
देश में उगाई जाने वाली सब्जियों, तिलहन और पशु नस्लों से जुड़े जैविक संसाधनों के इस्तेमाल से होने वाली कमाई का एक हिस्सा अब जैव विविधता संरक्षण पर खर्च किया जाएगा. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने करीब 3.79 करोड़ रुपये का Access and Benefit Sharing (ABS) यानी ‘पहुंच और लाभ साझा करने’ की राशि जारी की है. यह पैसा 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) और केंद्र शासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों (UTBCs) के अलावा आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) और हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड के जरिए हिसार बोवाइन स्पर्म स्टेशन एंड रिसर्च सेंटर को दिया गया है.
सीधे शब्दों में समझें तो भारत में मिलने वाले पौधों, बीजों, फसलों और पशु नस्लों जैसे जैविक संसाधनों का इस्तेमाल कई कंपनियां रिसर्च और कारोबार के लिए करती हैं. ऐसे संसाधनों के इस्तेमाल से कंपनियों को फायदा होता है, तो उस फायदे का एक हिस्सा जैव विविधता के संरक्षण और स्थानीय समुदायों के विकास पर भी खर्च किया जाता है. इसी व्यवस्था को Access and Benefit Sharing यानी ABS कहा जाता है.
इस बार जारी की गई राशि में टमाटर, मिर्च, बैंगन, फूलगोभी, तरबूज, करेला, लौकी, भिंडी और सरसों जैसी फसलों से जुड़े बीज और आनुवंशिक संसाधन शामिल हैं. इसके अलावा साहीवाल गाय के डीप-फ्रोजन सीमेन से जुड़ी राशि भी इसमें शामिल है.
जारी की गई राशि में टमाटर और मिर्च से जुड़े संसाधनों की हिस्सेदारी काफी बड़ी है. टमाटर के बीजों की किस्मों और हाइब्रिड के लिए करीब 86.56 लाख रुपये की ABS राशि जारी की गई है. इसका लाभ 31 राज्य जैव विविधता बोर्डों और UTBCs को मिलेगा. वहीं, मिर्च के बीजों की किस्मों और हाइब्रिड के लिए करीब 83.76 लाख रुपये जारी किए गए हैं. यह राशि 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित जैव विविधता बोर्डों तक पहुंचेगी.
फूलगोभी के बीजों और हाइब्रिड के लिए करीब 26.98 लाख रुपये, जबकि तरबूज के लिए 24.32 लाख रुपये जारी किए गए हैं. बैंगन के बीजों और हाइब्रिड से जुड़े संसाधनों के लिए करीब 7.18 लाख रुपये की राशि दी गई है.
इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा हिस्सा Advanta Enterprises Limited से जुड़े जैविक संसाधनों से आया है. कंपनी द्वारा करेला, लौकी, बैंगन, फूलगोभी, हॉट पेपर, भिंडी और टमाटर के जर्मप्लाज्म यानी पौधों की आनुवंशिक सामग्री तक पहुंच के लिए करीब 1.48 करोड़ रुपये की ABS राशि तय हुई.
इसके अलावा सरसों की किस्मों के लिए करीब 57 हजार रुपये आईसीएआर-एनबीपीजीआर, नई दिल्ली को दिए गए हैं. वहीं, श्रीलंका के Department of Animal Production and Health की ओर से साहीवाल गाय के सीमेन तक पहुंच के लिए करीब 98 हजार रुपये की राशि बनी, जिसे हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड के जरिए हिसार बोवाइन स्पर्म स्टेशन एंड रिसर्च सेंटर को दिया गया है.
यह राशि उन कंपनियों से प्राप्त हुई है जिन्होंने भारत के सब्जियों और तिलहनों से जुड़े आनुवंशिक संसाधनों का इस्तेमाल रिसर्च और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया. इसमें Bayer Science and Innovation Pvt. Ltd., HM Clause India Pvt. Ltd. और Advanta Enterprises Limited जैसी कंपनियां शामिल हैं.
कुछ मामलों में जैविक संसाधन सीधे किसी खास जगह से नहीं, बल्कि बाजार, व्यापारियों या बिचौलियों के माध्यम से कंपनियों तक पहुंचे थे. ऐसे मामलों में यह पता लगाना मुश्किल था कि संसाधन मूल रूप से किस स्थान से लिया गया था. इसलिए NBA ने विशेषज्ञ समिति की ओर से तैयार की गई लाभ साझा करने की व्यवस्था को अपनाया. इस व्यवस्था को प्राधिकरण ने मंजूरी दी थी.
अब सवाल है कि 3.79 करोड़ रुपये की राशि अलग-अलग राज्यों में कैसे बांटी गई? इसके लिए संबंधित फसलों की खेती का क्षेत्रफल आधार बनाया गया. यानी जिस राज्य में किसी फसल की खेती ज्यादा होती है, वहां उस फसल से जुड़ी ABS राशि का हिस्सा भी उसी हिसाब से तय किया गया. इसके लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से प्रकाशित खेती के क्षेत्रफल से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया. इस आधार पर मध्य प्रदेश को सबसे ज्यादा 46.93 लाख रुपये मिले. इसके बाद पश्चिम बंगाल को 44.76 लाख रुपये और ओडिशा को 44.08 लाख रुपये मिले.
गुजरात को 34.76 लाख रुपये, आंध्र प्रदेश को 29.21 लाख रुपये और बिहार को 29.20 लाख रुपये जारी किए गए. कर्नाटक को 21.34 लाख रुपये, छत्तीसगढ़ को 18.49 लाख रुपये, तमिलनाडु को 16.57 लाख रुपये और उत्तर प्रदेश को 16.24 लाख रुपये मिले. महाराष्ट्र को 16.15 लाख रुपये, तेलंगाना को 9.24 लाख रुपये, हरियाणा को 8.76 लाख रुपये, असम को 8.49 लाख रुपये, झारखंड को 8.14 लाख रुपये और पंजाब को 7.41 लाख रुपये मिले. राजस्थान को 5.17 लाख रुपये और अन्य राज्यों को मिलाकर 13.70 लाख रुपये जारी किए गए हैं.
ABS के तहत मिली राशि का इस्तेमाल जैव विविधता को बचाने के काम में किया जाना है. राज्य जैव विविधता बोर्ड और संबंधित संस्थाएं इस पैसे से People's Biodiversity Registers यानी पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर तैयार और अपडेट कर सकती हैं. इन रजिस्टरों में किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले पौधों, जानवरों और दूसरे जैविक संसाधनों की जानकारी दर्ज की जाती है.
इसके अलावा स्थानीय पौधों और पशु संसाधनों को उनके प्राकृतिक स्थान पर बचाने, बीजों और आनुवंशिक संसाधनों को सुरक्षित रखने, Biodiversity Heritage Sites को मजबूत करने और जैव विविधता प्रबंधन समितियों की क्षमता बढ़ाने पर भी यह पैसा खर्च किया जाएगा. इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास पर भी खर्च किया जा सकता है. यानी जिस जैव विविधता को स्थानीय लोग लंबे समय से बचाते आ रहे हैं, उसके संरक्षण से मिलने वाला लाभ वापस उन्हीं क्षेत्रों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है.
भारत में जैव विविधता केवल जंगलों और वन्य जीवों तक सीमित नहीं है. किसानों के खेतों में मौजूद फसलों की अलग-अलग किस्में, पारंपरिक बीज, पशु नस्लें और उनके आनुवंशिक संसाधन भी देश की जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
मसलन, साहीवाल जैसी देशी गाय की नस्ल केवल पशुपालन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसका आनुवंशिक संसाधन भी काफी अहम है. इसी तरह टमाटर, मिर्च, बैंगन या सरसों की अलग-अलग किस्मों में ऐसे गुण हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल भविष्य में बेहतर फसल तैयार करने, रिसर्च करने या बदलते मौसम की चुनौतियों से निपटने में किया जा सकता है. इसलिए इन संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल होने पर उससे होने वाले लाभ का कुछ हिस्सा संरक्षण के काम में लगाना जरूरी माना जाता है.
भारत में ABS व्यवस्था जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत लागू है. यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Nagoya Protocol से भी जुड़ी हुई है. इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी देश के जैविक संसाधनों का इस्तेमाल करके अगर आर्थिक लाभ कमाया जाता है, तो उस लाभ का उचित हिस्सा जैव विविधता के संरक्षण और संबंधित समुदायों तक पहुंचे.
यानी आसान भाषा में कहें तो किसी देश के पौधे, बीज, पशु आनुवंशिक संसाधन या दूसरे जैविक संसाधन का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति या कंपनी सिर्फ उससे होने वाला मुनाफा अपने पास न रखे, बल्कि उसके संरक्षण में भी योगदान दे.
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की ओर से अब तक किए गए ABS वितरण का कुल आंकड़ा 166 करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है. नई राशि भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है.
इससे एक तरफ जैविक संसाधनों पर रिसर्च और उनके व्यावसायिक इस्तेमाल को बढ़ावा मिलता है, वहीं दूसरी तरफ जैव विविधता संरक्षण के लिए पैसा उपलब्ध होता है. इसका फायदा स्थानीय समुदायों और उन लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है जो इन संसाधनों को बचाने और उनका इस्तेमाल पीढ़ियों से करते आ रहे हैं.
यह पूरी व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खेती में इस्तेमाल होने वाले बीज और पशु नस्लें किसी देश की आनुवंशिक संपदा होती हैं. अगर इन संसाधनों का लगातार संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में कई पारंपरिक किस्में और नस्लें खत्म हो सकती हैं. ABS के जरिए कोशिश है कि रिसर्च, कारोबार, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच संतुलन बनाया जाए. नई जारी की गई 3.79 करोड़ रुपये की राशि इसी दिशा में एक और कदम है. इसका उद्देश्य केवल पैसा बांटना नहीं, बल्कि भारत की जैविक संपदा को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना भी है.
भारत की यह पहल वैश्विक Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework के लक्ष्यों से भी जुड़ी है. इसके साथ ही यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों, खासकर भूख खत्म करने, जिम्मेदार उत्पादन और खपत, जमीन पर जीवन की रक्षा और वैश्विक साझेदारी जैसे लक्ष्यों में भी योगदान देती है.
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