
ग्लोबल वार्मिंग का असर गंगा और यमुना घाटी में देखने को मिल रहा है. इस साल कम बर्फबारी से उत्तरकाशी की अधिकांश पहाड़ियां बिना बर्फ के दिखाई दे रही हैं, जबकि अमूमन इन दिनों मे ये पहाड़ियां बर्फ से ढकी रहती थीं. ऐसे में पहाड़ों में उगाई जाने वाली फसल को लेकर किसानों में चिंता देखने को मिल रही है. किसानों का कहना है कि अभी ये हाल है तो आगे चलकर क्या होगा. उन्हें इस बात को लेकर परेशानी है कि जब बर्फबारी नहीं होगी तो उनकी खेती-बाड़ी, फसलों और पेड़-पौधों का क्या होगा.
इस बार पहाड़ों में मौसम का परिवर्तन कुछ अधिक ही देखने को मिल रहा है. बहुत कम बर्फबारी के कारण फरवरी में ही उत्तरकाशी की अधिकांश पहाड़ियां काली नजर आ रही हैं. यमुनोत्री और गंगोत्री सहित उत्तरकाशी के जिन पहाड़ों में बर्फ की सफेदी साफ देखने को मिलती थी, वहां अब बर्फ नहीं दिख रही है. इसका असर ग्लेशियर पर भी देखने को मिलेगा क्योंकि रिकॉर्ड बर्फबारी से अस्थायी ग्लेशियर का निर्माण हो जाता है. इस बार कम हिमपात के कारण अस्थायी ग्लेशियरों की संख्या घटने का अनुमान है.
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ग्लेशियर नहीं होने से पानी के सोते और तालाब में पानी नहीं रहेगा. इससे पहाड़ों की नकदी फसलों पर भी असर देखने को मिलेगा. पहाड़ों में चोलाई, रामदाना, सेब और राजमा की खेती की जाती है, जो पूरी तरह से बर्फबारी पर ही निर्भर करती है. लेकिन कम बर्फबारी का असर इनकी पैदावार पर देखने को मिलेगा. आने वाले समय में इन फसलों की खेती घटेगी क्योंकि फसलों के लिए पर्याप्त पानी नही होगा और अनूकुल मौसम से फसलें वंचित हो जाएंगी.
उच्च हिमालयी क्षेत्र में नवंबर से मार्च तक जमकर हिमपात होता है. स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो पिछले दो दशक तक शीतकाल में पूरा गंगोत्री क्षेत्र बर्फ से लकदक नजर आता था. हाल के वर्षों में बारिश के साथ ही हिमपात में भी अनियमितता आ गई है. पहले जहां तीन से पांच फीट तक हिमपात होता था, वहां पर अब एक फुट तक ही बर्फबारी हो रही है. इस साल गंगा घाटी के हर्षिल, मुखवा, धराली, लामा टॉप, जसपुर, पुरगा, कचौरा टॉप, हरि महाराज, चोरंगी, यमुना घाटी के राडी टॉप, बोख नाग, भादरायी, फलांचा जैसी जगहों की पहाड़ियों पर बर्फ नाम मात्र की बची है. मार्च तक ये पहाड़ियां बर्फ से ढकी रहती थीं, लेकिन इस बार इसके आसार कम ही नजर आ रहे हैं.
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एक तरह गंगोत्री पहुंचे सैलानियों का कहना है कि जितनी बर्फबारी हुई है, उनके लिए उतनी पर्याप्त है. दूसरी ओर किसानों और स्थानीय लोगों की शिकायत है कि पहले की तुलना में कम बर्फ देखी जा रही है जिसका असर पहाड़ों में होने वाली खेती पर दिखेगा. बर्फबारी से सेब के पेड़ों को फायदा होता है क्योंकि उनपर समय से फूल और फल लगते हैं. अगर गर्मी बढ़ जाए या ओले गिरने लगें तो सेब को भारी नुकसान होता है. पहाड़ों में कहा जाता है कि सर्दी के तीन महीनों में अगर बर्फ ठीक पड़े तो फसल अच्छी होती है.(रिपोर्ट/ओंकार बहुगुणा)