
मधुमक्खियों के लिए जहर है कार्बोफ्यूरानअमेरिका और यूरोप ने जिस जहर को इंसानों, पक्षियों और किसानों की सबसे बड़ी मददगार 'मधुमक्खियों' का 'कातिल' मानकर सालों पहले बैन कर दिया था, वह भारतीय सिस्टम की कमियों के चलते आज भी हमारे खेतों में फसल सुरक्षा के नाम पर डाला जा रहा है. सरकारी दस्तावेजों के सबूतों के साथ एग्रो-केमिकल कंपनियों के मुनाफे, कमजोर कानूनों और राजनीतिक ढोंग के इस पूरे चक्र को आसानी से समझा जा सकता है. हम बात कर रहे हैं कार्बोफ्यूरान (Carbofuran) की. इसका इतिहास 1960 के दशक में शुरू हुआ, जब अमेरिकी एग्रोकेमिकल कंपनी FMC कॉरपोरेशन की लैब में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा केमिकल बनाया जो पौधे की रग-रग में समा जाता था.
दावा था कि कार्बोफ्यूरान फसल को छूने वाले हर कीड़े का नामोनिशान मिटा देगा. भारत में इसे चमकीले नीले दानों के रूप में पेश किया गया. यह एक अत्यंत शक्तिशाली सिस्टेमिक कीटनाशक है, जिसका उपयोग फसलों को कीटों, दीमक और नेमाटोड से बचाने के लिए होता है. हालांकि, समय के साथ पता चला कि कार्बोफ्यूरान सिर्फ फसलों के लिए नुकसानदेह कीड़ों को ही नहीं मारता, बल्कि मित्र कीटों को भी खत्म कर देता है. परागण करने वाली और जैव-विविधता की रीढ़, मधुमक्खियों के लिए यह एक घातक न्यूरोटॉक्सिन है. इसके संपर्क में आते ही मधुमक्खियों का तंत्रिका तंत्र ठप हो जाता है और वे अपने छत्ते तक लौटने से पहले ही दम तोड़ देती हैं. किसानों की इस सबसे बड़ी मददगार प्रजाति पर मंडराते इस खतरे ने पर्यावरणविदों को झकझोर कर रख दिया है
साल 1994 की बात है. अमेरिका ने देखा कि इस जहर के दानों को बाजरा समझकर खाने से उनके देश में हर साल 20 लाख प्रवासी पक्षी तड़पकर मर रहे हैं. फिर अमेरिकी सरकार ने इसके दानेदार रूप पर तुरंत ताला लगा दिया. इसके बाद 2008 में यूरोपीय संघ (EU) ने अपने सभी 27 देशों में कार्बोफ्यूरान के हर रूप को इंसानियत, वन्यजीवों और मधुमक्खियों के लिए कलंक मानते हुए पूरी तरह बैन कर दिया.
साल 2009 में अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (US EPA) ने इस पर 'जीरो टॉलरेंस' लागू करते हुए इसके लिक्विड रूप को भी बैन कर दिया. अमेरिका ने कानून बनाया कि यदि किसी भी फल, सब्जी या अनाज में कार्बोफ्यूरान का एक अंश भी मिला, तो उसे तत्काल नष्ट कर दिया जाएगा.
विरोधाभास देखिए. जिस देश ने इस खतरनाक केमिकल का आविष्कार किया, उसने अपने पर्यावरण, पक्षियों और मधुमक्खियों को बचाने के लिए इसे बैन कर दिया. लेकिन भारत में, इसके आविष्कार के दशकों बाद भी, यह जहर हमारे कृषि तंत्र का चहेता बना हुआ है.
साल 2020 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर कार्बोफ्यूरान सहित 27 खतरनाक कीटनाशकों को पूरी तरह बैन करने का प्रस्ताव रखा. तब लगा कि सिस्टम की सोई हुई आत्मा जाग गई है. लेकिन इसके बाद शुरू हुआ एग्रो केमिकल लॉबी का असली खेल.
कीटनाशक निर्माता कंपनियों के संगठनों ने सरकार को कोर्ट जाने की धमकी दी. तर्क दिया गया कि इससे उनका व्यापार चौपट हो जाएगा. नतीजतन, अक्टूबर 2023 में जो अंतिम गजट नोटिफिकेशन आया, उसने पूरी व्यवस्था के दोहरे मापदंड को सरेआम नंगा कर दिया. सरकार ने आदेश निकाला कि हम कार्बोफ्यूरान के सभी रूपों को प्रतिबंधित करते हैं, सिवाय कार्बोफ्यूरान 3% सीजी (दानेदार रूप) के.
अब इस चालाकी को समझिए. भारत के बाजारों में बिकने वाला 95% से ज्यादा कार्बोफ्यूरान पहले से ही केवल इसी 3% दानेदार रूप में बिक रहा था. यानी सरकार ने जनता को दिखाने के लिए 'बैन' शब्द का इस्तेमाल किया, लेकिन कंपनियों की तिजोरी भरने वाले मुख्य प्रोडक्ट को छूने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. यह बैन नहीं बल्कि एक तरह से कंपनियों के आगे सिस्टम का आत्मसमर्पण था.
जो लोग कार्बोफ्यूरान को सामान्य कीटनाशक मानकर हल्के में लेते हैं, उनके मुंह पर आधिकारिक सरकारी दस्तावेज सबसे बड़ा तमाचा है. मई 2020 में आए ड्राफ्ट का पन्ना चीख-चीखकर इसकी भयावहता की गवाही दे रहा है.

सरकारी दस्तावेज साफ कहता है कि कार्बोफ्यूरान एक 'लाल त्रिभुज' वाला कीटनाशक है. भारतीय मानकों में लाल रंग का मतलब होता है अत्यधिक विषैला. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तय किए गए पैमानों में यह वर्ग-1बी के तहत पर्यावरण और जीवन के लिए सीधा खतरा है.
इस जहर की तीव्रता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि इसका स्वीकार्य दैनिक सेवन (ADI) मात्रा मात्र 0 से 0.001 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर का वजन तय की गई है. यानी इसकी एक सुई की नोक के बराबर की मात्रा भी इंसानी शरीर के वजन के अनुपात में जानलेवा साबित हो सकती है.
यह दस्तावेज उजागर करता है कि यह उत्पाद यूरोपीय संघ के 'अंतःस्रावी विघटनकारी केमिकल' की प्राथमिकता-2 की श्रेणी में आता है. साथ ही यह 'एंडोक्राइन डिसऑर्डर स्क्रीनिंग प्रोग्राम' (EDSP) की अंतिम सूची की टियर-1 स्क्रीनिंग में शामिल है. इसका सीधा मतलब यह है कि यह इंसानों और जानवरों के हार्मोनल संतुलन को पूरी तरह बिगाड़कर नपुंसकता, भ्रूण को नुकसान और थायराइड जैसी गंभीर बीमारियां पैदा कर सकता है.
सरकारी दस्तावेज का सबसे हैरान करने वाला और खोजी हिस्सा इसके बिंदु नंबर 2 और 4 में छिपा है, जो सीधे तौर पर हमारी व्यवस्था की रीढ़ पर सवाल उठाता है.
रिपोर्ट का बिंदु 2 साफ अक्षरों में लिखता है कि इसे बनाने और बेचने वाली कंपनियों द्वारा कोई अपशेष या परसिस्टेंस (मिट्टी/पर्यावरण में बने रहने का) डेटा प्रस्तुत नहीं किया गया है. यानी जो कंपनियां इसे सुरक्षित बताकर बाजार में बेच रही हैं, उनके पास खुद यह साबित करने का कोई वैज्ञानिक डेटा नहीं है कि यह जहर हमारी फसलों और मिट्टी को कितने सालों तक जहरीला बनाए रखता है. बिना डेटा के यह व्यापार सिर्फ अंधेरगर्दी है.
इसे 63 देशों में बैन किया गया है. यह कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है. यह यूरोपीय संघ में अनुमोदित नहीं है. पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क (PAN Data) के अनुसार ईयू, यूके, अर्जेंटीना, कनाडा, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के 63 देशों ने इसे पूरी तरह 'बैन' घोषित कर रखा है.
इस पूरे दस्तावेज का सबसे बड़ा और धारदार सवाल इसके बिंदु नंबर 5 और 6 से निकलता है. दस्तावेज खुद गवाही दे रहा है: "इसके उपयोग के लिए विकल्प मौजूद हैं.
जब कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी कमेटियों ने यह मान लिया है कि कार्बोफ्यूरान की जगह इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित और असरदार विकल्प बाजार में पहले से मौजूद हैं, तो फिर किस मजबूरी या किस दबाव के तहत इसे भारतीय बाजारों में बिकने दिया जा रहा है?दस्तावेज की अंतिम सिफारिश बेहद सख्त और स्पष्ट थी. जिसमें लिखा गया है कि यह उत्पाद मधुमक्खियों, जलीय जीवों और पक्षियों के लिए भी विषाक्त है, इसलिए इसका आयात, विनिर्माण, विक्रय, परिवहन, वितरण और उसका उपयोग कृषि क्षेत्र में निषिद्ध होगा.
जब सरकारी जांच खुद कह रही है कि इसके निर्माण से लेकर छिड़काव तक सब कुछ "निषिद्ध" होना चाहिए, तो दिल्ली के गलियारों में बैठे नीति-नियंताओं ने 2023 में इसके दानेदार रूप (3% CG) को बचाने के लिए कानून की भाषा को क्यों बदल दिया? क्या चंद कंपनियों के मुनाफे के आगे कृषि मंत्रालय ने घुटने टेक दिए हैं?
जब केंद्र का पूरा सिस्टम कॉरपोरेट और राजनीतिक नफे-नुकसान के तराजू पर नागरिकों, परिंदों और मधुमक्खियों की जिंदगी तौल रहा हो, तब उम्मीद की किरण केवल जन-जागरूकता से दिखाई देती है. केरल ने केंद्रीय लॉबी के दबाव को दरकिनार करते हुए अपने राज्य में कार्बोफ्यूरान को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया. सिक्किम ने खुद को 100 फीसदी केमिकल फ्री राज्य बना लिया.लेकिन बाकी देश कब जागेगा? कब तक हमारे बच्चों की थाली में बीमारियां परोसने वाला, और हमारे खेतों से किसानों की सबसे बड़ी दोस्त मधुमक्खियों का सफाया करने वाला यह अमेरिकी कचरा बिकता रहेगा?
सीरीज की खबरें यहां पढ़ें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
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