
खेत बचाओ अभियान का ढोल पीटते हुए 30 दिन बीत गए. तमाशा खत्म हुआ. रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जो खेत आईसीयू में पहुंच चुके हैं, उन्हें ठीक करने के नाम पर महकमे ने एक कागजी रस्म पूरी कर दी. लेकिन मजाल है कि इस पूरे अभियान के बीच एक बार भी इस बात की समीक्षा हुई हो कि आखिर हमारे खेतों को खराब करने वाले असली गुनहगार कौन हैं? कृषि मंत्रालय के लिए शर्म की बात यह है कि देश को आजाद हुए इतने दशक बीत गए, लेकिन यह पूरा सरकारी तंत्र किसानों को आज तक यह बुनियादी बात भी नहीं समझा पाया कि खेत में यूरिया झोंकने का नफा-नुकसान क्या है. कैसे इस अंधाधुंध मिलावट से हमारी धरती और इंसानी सेहत, दोनों धीरे-धीरे तबाह हो रही हैं.
हरित क्रांति के दौर से लेकर आज तक, देश के अन्नदाता ने सिर्फ उसी सरकारी व्यवस्था और वैज्ञानिक सलाह पर भरोसा किया जिसे आधुनिक कृषि का पर्याय बनाकर परोसा गया था. अधिक पैदावार के लालच में जिस रासायनिक खाद और जानलेवा कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल का पाठ पढ़ाया गया, वह किसानों की नहीं बल्कि कंपनी परस्त नीतियों और नाकाम वैज्ञानिक मॉडलों की उपज थी.
सदियों से देसी बीजों और गोबर की खाद से धरती मां की सेवा करने वाले पारंपरिक किसान पर पहले मुफ्त बांटकर केमिकल का नशा थोपा गया और फिर बैंकों के कर्ज और मंडियों की खरीद को इससे जोड़कर उसे पूरी तरह लाचार कर दिया गया. आज जब जमीन खराब हो रही है और इंसान कैंसर जैसी भयानक बीमारियों से मर रहा है, तब अपनी ही ऐतिहासिक भूलों और कंपनी परस्त गठजोड़ का ठीकरा किसानों के सिर फोड़ना और उन्हें उपदेश देना सरासर अन्यायपूर्ण लगता है.
आईसीएआर (ICAR) के वैज्ञानिकों, कृषि नीति निर्माताओं और एक्सटेंशन डिवीजन के अधिकारियों की मेजों से उठकर सीधे खेतों तक सीधी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए. अगर सच में देश की मिट्टी, सेहत और खेती के भविष्य को बचाना है, तो पारंपरिक ज्ञान को दरकिनार करने वाले इस भ्रष्ट व्यवस्था की रीढ़ को तोड़ना होगा और किसानों को अपराधी मानने के बजाय इस बदहाली के असली गुनहगारों का पर्दाफाश करना होगा.
कृषि मंत्री ने भले ही दिल्ली के कृषि भवन के आलीशान कमरों में बैठने वाले अफसरों से कभी तीखे सवाल न पूछे हों और न ही उनकी जवाबदेही तय की हो, लेकिन हम खुलकर कहेंगे कि इस बर्बादी के असली जिम्मेदार ये तीन मोहरे हैं. अगर ईमानदारी से जवाबदेही तय की जाए तो इस पूरी व्यवस्था में तीन बड़े किरदार ज्यादा जिम्मेदार दिखाई देते हैं.
पहला, कृषि मंत्रालय का एक्सटेंशन डिवीजन, जिसका काम किसानों तक सही जानकारी पहुंचाना और उन्हें जागरूक करना था. लेकिन दशकों तक यह विभाग योजनाओं, फाइलों और बजट खर्च करने तक सीमित रहा.
दूसरा, कृषि वैज्ञानिक और शोध संस्थान, जिन्होंने उत्पादन बढ़ाने पर तो जोर दिया, लेकिन मिट्टी की सेहत, जैविक संतुलन और रसायनों के दीर्घकालिक दुष्प्रभावों पर पर्याप्त जागरुकता नहीं फैलाई.
तीसरा, खाद और कीटनाशक कंपनियां, जिन्होंने अपने व्यावसायिक हितों के लिए केमिकल की खपत बढ़ाने वाला मॉडल विकसित किया और किसानों तक अधिक से अधिक उत्पाद पहुंचाने में लगी रहीं. जब तक इस पूरे तंत्र की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे अभियान केवल सरकारी खानापूर्ति बनकर रह जाएंगे.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आजादी के बाद से आज तक कृषि मंत्रालय ने अपने 'एक्सटेंशन डिवीजन' के कामकाज की कोई गंभीर समीक्षा नहीं की. उनके दशकों लंबे फेलियर पर आज तक इस देश में कोई बात नहीं हुई. सवाल यह उठता है कि जो विभाग आजादी से लेकर आज तक देश के किसानों को इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझा पाया कि जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से धरती बंजर हो जाएगी और इंसानों की सेहत खराब होगी, उस विभाग की आखिर देश को जरूरत ही क्या है?
क्या यह डिवीजन सिर्फ नेताओं के राजनीतिक कार्यक्रम, रैलियां और सरकारी इवेंट करवाने के लिए बना है? अगर इनका काम सिर्फ नेताओं की खातिरदारी और कागजी योजनाएं चमकाना है, तो फिर इन पर देश के ईमानदार टैक्सपेयर्स की गाढ़ी कमाई का पैसा क्यों उड़ाया जा रहा है? इस सफेद हाथी बन चुके विभाग को तुरंत बंद क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए?
अब बात करते हैं देश के उन कृषि वैज्ञानिकों और तथाकथित 'एक्सपर्ट्स' की, जिन्होंने बंद कमरों में बैठकर देश की पूरी कृषि व्यवस्था को कुछ कंपनियों के हाथों बेच दिया. आखिर दशकों से अरबों रुपये का सरकारी फंड डकारने वाली कृषि शोध संस्था ICAR और देश भर के कृषि विश्वविद्यालय क्या कर रहे थे? वैज्ञानिकों ने किसानों को यह क्यों नहीं बताया कि रासायनिक खादों के साइड इफेक्ट्स कितने खतरनाक हैं? क्या वैज्ञानिकों का काम सिर्फ विदेशी कंपनियों के केमिकल की टेस्टिंग करना और उन्हें सर्टिफिकेट बांटना रह गया था?
कड़वा सच तो यह है कि इन वैज्ञानिकों का पूरा ध्यान केवल 'फसल का उत्पादन बढ़ाने' पर रहा, मिट्टी की सेहत पर नहीं. इन्होंने ऐसी हाइब्रिड फसलें बनाईं जो ज्यादा से ज्यादा केमिकल सोखें और देश के अनमोल पारंपरिक और देसी बीजों को लैब की तिजोरियों में बंद करके नष्ट होने के लिए छोड़ दिया. जब वैज्ञानिक ही केमिकल के इस जानलेवा साइड इफेक्ट पर खामोश रहे, तो उन्होंने देश की धरती और इंसानों की सेहत के साथ एक तरह का 'वैज्ञानिक अपराध' किया है.
मंत्रालय का समीक्षा करने का तरीका भी किसी मजाक से कम नहीं है. योजनाओं के नाम पर बजट आता है, होर्डिंग्स लगते हैं, और कागजों पर 'टारगेट' पूरे कर लिए जाते हैं. लेकिन मंत्रालय ने कभी इस बात का ऑडिट करने की हिम्मत नहीं दिखाई कि इन करोड़ों रुपयों के खर्च होने के बाद जमीन पर यूरिया और जहरीले केमिकल की खपत में एक किलो की भी कमी आई या नहीं. यह समीक्षा सिर्फ और सिर्फ बजट को ठिकाने लगाने और कंपनियों को फायदा पहुंचाने का जरिया बनकर रह गई है.
दूसरी तरफ, सरकारी एक्सटेंशन विभाग ने हर गांव की नुक्कड़ पर बैठे निजी खाद-बीज डीलरों के सामने पूरी तरह घुटने टेक दिए. कंपनियां इन दुकानदारों को भारी कमीशन और विदेश दौरों का लालच देकर किसानों को जबरन जरूरत से ज्यादा केमिकल बेचती रहीं और हमारा सरकारी तंत्र आंखें मूंदकर तमाशा देखता रहा.
ये भी पढ़ें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?