भारत में धड़ल्ले से जारी है हर्बिसाइड पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इस्तेमालदुनिया के 74 देशों में बैन हो चुके बेहद खतरनाक हर्बिसाइड पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) पर केंद्र सरकार अब देशव्यापी बैन लगाने की तैयारी में है. बढ़ते खतरों और ग्रामीण इलाकों में इसके कारण होने वाली मौतों को देखते हुए केंद्र ने डॉक्टरों और कृषि वैज्ञानिकों की एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया था. सूत्रों के मुताबिक, इस कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. बताया गया है कि इस केमिकल पर बैन लगाने की सिफारिश की गई है. अब केंद्र सरकार को इस बारे में अंतिम फैसला लेना है. लगभग डेढ़ सौ साल पहले खोजा गया पैराक्वाट डाइक्लोराइड ऐसा खरपतवारनाशक (Weed Killer) है, जिसका दुनिया में कोई एंटीडोट यानी काट मौजूद नहीं है.
सूत्रों के मुताबिक सरकार द्वारा गठित इस विशेष पैनल ने देश-विदेश के कई वैज्ञानिक शोधों और अस्पतालों से मिले आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन किया है. पैनल ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि पैराक्वाट का कोई जहरनाशक उपलब्ध नहीं है. इसके कारण दुर्घटनावश या जानबूझकर इसके संपर्क में आने वाले किसानों की जान बचाना डॉक्टरों के लिए नामुमकिन हो जाता है. बताया गया है कि कमेटी ने यह माना है कि यह केमिकल लिवर-किडनी फेलियर और नर्वस सिस्टम से जुडी दिक्कतों का कारण बन रहा है.
साल 2015 में अनुपम वर्मा समिति की सिफारिशों पर सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगाने के बजाय केवल इसकी पैकिंग और चेतावनी लेबल में बदलाव करने के निर्देश दिए थे. लेकिन हाल के दिनों में राज्यों के बढ़ते दबाव ने केंद्र को कड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया. तेलंगाना सरकार ने हाल ही में इसकी बिक्री पर 60 दिनों का बैन लगाया था, इसके बाद आंध्र प्रदेश ने बैन लगाया. ओडिशा भी अस्थायी बैन लगा चुका है.लेकिन, केरल द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को अदालत ने तकनीकी आधार पर उलट दिया था. साफ हो गया कि इस पर प्रभावी कार्रवाई केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है.
दरअसल, राज्यों के स्तर पर इस जहर को रोकने की कानूनी बेबसी केरल के उदाहरण से समझी जा सकती है. केरल सरकार ने जनस्वास्थ्य को देखते हुए पैराक्वाट पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा दी थी. लेकिन अदालत ने कंपनियों की याचिका पर इसे तकनीकी आधार पर पलट दिया. भारत के कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27 के तहत कोई भी राज्य सरकार किसी खतरनाक केमिकल की बिक्री और वितरण पर अधिकतम 60 दिन के लिए ही अंतरिम रोक लगा सकती है, जिसे विशेष परिस्थितियों में केवल 30 दिन और (कुल 90 दिन) बढ़ाया जा सकता है. इसके बाद स्थायी प्रतिबंध लगाने का संवैधानिक अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है.
तकनीकी आधार पर कोर्ट से प्रतिबंध हटने का एक खौफनाक नतीजा केरल के चर्चित 'शारोन राज हत्याकांड' में देखने को मिला. जहां एक प्रेमिका ने अपने मंगेतर को मारने के लिए इसी पैराक्वाट खरपतवारनाशक को आयुर्वेदिक काढ़े में मिला दिया था. जनवरी 2025 में सेशंस कोर्ट ने इस मामले को "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" मानते हुए महिला को मृत्युदंड की सजा सुनाई. यह मामला साबित करता है कि यह जहर खेतों से निकलकर अब समाज के लिए कितना बड़ा खतरा बन चुका है.
पैराक्वाट सिर्फ पौधों को ही नहीं, बल्कि इंसानी कोशिकाओं को भी उसी बेरहमी से नष्ट करता है. शरीर में जाने के बाद कुछ ही दिनों में यह लिवर, किडनी और हार्ट को डैमेज कर देता है. छिड़काव के दौरान यदि यह सीधे त्वचा के संपर्क में आए या आंखों में चला जाए, तो गंभीर रूप से त्वचा का जलना और अंधापन हो सकता है. पैराक्वाट का कोई एंटीडोट न होना तो एक चुनौती है ही, लेकिन डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी बेबसी इसका इलाज प्रोटोकॉल है. आम तौर पर जब किसी मरीज को सांस लेने में तकलीफ होती है, तो डॉक्टर तुरंत ऑक्सीजन सपोर्ट देते हैं. लेकिन पैराक्वाट के मरीज के साथ ऐसा करना उसकी मौत को और करीब लाना है. पैराक्वाट फेफड़ों में मौजूद ऑक्सीजन के साथ मिलकर 'सुपरऑक्साइड रेडिकल्स' बनाता है, जिससे फेफड़े और तेजी से गलने लगते हैं. इसलिए डॉक्टरों को मजबूरी में मरीज को कमरे की सामान्य हवा पर ही रखना पड़ता है.
केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIBRC) ने पैराक्वाट को केवल चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर के लिए ही मंजूरी दी है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण इलाकों में डीलर और किसान इसका उपयोग मूंग, उड़द या अन्य दलहनी फसलों को काटने से पहले 'जल्दी सुखाने' के लिए धड़ल्ले से कर रहे हैं, जो पूरी तरह अवैध है. यह इंसानी भोजन की चेन में सीधे जहर घोल रहा है. बहरहाल देखना यह है कि सरकार एग्रो केमिकल कंपनियों की लॉबी के आर्थिक हितों को तरजीह देती है या किसानों और आम लोगों की सेहत को?
जिन देशों ने पैराक्वाट डाइक्लोराइडको विकसित किया, उन्होंने अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए इस पर बहुत पहले रोक लगा दी थी. स्विट्जरलैंड ने 1989, ऑस्ट्रिया ने 1993, तथा ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने 2007 में इस पर बैन लगा दिया था. चीन ने 2017 में अपनी घरेलू खेती में इसके उपयोग को गैरकानूनी घोषित कर दिया, जबकि विडंबना यह है कि इसे बनाने वाली मूल कंपनी का मालिकाना हक अब खुद चीन के पास ही है. तमाम कंपनियां मुनाफे की वजह से इसे बैन नहीं होने देना चाहती हैं.
पैराक्वाट डाइक्लोराइड का खेल अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है. साल 2013 में सरकार ने खतरनाक एग्रो-केमिकल्स की समीक्षा के लिए 'डॉ. अनुपम वर्मा कमेटी' बनाई थी, जिसने 2015 में इस पर पूरी तरह से बैन लगाने के बजाय कुछ अव्यावहारिक कागजी शर्तों और सुरक्षा मानकों के आधार पर इस घातक जहर को हरी झंडी दे दी. इसके बाद, जब भी पैराक्वाट के जानलेवा होने और इसके किसी एंटीडोट (काट) न होने पर गंभीर सवाल उठाए गए, तो सरकार और कीटनाशक निर्माता कंपनियों ने इसी अनुपम वर्मा कमेटी की रिपोर्ट को अपनी 'अभेद्य कानूनी ढाल' बना लिया.
एग्रो केमिकल कंपनियां सीना ठोककर यह दलील देती रहीं कि देश के शीर्ष वैज्ञानिकों की कमेटी ने इसकी वैज्ञानिक समीक्षा कर इसे किसानों के हित में सुरक्षित पाया है. इस कानूनी कवच की आड़ में कंपनियां बरसों तक देश के नागरिकों की सेहत और फूड चेन में जहर घोलकर मुनाफा कूटती रहीं, लेकिन अब ऐसा लगता है कि कमेटी-कमेटी खेलने का यह खेल पूरी तरह खत्म होने वाला है.
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पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?
पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी
पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फिर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?
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