खेती में जहर का दूसरा नाम है ऐसफेट!कहते हैं कि जब जंग मुनाफे और जिंदगी के बीच हो, तो अक्सर जीत रसूखदार तिजोरियों की ही होती है. हमारे देश की कृषि व्यवस्था में इसका सबसे ज्वलंत और दर्दनाक उदाहरण ऐसफेट (Acephate) है. यह खतरनाक इंसेक्टिसाइड (Insecticide) आज भारतीय खेतों में खुलेआम लोगों की सेहत से खेल रहा है. यह सिर्फ एक रसायन नहीं, बल्कि एग्रो केमिकल कंपनियों की जीती-जागती कहानी है जिसने सरकार के अपने ही फैसले को फाइलों के कब्रिस्तान में दफन कर दिया.
कहानी शुरू होती है 14 मई 2020 को, जब देश कोरोना महामारी के दौर से गुजर रहा था. उसी दौरान भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने एक अभूतपूर्व और साहसिक कदम उठाया. सरकार ने 'कीटनाशक निषेध आदेश 2020 (Pesticide Prohibition Order 2020) का एक आधिकारिक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया. इस ड्राफ्ट का मकसद था देश के पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और बेजुबान जीवों को बचाने के लिए ऐसफेट सहित 27 बेहद खतरनाक और जेनेरिक कीटनाशकों पर पूरी तरह से ताला लगाना. इस सरकारी गजट में सरकार ने खुद काले अक्षरों में ऐसफेट के खिलाफ जो दलीलें दी थीं, वो आज भी आंखें खोलने वाली हैं.
सरकार ने खुद माना था कि यूरोपीय संघ (EU) के 27 देशों, ब्रिटेन, चीन, मलेशिया, ओमान और फिलीस्तीन समेत दुनिया के 32 देशों ने इसकी भयावहता को देखकर इसे अपने देश से बहुत पहले ही खदेड़ दिया है. सरकारी दस्तावेज गवाह है कि 'डॉ. अनुपम वर्मा समिति' और पंजीकरण समिति ने साफ कहा था कि इसके इस्तेमाल को जारी रखने का कोई ठोस और सुरक्षित डेटा मौजूद नहीं है.
ड्राफ्ट नोटिफिकेशन की आखिरी पंक्तियों ने इस जहर की असलियत उजागर कर दी थी, जिसमें लिखा था: "यह एक ऑर्गेनोफॉस्फ़ेट योग है जो मधुमक्खियों के लिए विषाक्त होता है, इसलिए इसका आयात, विनिर्माण, विक्रय और उपयोग कृषि क्षेत्र में निषिद्ध होगा." यानी मंत्रालय को बखूबी पता था कि यह इंसानी तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को अपाहिज करने के साथ-साथ हमारी खेती की रीढ़'मधुमक्खी' का कत्लेआम कर रहा है.
इस ड्राफ्ट के आते ही एग्रोकेमिकल इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया. अरबों रुपये का मुनाफा कमाने वाली बड़ी खाद-बीज और कीटनाशक निर्माता कंपनियों ने अपनी पूरी ताकत इस बैन को रोकने में झोंक दी. यहां से शुरू हुआ दबाव, प्रभाव और लॉबिंग का वो खेल, जिसने नीति-निर्धारकों के हाथ बांध दिए.
एग्रो केमिकल कंपनियों की लॉबी ने बड़ी चालाकी से किसानों के हितों को आगे कर दिया. दलील दी गई कि अगर ऐसफेट जैसे सस्ते कीटनाशक बंद हुए, तो किसानों की लागत बढ़ जाएगी और उनके पास फसलों को बचाने के लिए कोई दूसरा किफायती विकल्प नहीं बचेगा. ड्राफ्ट पर आपत्तियां दर्ज कराने के नाम पर कंपनियों ने सरकार से अतिरिक्त समय मांगा. मामले को अलग-अलग कमेटियों, समीक्षा बैठकों और अदालती याचिकाओं के मकड़जाल में ऐसा उलझाया गया कि सरकार का वो सख्त रवैया धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा.
अल्टीमेटम और दावों के इस चक्रव्यूह का नतीजा यह हुआ कि साल 2020 का वह क्रांतिकारी ड्राफ्ट कानून की शक्ल ही नहीं ले पाया. एग्रो केमिकल कंपनियों का मुनाफा देश की सामूहिक सेहत और मित्र कीटों की जिंदगी पर भारी पड़ गया. नतीजतन, सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े और ऑल-आउट बैन का वो संकल्प फाइलों में ही दबा रह गया.
खतरा सिर्फ मधुमक्खियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे इंसानी जिंदगी को भी नुकसान पहुंचा रहा है. अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (USEPA) ने ऐसफेट को 'संभावित मानव कैंसरकारी' (Possible Human Carcinogen) की श्रेणी में रखा है. वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में चूहों पर हुए परीक्षणों में यह साबित हो चुका है कि यह केमिकल लीवर ट्यूमर और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों को जन्म देता है. अमेरिकी एजेंसी ने इसके खतरे को देखते हुए कृषि में इसके उपयोग को पूरी तरह समाप्त करने का कड़ा प्रस्ताव भी दिया है.
लेकिन यहां सवाल भारत का है. आज जब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत का बासमती चावल इस ऐसफेट के जहरीले अवशेषों के कारण रिजेक्ट होने लगा है, तब जाकर पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसी राज्य सरकारों ने बासमती बेल्ट में इसकी बिक्री पर आंशिक रोक लगाई. लेकिन देश के बाकी हिस्सों में आज भी यह 'धीमा जहर' धड़ल्ले से बिक और छिड़का जा रहा है. सवाल यह है कि आखिर कब तक चंद कंपनियों के मुनाफे के लिए हमारी मिट्टी और इंसानों को बीमार किया जाएगा. कब तक प्रकृति के सबसे प्यारे दोस्त 'मधुमक्खी' को मौत के घाट उतारा जाता रहेगा?
ऐसफेट की खोज अमेरिकी केमिकल और तेल कंपनी शेवरॉन के रिसर्च विंग द्वारा 1970 के दशक में की गई थी. इसका इतिहास सिर्फ एक सामान्य कीटनाशक की खोज भर नहीं है, बल्कि इसके साथ कई बड़े विवाद, गंभीर स्वास्थ्य खतरे और पर्यावरण से जुड़े काले पन्ने भी जुड़े हैं. ऐसफेट का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि जब यह किसी जीव (या इंसान) के शरीर के भीतर जाता है या पर्यावरण में टूटता है, तो यह 'मेथेमिडोफॉस' नामक एक बेहद जहरीले उप-उत्पाद में बदल जाता है. मेथेमिडोफॉस रासायनिक रूप से ऐसफेट से कई गुना अधिक खतरनाक और जानलेवा रसायन है, जो इंसानी नर्वस सिस्टम को अपाहिज कर सकता है. इसी वजह से वैज्ञानिक इसे 'छुपा हुआ जहर' भी मानते हैं.
यह एक सिस्टमिक कीटनाशक है, जिसे पौधे अवशोषित कर लेते हैं. जब कोई कीट पौधे के किसी भी हिस्से को खाता है या उसका रस चूसता है, तो यह उसके तंत्रिका तंत्र को ब्लॉक करके उसे नष्ट कर देता है. कई स्थानीय बाजारों या दुकानों पर इसे मिर्च या सब्जियों की फसल पर भी इस्तेमाल के लिए बेचा जाता है, लेकिन भारत सरकार के आधिकारिक केंद्रीय डेटाबेस के अनुसार यह मुख्य रूप से कपास, धान और कुसुम के लिए ही स्वीकृत है. खाद्य सुरक्षा मानकों (MRL) के उल्लंघन और जहर के अवशेष बचने के खतरे के कारण सब्जियों पर इसके उपयोग से बचने की सलाह दी जाती है. धान और कपास की फसल पर इसका बार-बार छिड़काव करने से 'मित्र कीट' मर जाते हैं और फिर हानिकारक कीट दोगुनी तेजी से वापस हमला करते हैं.
सीरीज की खबरें यहां पढ़ें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों?
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