रूस-यूक्रेन युद्ध और सूखे का डबल असर, गेहूं की कीमतों में तीन साल का सबसे बड़ा उछाल

रूस-यूक्रेन युद्ध और सूखे का डबल असर, गेहूं की कीमतों में तीन साल का सबसे बड़ा उछाल

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते ब्लैक सी क्षेत्र से गेहूं और अनाज के निर्यात में बाधा आने और कई देशों में सूखे और कम बारिश के कारण उत्पादन घटने से वैश्विक गेहूं कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है. रूस और यूक्रेन के अनाज टर्मिनलों पर लगातार हमलों ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है, जबकि जलवायु परिवर्तन के कारण अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में फसल पर दबाव बढ़ा है. विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में गेहूं की उपलब्धता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन परिवहन और निर्यात लागत बढ़ने से कीमतें ऊपर जा रही हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा और आयात पर निर्भर देशों की चिंता बढ़ गई है.

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रूस-यूक्रेन युद्ध और सूखे का डबल असर, गेहूं की कीमतों में तीन साल का सबसे बड़ा उछालगेहूं मंडी भाव (फाइल फोटो)

रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ब्लैक सी (Black Sea) से होने वाले एक्सपोर्ट में रुकावट और मौसम में बदलाव से पड़े सूखे की वजह से गेहूं का उत्पादन काफी कम हो गया है, जिससे इसकी कीमतें तेजी से बढ़ी हैं.

पिछले एक महीने में, रूस और यूक्रेन ने ब्लैक सी पर एक-दूसरे के अनाज टर्मिनलों पर हमले तेज कर दिए हैं. रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं एक्सपोर्टर है और यूक्रेन अनाज पैदा करने वाले टॉप 10 देशों में शामिल है, इसलिए इन हमलों का असर दुनिया भर में गेहूं और अनाज की सप्लाई पर पड़ा है.

अनाज बाजार के लिए ग्लोबल बेंचमार्क माने जाने वाले शिकागो व्हीट फ्यूचर्स (Chicago wheat futures) शुक्रवार को तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे, लेकिन सोमवार को इनमें 0.54 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई. रूस के रोस्तोव क्षेत्र के अधिकारियों ने शुक्रवार को इमरजेंसी की घोषणा की. उन्होंने बताया कि अजोव सागर और ब्लैक सी बेसिन में बंदरगाह बंद होने और नेविगेशन में रुकावट के कारण खेतों में अनाजों का ढेर लग गया है.

इस बीच, बढ़ते तापमान और बारिश की कमी के कारण दक्षिण अफ्रीका के स्वार्टलैंड में इस साल गेहूं की फसल पर खतरा मंडरा रहा है. यह इलाका देश का लगभग 20 प्रतिशत गेहूं पैदा करता है.

रूस-यूक्रेन युद्ध का कीमतों पर क्या असर पड़ रहा है?

पिछले एक महीने में, रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान बंदरगाहों, जहाजों और अनाज सुविधाओं पर हुए हमलों ने अनाज टर्मिनलों के कामकाज को बाधित किया है. इससे एक्सपोर्ट के पीक सीजन के दौरान शिपर्स को कार्गो लोडिंग में देरी करनी पड़ी है या उसे रद्द करना पड़ा है.

जहां रूसी मिसाइल हमलों ने यूक्रेन के अनाज एक्सपोर्ट पर असर डाला है, वहीं अजोव सागर में यूक्रेन के ड्रोन हमलों ने भी रूस से होने वाले अनाज और गेहूं के शिपमेंट को काफी कम कर दिया है. साथ ही, रूस के नोवोरोसिस्क और तमन बंदरगाहों पर हुए हमलों से ब्लैक सी बंदरगाहों से शिपिंग की लागत बढ़ गई है.

यूक्रेन के इंफ्रास्ट्रक्चर मंत्रालय के अनुसार, जुलाई में यूक्रेन को बंदरगाह पर खड़े जहाजों पर 35, समुद्र में 22 और बंदरगाह सुविधाओं पर 67 रूसी हमलों का सामना करना पड़ा. इसकी तुलना में, पूरे 2025 में जहाजों पर हुए हमलों की कुल संख्या सिर्फ 14 थी.

शुक्रवार को कीव के कृषि मंत्री ने कहा कि हाल के रूसी हवाई हमलों ने रिटेलर्स की लगभग 90 प्रतिशत फूड लॉजिस्टिक्स (खाद्य आपूर्ति व्यवस्था) को नष्ट कर दिया है. गेहूं के ट्रांसपोर्ट में कमी आने से कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा का डर पैदा हो गया है. इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर जनरल के ऑफिस में रिसर्च फेलो एमेरिटस, जो ग्लॉबर ने कहा कि असल मुद्दा गेहूं के उत्पादन की मात्रा का नहीं, बल्कि उसे खरीदारों और उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की लागत का है.

उन्होंने 'अल जजीरा' से कहा, "रूस और यूक्रेन में गेहूं का काफी स्टॉक है और आखिरकार वह गेहूं बाज़ार में आएगा ही. लेकिन अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है, या फिर बहुत ज्यादा लागत पर आ रहा है, और गेहूं की कीमतों पर इसका असर दिख रहा है."

उन्होंने आगे कहा, "दुनिया में गेहूं की कोई कमी नहीं है... सवाल उपलब्धता का नहीं, बल्कि उसे खरीदने की क्षमता का है."

दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं आयातक देश मिस्र, आमतौर पर गेहूं के आयात पर हर साल लगभग 3 अरब डॉलर खर्च करता है. 2026 की पहली छमाही में, उसने अपने स्टॉक का 82 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रूस और यूक्रेन से मंगाया था.

ऑब्जर्वेटरी ऑफ इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी के अनुसार, एशिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश इंडोनेशिया ने 2023 और 2024 के बीच यूक्रेन से 361 मिलियन डॉलर और रूस से 102 मिलियन डॉलर का गेहूं खरीदा. इंडोनेशिया आमतौर पर अपनी गेहूं की जरूरत का 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं दो देशों से मंगाता है.

इंडोनेशिया के फ्लोर मिलर्स एसोसिएशन के एक अधिकारी ने पिछले हफ्ते रॉयटर्स को बताया कि मौजूदा स्टॉक से खाने लायक गेहूं की तत्काल जरूरतें पूरी हो सकती हैं. अधिकारी ने कहा, "लेकिन हमारे पास भरपूर या अतिरिक्त सप्लाई नहीं है. जो गेहूं रूस और यूक्रेन से नहीं आ पा रहा है, उसके लिए हमें बुल्गारिया, ऑस्ट्रेलिया, रोमानिया और अर्जेंटीना जैसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना होगा."

इसमें जलवायु परिवर्तन की क्या भूमिका है?

यूक्रेन युद्ध के अलावा, सूखे और कम बारिश वाले मौसम ने गेहूं के उत्पादन पर बुरा असर डाला है और कीमतों में बढ़ोतरी में योगदान दिया है.

यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA) के अनुसार, 1 जुलाई तक, गेहूं के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक अमेरिका में उत्पादन का अनुमान "46.7 बुशेल प्रति एकड़" है, जो पिछले महीने की तुलना में 0.1 बुशेल कम है और पिछले साल के औसत उत्पादन (54.9 बुशेल प्रति एकड़) से 8.2 बुशेल कम है.

USDA ने कहा, "अगर ऐसा होता है, तो अमेरिका में उत्पादन 2015 के बाद सबसे कम होगा." 14 अगस्त को अपडेट की गई एक रिपोर्ट में विभाग ने लिखा, "इस साल कम फसल होने की वजह अमेरिका में गेहूं की खेती के रकबे में लंबे समय से आ रही कमी और ग्रेट प्लेन्स राज्यों में HRW (हार्ड रेड विंटर गेहूं) के उत्पादन पर सूखे का व्यापक असर है. अनुमान है कि गेहूं की कुल सप्लाई पिछले साल के मुकाबले 13 प्रतिशत कम रहेगी, हालांकि शुरुआती स्टॉक ज्यादा होने से कम फसल का असर कुछ कम हुआ है."

इस स्थिति से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है?

रूस-यूक्रेन युद्ध जारी रहने के बीच, जुलाई 2022 में (जिस साल युद्ध शुरू हुआ था) 'ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव' (Black Sea Grain Initiative) के तहत एक समझौता हुआ था. इसका मकसद यूक्रेनी बंदरगाहों से अनाज, खाद्य पदार्थों और खादों के सुरक्षित निर्यात की अनुमति देना था, ताकि वैश्विक खाद्य कीमतों को स्थिर किया जा सके और उन्हें कम किया जा सके.

EU के अनुसार, जब तक यह समझौता लागू रहा, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों से भरे 1,000 से ज्यादा जहाज यूक्रेन से रवाना हुए. हालांकि, रूस ने जुलाई 2023 में इस समझौते को खत्म कर दिया.

जानकारों का कहना है कि मौजूदा संकट का समाधान निकालना आसान नहीं है.

कीमतें कम करने के लिए रूस और यूक्रेन, दोनों को अपनी युद्ध की रणनीति में बड़ा बदलाव करना होगा. वहीं, जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए सरकारें ऐसी नीतियां लागू कर सकती हैं जिनसे खेती में पानी का बेहतर प्रबंधन हो सके. जैसे कि जलाशयों का इस्तेमाल करके सूखे से प्रभावित फसलों को बचाया जा सके और उत्पादन में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

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