अपनी मेहनत बेकार होती दिखी। वहीं से शुरू हुई वो कहानी जिसने आज सुभाष देसवाल को कैरेट किंग ऑफ इंडिया बनाकर एक मिसाल के तौर पर खड़ा कर दिया है। आप देखें भी और पढ़ें भी ये कहानी जिसमें आज एक किसान बिना अपनी जमीन के हर साल कई करोड़ रुपये कमा रहा है।
हैदराबाद के विष्णु और उनकी पत्नी कविता ने अपनी बचत और कविता के सोने के गहने गिरवी रखकर Agri Phero Solutionz की शुरुआत की. कंपनी फेरोमोन ट्रैप, ल्यूर्स और सोलर ट्रैप जैसी तकनीक के जरिए किसानों को कीटों से बचाने में मदद कर रही है. इसका उद्देश्य अनावश्यक रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल घटाकर खेती की लागत कम करना और पर्यावरण को सुरक्षित बनाना है.
सागर जिले के बीना के ग्राम मंडी बमोरा के किसान वीरेंद्र रघुवंशी ने करीब डेढ़ एकड़ में ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की है. कृषि विभाग के मार्गदर्शन में ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक तकनीकों से खेती की जा रही है.हाई-वैल्यू फसल से किसान को बेहतर और दीर्घकालीन आय की उम्मीद है.
पटना जिले के मनेर प्रखंड के गोपालपुर गांव के रहने वाले गुलशन कुमार ने नवोदय विद्यालय की सरकारी नौकरी छोड़कर माइक्रोग्रीन स्टार्टअप की शुरुआत की. फैटी लीवर की समस्या से राहत मिलने के बाद उन्होंने माइक्रोग्रीन को अपना व्यवसाय बनाया. आज वह ऑर्गेनिक माइक्रोग्रीन की खेती और बिक्री से हर महीने करीब 1 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं. उनका मानना है कि यह काम न केवल आय का अच्छा स्रोत है, बल्कि लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने में भी मदद कर रहा है.
महासमुंद की भारती बंसल ने धान की पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर ग्राफ्टेड टमाटर को अपनाकर यह साबित किया है कि खेती में बदलाव, तकनीक का इस्तेमाल और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर किसान कम क्षेत्र में भी बेहतर आर्थिक परिणाम हासिल कर सकते हैं.
राजस्थान के जोधपुर की 10 महिलाओं ने बाजरे को कमाई का जरिया बनाकर मिसाल कायम की है. गंगा राजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने प्रशिक्षण लेकर कई प्रोडक्ट्स तैयार किए. मेहनत और सही बाजार मिलने से समूह का सालाना कारोबार लाखों रुपये तक पहुंच गया है.
महासमुंद की महिला किसान कुमारी चंद्राकर ने पारंपरिक धान की खेती के साथ उद्यानिकी फसलों को अपनाकर अपनी आय बढ़ाई. राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 0.64 हेक्टेयर में गेंदे की खेती के लिए उन्हें ₹12,800 का अनुदान मिला.उन्होंने प्रति एकड़ करीब 20 क्विंटल गेंदा उत्पादन कर लगभग ₹31 प्रति किलो की दर से बिक्री की और खर्च निकालने के बाद करीब ₹2.07 लाख की शुद्ध आय हासिल की.
कोरबा की महिला किसान राजश्री मार्को ने ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक अपनाकर 1.20 हेक्टेयर में हाइब्रिड टमाटर की खेती से 100-120 टन उत्पादन हासिल किया. उन्होंने एक सीजन में करीब 8 से 10 लाख रुपये का शुद्ध लाभ कमाया. राष्ट्रीय बागवानी मिशन से मिली तकनीकी मदद ने उनकी खेती को नई दिशा दी.
मिर्जापुर के मवैया गांव के आशीष यादव ने अमेरिका में आयोजित U-20 वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जैवलिन थ्रो में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया. आशीष ने गांव के सूखे तालाब में लकड़ी के भाले से अभ्यास शुरू किया था. किसान परिवार से आने वाले आशीष की मेहनत और संघर्ष की कहानी युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है.
जशपुर के किसान अनारथ साय ने एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत कृषि प्रणाली, फसल विविधीकरण, उद्यानिकी और संरक्षित खेती को अपनाने पर जोर दिया है.उनका मानना है कि उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग और आधुनिक तकनीक से खेती का जोखिम कम कर सालभर आय के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं.
जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा की आसिया अकबर ने सीमित जगह में खेती को कमाई का जरिया बनाया है. घर के अंदर मशरूम उत्पादन से शुरुआत करने के बाद उन्होंने छत पर सब्जियां, मसाले और पौध तैयार करना शुरू किया. कृषि विभाग के मार्गदर्शन से उनका काम आगे बढ़ा और अब वह इससे हर महीने करीब 35 से 40 हजार रुपये तक कमा रही हैं.
जबलपुर की महिला किसान शीला कुशवाहा ने पारंपरिक खेती से हटकर प्राकृतिक खेती को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने की दिशा में सफलता हासिल की है. डेढ़ एकड़ में गेहूं, चना और विभिन्न सब्जियों की खेती के साथ वे बीजामृत और जीवामृत का उपयोग कर रही हैं. जैविक हाट में बेहतर कीमत मिलने से उनकी आमदनी बढ़ी है.
सहारनपुर के 71 वर्षीय किसान आदित्य त्यागी ने देसी गाय के गोबर से सम्भरानी कप बनाकर अनोखा कारोबार खड़ा किया है. रिटायर्ड फॉरेस्ट रेंजर आज हर महीने लाखों रुपये कमा रहे हैं. उनके पर्यावरण अनुकूल धूनी कप देशभर में ऑनलाइन और ऑफलाइन बिक रहे हैं, जिससे कई लोगों को रोजगार भी मिला है.
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