अलवर में इनक्यूबेशन सेंटर बनने जा रहा है जिसका निर्माण शुरू हो चुका है. इस केंद्र में प्याज, टमाटर सहित अन्य फसलों से जरूरत की चीजें तैयार की जाएंगी. इन खाद्य पदार्थों को बाजार में बेचा जाएगा. साथ ही युवा और महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी जाएगी जिससे युवा और महिला आत्मनिर्भर बन सके और अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर सकें.
मनोज खंडेलवाल ने धीरे-धीरे अपना ध्यान जैविक खेती की ओर लगाया और इसमें आधुनिक तकनीकों को शामिल किया. वह वर्तमान में 70 बीघा जमीन में खेती कर रहे हैं, जिसमें 10,000 अमरूद के पेड़, गेहूं, सरसों, सोयाबीन, सब्जियां और औषधीय पौधे शामिल हैं. उनके उगाए गए अमरूद हाई क्वालिटी वाले और बड़े आकार के होते हैं और उनका वजन औसतन 600 से 750 ग्राम के बीच होता है.
सरकार ने बिजली कटौती की वजह अगस्त महीने में कमजोर मॉनसून को बताया है. अधिकारियों ने कहा कि जून-जुलाई में बारिश अच्छी होने के कारण फसलों की बुवाई ऐतिहासिक रूप से बढ़ी. वहीं, अगस्त में बारिश की कमी से सिंचाई के लिए बिजली की मांग भी बढ़ गई.
वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण टायर कचरे के उत्पादन के साथ, ऐसी टायर पायरोलिसिस इकाइयों की स्थापना को सक्षम और प्रोत्साहित करना समय की मांग है जो प्रदूषण नहीं फैलाती. आरएसपीसीबी ने इसीलिए कुछ चेतावनियों के बाद नई टायर पायरोलिसिस इकाइयों की स्थापना और कंटीन्यूअस बैच प्रकार की मौजूदा इकाइयों के रूपांतरण की अनुमति देने का निर्णय लिया है.
उदयपुर में युवा आंत्रप्रेन्योर अंकित जैन और इनके दो दोस्तों ने ईएफ पॉलीमर नाम से कंपनी बनाई है. इनका फसल अमृत नाम का प्रोडक्ट खेती में पानी की खपत और जरूरत को कम करता है. आज 'किसान के पास किसान तक' सीरीज में कहानी इस सफल युवा व्यवसायी की.
राज किसान सुविधा एप पर महज दो महीने में 2.89 लाख किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया है. किसानों को इस एक एप से खेती-किसानी की कई सारी जानकारी मिल रही हैं. साथ ही योजनाओं में ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी दी जा रही है.
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी यूनिवर्सिटी, उदयपुर को दो एग्रीबोट ड्रोन दिए गए हैं. ये ड्रोन नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ओर से मिले हैं. इन ड्रोन से भीलवाड़ा और उदयपुर जिले के हजारों किसानों को नई तकनीकी सीखने-समझने को मिलेगी.
राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के रहने वाले हेमंत शर्मा ने पुराने संस्कृत साहित्य को पढ़कर लस्सी का स्टार्टअप शुरू किया है. इनका दावा है कि वे वैदिक, मुगल काल का स्वाद अपने इस प्रोडक्ट के जरिए दे रहे हैं. पढ़िए उनकी कहानी...
जोधपुर स्थित साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर शुष्क क्षेत्रों में होने वाली मसाला फसलों के उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पूरे देश में किसानों को निर्यातक बनाने में भूमिका निभा रहा है. सेंटर करीब 10 एफपीओ से जुड़ा है. साथ ही अनेक फसलों में लगने वाली बीमारियों से बचाव के स्थाई उपाय किसानों को सुझा रहा है.
खेती-बाड़ी में आजकल तकनीकी का इस्तेमाल खूब हो रहा है, लेकिन किसानों की फसल खराब होने पर आज भी मुआवजे के लिए संघर्ष करते देखा जा सकता है. इसीलिए अब सरकार खराबे के लिए सेटेलाइट का उपयोग करने की बात कहने लगी हैं. इस क्षेत्र में कई निजी कंपनी भी आने लगी है. ऐसी ही एक कंपनी से किसान तक ने बात की. पढ़िए यह रिपोर्ट.
राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में विंड पावर की अनुपयोगी भूमि को आदिवासी काश्तकारों को देने की कार्यवाही नियमों के अनुसार की जाएगी. चूंकि यह जमीन तहसीलदार और पटवारी की रिपोर्ट में सिवायचक भूमि के रूप में दर्ज है इसीलिए उसे नियमानुसार आदिवासियों को आवंटित किया जाएगा.
ओडिशा में कोरापुट जिले के रहने वाले जगन्नाथ चिनारी भी बना रहे हैं. उनके स्टार्टअप का नाम कोरापुट है. चिनारी रागी से चाय, मिक्चर नमकीन, कुकीज, शुगर फ्री कुकीज, फिंगर स्टिक, नमकपारा, मीठे नमकपारा,रागी के साथ अजवाइन कुरकुरे और लिटिल मिलेट यानी कुटकी बना रहे हैं. चिनारी कहते हैं कि रागी अनाज से चाय हमारा सबसे स्पेशल प्रोडक्ट है. चूंकि ओडिशा में रागी बड़ी मात्रा में पैदा होती है.
कृषि विभाग ने पोर्टल के अलावा ऐप भी लॉन्च किया है. इस ऐप के माध्यम से किसान राज्य सरकार की कृषि, उद्यान और पशुपालन से जुड़ी तमाम योजनाओं के बारे में मोबाइल पर जान सकेंगे. साथ ही उन योजनाओं में मोबाइल से ही ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे.
क्या कोई घास बिना मिट्टी के लगाई जा सकती है? जवाब है हां. बिना मिट्टी के घास लगाने के तरीके को कहते हैं हाइड्रोपॉनिक सिस्टम. इस हाइड्रोपॉनिक सिस्टम से टैरिस गार्डन में सब्जी उगती हुई हम सबने देखी होंगी, लेकिन बीकानेर जिले के बज्जू में बेरासर गांव में एक किसान ने घर में हाइड्रोपॉनिक सिस्टम से घास उगाना शुरू किया है.
राजस्थान में झालावाड़ की विजरोल प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी कृषि में काम आने वाले ड्रोन बना रही है. जंबूरी में प्रदर्शित ड्रोन की कीममत छह लाख रुपए है. जो किसान इसे खरीद न सकते, वे किसान 350 रुपए प्रति हेक्टयेर के हिसाब ड्रोन किराये पर ले सकते हैं.
कस्टम हायरिंग सेंटर राजस्थान के किसानों की राह आसान बना रहे हैं. इन सेंटरों से किसानों को कम किराय पर ट्रैक्टर समेत अन्य कृषि मशीनें मिल रही है. जिससे किसानों की लागत कम आ रही है.
राजस्थान के वन विभाग ने इस परेशानी को अब दूर कर दिया है. अब घर बैठे एक क्लिक पर ही आपको नजदीकी नर्सरी और उसमें मौजूद पौधे की जानकारी मिल जाएगी.
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