
क्या कभी आपने सोचा है कि जिस थाली में आप रोजाना अपने परिवार को खाना परोसते हैं, उसमें अनजाने में जहर परोसा जा रहा है? आज हमारे देश की कृषि व्यवस्था एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां एक तरफ देशवासियों की सेहत पर गंभीर संकट मंडरा रहा है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हमारे कृषि उत्पादों की साख लगातार धूमिल हो रही है. इस साल 2026 में जापान ने भारत के प्रसंस्करण संयंत्रों में कमियां पाते हुए भारतीय आमों के आयात पर पूरी तरह रोक लगा दी है, जिससे अल्फांसो, केसर और चौसा जैसी प्रजातियां जापानी बाजार से बाहर हो चुकी हैं.
वहीं दूसरी तरफ, चीन ने गैर-बासमती चावल के दर्जनों कंसाइनमेंट यह कहकर खारिज कर दिए कि उनमें जेनेटिकली मॉडिफाइड (GMO) अंश मौजूद हैं. इसके साथ ही, मसालों के मामले में भी चीन ने भारतीय मिर्च के कंसाइनमेंट में तय मानकों से अधिक कीटनाशक मेथामिडोफॉस मिलने का हवाला देकर उन्हें वापस भेजना शुरू कर दिया है. यह सिर्फ व्यापारिक झटके नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि खेतों से लेकर बाजार तक हमारी पूरी सप्लाई चेन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
जब बात हमारे देश के नागरिकों की सेहत की आती है, तो आंकड़े और भी डरावनी तस्वीर पेश करते हैं. हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने संसद में आंकड़े साझा करते हुए बताया कि पिछले तीन सालों में देश के 23 राज्यों से लिए गए फल और सब्जियों के 70,652 नमूनों में से 3.1 प्रतिशत सैंपल FSSAI द्वारा तय 'मैक्सिमम रेसिड्यू लिमिट' (MRL) यानी कीटनाशकों की सुरक्षित सीमा से बहुत आगे पाए गए. पंजाब जैसे राज्यों में अंधाधुंध केमिकल के इस्तेमाल के कारण गंभीर बीमारियों और कैंसर जैसी समस्याओं के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. इसके अलावा, सेहतमंद समझकर खाए जाने वाले अंकुरित अनाज मूंग में भी गंभीर लापरवाही सामने आ रही है. किसान फसल को जल्दी सुखाकर बेचने या कटाई की मुश्किलों से बचने के लिए खड़ी मूंग की फसल पर पैराक्वाट जैसे जानलेवा और प्रतिबंधित रसायनों का धड़ल्ले से छिड़काव कर रहे हैं.
यही नहीं, जब लोग सेहत के लिए मूंग को अंकुरित करके या दाल के रूप में खाते हैं, तो अनजाने में उनके शरीर के अंदर यही खतरनाक ज़हरीले अवशेष पहुंच जाते हैं, जिससे फेफड़े, किडनी और लीवर को स्थायी नुकसान पहुँचता है. इसके अलावा, आलू और अदरक को आकर्षक रखने या आकर्षक बनाने के लिए भी खतरनाक कलर का प्रयोग हो रहा है, और मुनाफा कमाने की अंधी दौड़ में फलों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड जैसे प्रतिबंधित रसायनों का इस्तेमाल लोगों में गंभीर बीमारियाँ पैदा कर रहा है.
सेहत के साथ इस खिलवाड़ का दायरा सिर्फ स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे विदेशी व्यापार और देश की इज्जत पर पड़ रहा है. यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (EFSA) के आंकड़ों के मुताबिक, केवल दो सालों में भारत के 365 से अधिक उत्पाद कीटनाशकों और भारी धातुओं की मात्रा तय सीमा से अधिक होने के कारण रिजेक्ट किए गए. इनमें पेस्टीसाइड के खतरनाक रसायन और एथिलीन ऑक्साइड जैसे कैंसर पैदा करने वाले तत्व पाए गए, जिन पर दुनिया के दर्जनों देशों में पहले से ही प्रतिबंध है.
हैरानी की बात यह है कि इन रसायनों का इस्तेमाल फसल उगाने के लिए नहीं,बल्कि कटाई के बाद उन्हें जल्दी पकाने सुखाने या स्टोरेज हाउस में सड़ने से बचाने के लिए करते हैं. लेकिन जब यही ज़हरीले अंश विदेशों में होने वाली आधुनिक जांच में पकड़े जाते हैं, तो हमारे एक्सपोर्ट्स धड़ाम से नीचे गिर जाते हैं और चीन व यूरोपीय देशों द्वारा कृषि उपज और र्मिर्च सहित अन्य मसालों की वापसी से पूरी दुनिया में देश की साख पर बट्टा लग जाता है.
इस खतरनाक स्थिति का असली जिम्मेदार कौन है? क्या सारा दोष उन किसानों का है, जो अपनी फसल बचाने के लिए मजबूरी में इन केमिकल का इस्तेमाल करते हैं? विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि सिर्फ किसान इसके जिम्मेदार नहीं हैं. असली गड़बड़ी हमारी व्यवस्था में है. एक तरफ पेस्टिसाइड कंपनियां और उनके डीलर अपने मुनाफे के लिए किसानों को अंधाधुंध केमिकल बेच रहे हैं. दूसरी तरफ,फल और सब्जी व्यापारी ताज़ा उपज को चमकदार दिखाने और लंबे समय तक सड़ने से बचाने के लिए उनमें घातक केमिकल मिला रहे हैं.
इस सब के बीच किसानों को सही जानकारी देने वाला कोई नहीं है कि कौन सा केमिकल कब और कितनी मात्रा में छिड़कना चाहिए.जब बाजार में ऐसे ज़हरीले रसायन खुलेआम बिकेंगे और कोई सही सलाह देने वाला नहीं होगा, तो किसान इनका इस्तेमाल करेंगे ही। साफ जाहिर है कि इन कंपनियों और व्यापारियों के लिए बिक्री का टारगेट ज्यादा मायने रखता है,आम जनता की जान नहीं.
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि हमारी सरकारी एजेंसियों और कृषि विभागों की जिम्मेदारी क्या है? क्या कृषि मंत्रालय का प्रसार विभाग या राज्य सरकारों के कृषि विभाग सिर्फ कागजी कार्रवाई करने के लिए बैठे हैं? क्या उनकी यह नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि वे किसानों को जागरूक करें और यह सुनिश्चित करें कि बाजार में कोई भी प्रतिबंधित या खतरनाक केमिकल न बिके? लेकिन विडंबना यह है कि जब भी कोई कंसाइनमेंट विदेशों से रिजेक्ट होकर वापस आता है,तो विभागों की तरफ से सिर्फ एक-दूसरे पर इल्जाम मढ़ने का खेल शुरू हो जाता है.
कोई भी विभाग अपनी जिम्मेदारी तय करने को तैयार नहीं होता.न तो स्टोरेज हाउस की कड़ी निगरानी होती है और न ही सप्लाई चेन के हर चरण पर कोई पारदर्शिता बरती जाती है. जब तक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी,तब तक यह लापरवाही यूं ही लोगों के सेहत का साथ खिलवाड़ होती रहेगी.
अगर हमें इस राष्ट्रीय संकट से बाहर निकलना है, तो अब कड़े और तुरंत कदम उठाने का वक्त आ गया है.सरकार को सिर्फ कागजों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय ज़मीन पर उतरकर उन पेस्टिसाइड कंपनियों और डीलरों पर नकेल कसनी होगी जो अपने फायदे के लिए देशवासियों की सेहत से खेल रहे हैं.हाल ही में सरकार ने पैराक्वाट जैसे जानलेवा खरपतवारनाशी पर प्रतिबंध लगाने का सराहनीय कदम उठाया है,जिसके कोई एंटीडोट नहीं हैं और जिससे देश भर में लगातार मौतें हो रही थीं.
इसी तरह, खेती से लेकर कोल्ड स्टोरेज और पैकेजिंग तक हर स्तर पर आधुनिक टेस्टिंग लैब्स और पारदर्शी सिस्टम बनाना होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हमारी थाली तक पहुँचने वाला हर दाना सुरक्षित हो.जब तक हम जवाबदेही तय नहीं करेंगे और किसानों को सही वैज्ञानिक तरीके नहीं सिखाएंगे, तब तक न तो हमारे देश के लोगों की सेहत बचेगी और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारा कृषि निर्यात सुरक्षित रह पाएगा.