
यह ठीक वैसा ही है जैसे कैरम की बिसात पर कोई खिलाड़ी गोटी मारता कहीं और है और उसका निशाना कहीं और होता है. खेल में इसे 'क्रॉस शॉट' कहते हैं, जहां देखने वालों को लगता है कि स्ट्राइकर सीधे बोर्ड के कोने पर जा रहा है, लेकिन असली मकसद टकराकर दूसरी तरफ पड़ी मुख्य गोटी को पॉकेट में डालना होता है. कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां बांटने वाले दुनिया के सबसे खतरनाक खरपतवारनाशक ग्लाइफोसेट (Glyphosate) को लेकर इस समय सरकारी फाइलों में ठीक ऐसा ही 'क्रॉस शॉट' खेला जा रहा है. फरीदाबाद स्थित केंद्रीय कृषि मंत्रालय की प्लांट प्रोटक्शन यूनिट में 30 जुलाई को हुई रजिस्ट्रेशन कमेटी (RC) की एक बैठक में इस जहर को बंद करने की बजाय इसके 'सुरक्षित उपयोग' का एक ऐसा 'कानूनी कवच' पहनाने की बात की गई, जिससे कंपनियों का धंधा भी मजे से चलता रहे और जनता की आंखों में धूल भी झोंकी जा सके.
वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार भारत के कृषि आयुक्त रजिस्ट्रेशन कमेटी यानी आरसी के पदेन अध्यक्ष होते हैं. इस बैठक में आरसी ने आधिकारिक तौर पर यह निर्णय लिया कि ग्लाइफोसेट का छिड़काव केवल ट्रेंड पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों (PCOs) के माध्यम से ही किया जाना चाहिए. ताकि खेतों में इसका छिड़काव करने वालों को स्वास्थ्य जोखिमों से बचाया जा सके. आरसी ने सीआईबीआरसी (CIB&RC) यानी केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं रजिस्ट्रेशन कमेटी के सचिव को निर्देश दिया है कि वे इस रेगुलेटरी फैसले को कृषि और किसान कल्याण विभाग को भेजें ताकि विभाग इस नीति पर अपना फैसला ले सके. ग्लाइफोसेट को पहली बार 1974 में मॉन्सेन्टो कंपनी द्वारा राउंडअप नाम से बाजार में उतारा गया था. बाद में मॉन्सेन्टो को बेयर ने खरीद लिया.
दुनिया के दर्जनों देशों में बैन और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) द्वारा 'संभावित कैंसरकारी' माना जा चुका ग्लाइफोसेट भारत में लंबे समय से विवादों में है. पर्यावरणविद् इसे पूरी तरह बैन करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन, कृषि मंत्रालय क्या कर रहा है? कागजों पर यह नैरेटिव बहुत चालाकी से सेट किया जा रहा है कि खेतों में काम करने वालों को ग्लाइफोसेट के सीधे छिड़काव से स्वास्थ्य का खतरा है, इसलिए आम किसान इसे सीधे खेतों में नहीं छिड़क पाएगा बल्कि इसके लिए विशेष लाइसेंस वाले पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटर को बुलाना पड़ेगा.
ऊपर से देखने पर लगता है कि सरकार पर्यावरण और किसानों की भलाई के लिए बहुत कड़ा कदम उठाने जा रही है, लेकिन इस रेगुलेटरी पॉलिसी का असली खेल कुछ और ही है. ऐसा लगता है कि एग्रो केमिकल कंपनियों को कृषि मंत्रालय एक 'सेफ पैसेज' देना चाहता है. जिससे वह जनता की नजर में महान बन जाए और कंपनियों का धंधा भी कम न हो. इस पूरी चाल का असली निशाना यह है कि ग्लाइफोसेट पर कभी भी पूरी तरह से बैन न लगे.
इस रेगुलेटरी खेल का सबसे बड़ा सबूत यह है कि जहां एक तरफ सरकार इसके उपयोग को सीमित और प्रतिबंधित करने का ढोंग रच रही है, वहीं दूसरी तरफ बैकडोर से कई कंपनियों को चीन से हजारों टन ग्लाइफोसेट भारत में मंगाने के नए कमर्शियल लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन धड़ल्ले से बांटे जा रहे हैं.
सब जानते हैं कि हमारे ग्रामीण इलाकों में कृषि नियमों का पालन किस तरह होता है. देश के सुदूर गांवों में कोई कीटनाशक इंस्पेक्टर यह जांच करने नहीं जाएगा कि दवा किसान छिड़क रहा है या कोई लाइसेंसधारी ऑपरेटर. इस तरह पीसीओ के नाम पर दुकानों पर यह जहर हमेशा की तरह खुलेआम बिकता रहेगा.
इस सुरक्षा कवच का सबसे बड़ा फायदा कंपनियों को होने जा रहा है. कल को अगर ग्लाइफोसेट के कारण किसी राज्य में कैंसर या जहर फैलने का बड़ा मामला सामने आता है, तो कंपनियां कोर्ट में साफ तौर पर यह कह देंगी कि हमने तो बोतल पर लिखा था कि इसे केवल ट्रेंड पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटर ही छिड़क सकते हैं. अगर किसी किसान ने खुद छिड़का, तो इसमें हमारी कोई गलती नहीं है. यानी जहर कंपनियों का बिकेगा, मुनाफा उनका होगा, लेकिन मौत की जिम्मेदारी खुद किसान और प्रशासनिक तंत्र की होगी.
भारत में इस प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण अवैध हर्बिसाइड-टॉलरेंट (HT) कपास की खेती है. देश में जीएम (GM) कपास की इस किस्म को मंजूरी नहीं है, इसके बावजूद गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना में इसके अवैध बीज धड़ल्ले से बोए जा रहे हैं. जब सरकार और उसकी एजेंसियां देश में धड़ल्ले से बिक रहे अवैध बीजों को नहीं रोक पा रही हैं, तो वे ग्लाइफोसेट के सुरक्षित उपयोग के नियम को जमीन पर कैसे लागू करवाएंगी, यह अपने आप में एक बड़ा मजाक है.
भारत में ग्लाइफोसेट का यह कानूनी कवच ऐसे समय में तैयार हो रहा है जब इसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हजारों केस चल रहे हैं. साल 2015 में डब्ल्यूएचओ की कैंसर अनुसंधान संस्था IARC ने ग्लाइफोसेट को 'ग्रुप 2A' (संभावित कैंसरकारी) की श्रेणी में डाला था, जो सीधे तौर पर नॉन-हॉजकिन लिंफोमा (ब्लड कैंसर) जैसी घातक बीमारी से जुड़ा है. इसी रिपोर्ट के आधार पर अमेरिका की अदालतों में पीड़ितों ने कंपनी पर मुकदमों की बाढ़ ला दी. इसके बाद अमेरिकी अदालतों ने हजारों करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया और माना कि यह केमिकल कैंसर का कारण है. मुकदमों से घबराकर इसकी निर्माता कंपनी को कोर्ट के बाहर मामलों को निपटाने के लिए करीब 92,000 करोड़ रुपये के मुआवजे के पैकेज का ऐलान करना पड़ा.
कैरम के इस खेल में सरकार 'नियंत्रण' का नाटक करके जनता और अदालतों को संतुष्ट रखने की कोशिश में जुटी हुई है, जबकि कंपनियां सुरक्षित तरीके से अपना अरबों रुपये का टर्नओवर बढ़ा रही हैं. कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि सुरक्षित उपयोग के नाम पर यह लीपापोती देश की मिट्टी, पानी और इंसानी स्वास्थ्य के साथ सरासर खिलवाड़ है. जब तक इस जानलेवा केमिकल पर देश में पूरी तरह से बैन नहीं लगाया जाता, तब तक यह कानूनी कवच केवल कंपनियों की तिजोरियां भरने और भारत के खेतों में जहर बांटने का 'आधिकारिक लाइसेंस' ही साबित होगा.
'जहर के खिलाफ जंग' सीरीज को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें:
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?
पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी
पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फिर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?
पार्ट-15: एक्सपर्ट पैनल ने पैराक्वाट पर सौंपी रिपोर्ट, किसान-कंज्यूमर या कंपनी किसके साथ खड़ी होगी सरकार?
पार्ट-16: सुरक्षित विकल्प मौजूद फिर भी भारत में बिक रहे खतरनाक कीटनाशक, यह है कोई लाचारी या कंपनियों से यारी?