
बेनफुराकार्ब पेस्टिसाइड इंसानों के लिए जहर हैयूरोप के किसी आलीशान दफ्तर में बैठकर वैज्ञानिक जब किसी केमिकल को इंसानी नस्ल और पर्यावरण के लिए खतरनाक घोषित करते हैं, तो दुनिया के 28 सजग देश अपनी सरहदों पर उसके प्रवेश को कानूनन रोक देते हैं. लेकिन जब वही केमिकल भारत की सीमा में दाखिल होता है, तो इसके गंभीर खतरों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत के किसानों और कंज्यूमर्स की जान की कोई कीमत नहीं है? क्या लचर सरकारी तंत्र, नौकरशाही की सुस्त फाइलों और एग्रोकेमिकल कंपनियों के अरबों रुपये के मुनाफे के आगे हमारे नागरिकों की जिंदगी इतनी सस्ती हो चुकी है कि विदेशी बाजारों का वर्जित जहर यहां फसलों का रक्षक बनकर खेतों में खुलेआम डाला जा रहा है?
हम बात कर रहे हैं बेनफुराकार्ब (Benfuracarb) जैसे अत्यधिक विवादित और विषैले कीटनाशकों की. यह कहानी सिर्फ एक कीटनाशक की नहीं है. यह कहानी एग्रोकेमिकल कंपनियों के लालच, रीढ़विहीन सरकारी तंत्र और भारतीय नागरिकों की जान की कीमत को कौड़ियों के भाव आंकने की दास्तान है. बेनफुराकार्ब एक कीटनाशक और सूत्र कृमिनाशक (Insecticide and Nematicide) है. जो हानिकारक कीटों के साथ मित्र जीवों को भी मार देता है. यही नहीं, बेनफुराकार्ब नर्वस सिस्टम के लिए यह अत्यधिक विषैला है.
जापान की कंपनी ओत्सुका केमिकल कॉर्पोरेशन की प्रयोगशालाओं में 1981 में जन्मा बेनफुराकार्ब आज दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए अछूत हो चुका है. यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम सहित दुनिया के 28 देशों ने अपनी भावी पीढ़ियों को कैंसर, नपुंसकता और जहरीले भूजल से बचाने के लिए इस पर सालों पहले ताला लगा दिया है.
लेकिन कंपनियों के लिए मुनाफा सर्वोपरि है. जब पश्चिमी देशों के विकसित बाजारों के दरवाजे बंद हुए, तो इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके भारतीय साझेदारों ने भारत को अपना सबसे सुरक्षित डंपिंग ग्राउंड बना लिया. एग्रोकेमिकल लॉबी का यह गणित सीधा है. जब तक कानूनन रास्ता खुला है, तब तक भारतीय बाजारों से अंतिम रुपया भी निचोड़ लो. कंपनियां अच्छी तरह जानती हैं कि भारत के अधिकांश किसान कम पढ़े-लिखे और सीमांत हैं, जिन्हें तडाकी (3% GR) जैसे आकर्षक ब्रांड नामों और कीटों के तुरंत सफाए के नाम पर यह जहर आसानी से बेचा जा सकता है.
साल 2020 में भारत सरकार की नींद थोड़ी खुली थी. कृषि मंत्रालय ने डॉ. अनुपम वर्मा कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर बेनफुराकार्ब समेत 27 अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों को बैन करने का एक कड़क ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया. सरकारी फाइलों में खुद दर्ज किया गया कि यह केमिकल कितना बड़ा हत्यारा है. इसमें कार्सिनोजेनिक अशुद्धियां मौजूद हैं, जो मनुष्यों में कैंसर पैदा कर सकती हैं. सांस लेने के दौरान यह शरीर के भीतर जाने पर बहुत अधिक विषाक्त होता है. चूहों और खरगोशों पर इसके बेहद घातक और विषैले प्रभाव देखे जा चुके हैं. यह मिट्टी की परतों को भेदकर भूजल को खराब करता है, जिससे पीने का पानी जहरीला हो जाता है.
लेकिन इसके बाद शुरू हुआ फाइलों को दबाने, तारीखें बढ़ाने और कमेटियों के भीतर नई कमेटियां बनने का वो खेल, जिसमें भारतीय नौकरशाही माहिर है. शक्तिशाली पेस्टिसाइड लॉबी ने सरकार के सामने करोड़ों के निवेश डूबने और रोजगार घटने की दलीलें दीं. नतीजा क्या हुआ? तीन साल तक फाइलें टेबल-दर-टेबल घूमती रहीं और जब अक्टूबर 2023 का फाइनल आदेश (Insecticides Prohibition Order, 2023) आया, तो पर्दे के पीछे की सांठगांठ साफ दिखने लगी.
उस अंतिम सूची में से बेनफुराकार्ब को चुपचाप अतिरिक्त समीक्षा और डेटा के नाम पर बचा लिया गया और केवल 4 कीटनाशकों (डाइकोफोल, डिनोकैप, मेथॉमिल और मोनोक्रोटोफॉस) की बलि देकर सरकारी तंत्र ने अपनी पीठ थपथपा ली. सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय नागरिकों के फेफड़े, उनका लीवर और उनकी जान इतनी सस्ती है कि उस पर एग्रो केमिकल कंपनियों के मुनाफे को तरजीह दी जाए?
जब भी इन केमिकलों को पूरी तरह बैन करने की मांग उठती है, तो सरकारी बाबुओं और कंपनियों के पास एक रटा-रटाया तर्क होता है अगर ये सस्ते कीटनाशक बैन कर दिए गए, तो देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी, धान के पीले तने छेदक, पत्ती लपेटक और भूरे फुदके से फसलें बर्बाद हो जाएंगी और गरीब किसान महंगा विकल्प नहीं खरीद पाएगा.
केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIBRC) ने इसे धान की फसल के लिए नोटिफाइड कर रखा है. लेकिन मुनाफा कमाने के चक्कर में किसान इसका व्यावहारिक उपयोग गन्ने के कंसुआ कीट, मक्का, मिर्च, आलू व बैंगन जैसी सब्जियों के नेमाटोड को मारने के लिए भी धड़ल्ले से कर रहे हैं, जिसका कोई वैध सुरक्षा डेटा रजिस्टर्ड ही नहीं है. बाजार में आज आधुनिक, कम विषैले और जैविक विकल्प मौजूद हैं. लेकिन सरकारें इन सुरक्षित विकल्पों पर सब्सिडी देने या इन्हें बढ़ावा देने में सुस्ती दिखाती हैं, क्योंकि इसमें पुरानी कंपनियों का एकाधिकार टूटने का डर होता है.
बेनफुराकार्ब का सबसे बड़ा काला सच इसका बायोलॉजिकल मैकेनिज्म है. खेतों में छिड़काव के बाद यह टूटकर कार्बोफ्यूरान नाम का नया और मूल केमिकल से भी कहीं अधिक विषैला मेटाबोलाइट बनाता है. कार्बोफ्यूरान का इतिहास दुनिया मे बहुत हिंसक माना गया है.

अमेरिका और केन्या जैसे देशों में इसके दानों को खाकर लाखों पक्षी तड़प-तड़प कर मर गए. जब इन मरे हुए पक्षियों को शिकारी ईगल या बाजों ने खाया, तो वे भी मारे गए. इसी खूनी इतिहास के कारण अमेरिका ने इसे 2009 में ही बाहर कर दिया था. फॉरेंसिक साइंस और Medical जर्नल्स के मुताबिक, नर्वस सिस्टम को चंद मिनटों में ब्लॉक कर देने की इसकी घातक क्षमता के कारण, एशिया और विकासशील देशों में यह जहर इंसानी आत्महत्याओं और आपराधिक वारदातों का सबसे आसान और सस्ता जरिया बन गया.
केरल में एंडोसल्फान त्रासदी के बाद उभरा सामाजिक आक्रोश और पंजाब के मालवा क्षेत्र में कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से दूषित हुआ भूजल, ये सब गवाह हैं कि इन खतरनाक लाल त्रिकोण वाले केमिकलों ने हमारी मिट्टी को खोखला कर दिया है. लेकिन कृषि मंत्रालय के ढीले रवैये के कारण यह आज भी देश के बड़े हिस्से में बिक रहा है.
विकसित देशों की नीतियां एहतियाती सिद्धांत पर काम करती हैं अर्थात, अगर किसी केमिकल पर थोड़ा भी संदेह है कि वह कैंसर पैदा कर सकता है, तो उसे तुरंत बैन कर दो. लेकिन भारत का तंत्र लैश-बैश मॉडल पर चलता है जब तक लाशें न गिरें, जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो जाए, तब तक आंखें मूंदकर बैठे रहो. बेनफुराकार्ब का भारतीय खेतों में कानूनी रूप से बने रहना किसी एक विभाग की लापरवाही नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की विफलता है जो इंसानी जान की कीमत को सिर्फ एक नंबर और कंपनियों के टर्नओवर तक सीमित रखती है.
समय आ गया है कि इस सांठगांठ पर सीधे तीखे सवाल दागे जाएं. यदि अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक रिपोर्ट्स बेनफुराकार्ब को धरती और मानव शरीर के लिए काल मान चुकी हैं, तो भारत के नीति निर्माताओं को कौन सा विशेष ज्ञान प्राप्त है जो वे इसे देश की मिट्टी में मिलाने की खुली छूट दे रहे हैं? मुनाफे की इस अंधी दौड़ में साख सिर्फ सरकारों की नहीं, बल्कि उस समूचे तंत्र की दांव पर लगी है जो खुद को जनता का रखवाला कहता है.
सीरीज की खबरें यहां पढ़ें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?
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