कार्बेंडाजिम पर कृष‍ि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?

कार्बेंडाजिम पर कृष‍ि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?

Carbendazim: कृषि मंत्रालय ने मई 2020 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में कार्बेंडाजिम को खुद इंसानी सेहत के लिए खतरनाक स्वीकार करते हुए इस पर बैन लगाने का फैसला किया था, लेकिन इसके बाद अरबों रुपये का टर्नओवर करने वाली कीटनाशक कंपनियों की लॉबी ने नीति निर्माताओं पर ऐसा चौतरफा दबाव बनाया कि सरकार ने जनता की सेहत पर पूरी तरह 'यू-टर्न' ले लिया. इस जानलेवा केम‍िकल को बैन की ल‍िस्ट से चुपचाप बाहर करके करोड़ों भारतीयों की थाली में यह धीमा जहर परोसने की खुली छूट दे दी.

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ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Jun 26, 2026,
  • Updated Jun 26, 2026, 12:42 PM IST

यह सीधे-सीधे भारत के 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक सेहत और अजन्मे बच्चों के भविष्य के साथ हो रहा एक ऐसा क्रूर मजाक है, जिसकी अनुमति खुद देश का कानून दे रहा है. जिसे दुनिया के 29 विकसित देशों ने विज्ञान की कसौटी पर परखने के बाद इंसानी नस्ल का दुश्मन घोषित कर अपने देश से खदेड़ दिया, वह केम‍िकल आज भी भारत के बाजारों में शान से बिक रहा है. नाम है कार्बेंडाजिम. इसके जानलेवा 'चरित्र' पर खुद सरकारी दस्तावेजों में मुहर लगी हुई है, लेकिन जब बात एग्रो केम‍िकल कंपन‍ियों के मुनाफे की आती है, तो पूरा तंत्र घुटनों पर नजर आता है. 

कहानी शुरू होती है 1960 के दशक में, जब अमेरिका की दिग्गज केम‍िकल कंपनी ड्युपॉन्ट (DuPont) की प्रयोगशालाओं में एक क्रांतिकारी फफूंदनाशक (Fungicide) का जन्म हुआ. साल 1973 74 के आसपास जब यह व्यावसायिक तौर पर बाजार में आया, तो इसे फसलों को फंगस से बचाने वाली असरदार दवाई माना गया. यह एक सिस्टमिक केम‍िकल है, यानी पौधे के ऊपर छिड़कते ही यह उसके रोम रोम में समा जाता है. फंगस की कोशिकाओं का विभाजन रोककर यह फसलों को फफूंदी से मुक्ति दिलाता है. 

इन देशों में बैन 

लेकिन जब कोई वैज्ञान‍िक खोज मुनाफे की दौड़ में शामिल होती है, तो वह अंधी हो जाती है. साल 1980 और 1990 के दशक में यूरोपीय पर्यावरण संगठनों ने आरोप लगाया कि ड्युपॉन्ट जैसी कंपनियों ने इसके खतरनाक टॉक्सिकोलॉजी डेटा को दबाया. स्वतंत्र वैज्ञानिकों ने पाया कि यह केम‍िकल पौधों के जरिए जब इंसानी शरीर में पहुंचता है, तो धीमी तबाही मचाता है.

नतीजा यह हुआ कि यूरोपीय संघ (EU) के सभी 27 देशों, यूके, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने इस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए. यहां तक कि अगस्त 2022 में ब्राजील जैसे विशाल कृषि उत्पादक देश ने भी अपनी जनता के स्वास्थ्य को चुनते हुए इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया. फ्रांस ने जनवरी 2026 से उन खाद्य पदार्थों के आयात पर भी रोक लगा दी है जिसमें कार्बेंडाजिम का एक अंश भी मिले. लेकिन भारत की कहानी अलग है. भारत में यह वैध है, खुलेआम बिक रहा है और किसान इसे अपनी फसलों पर छिड़क रहे हैं. उन्हें कौन बताएगा कार्बेंडाजिम सेहत के ल‍िए क‍ितना खतरनाक है. 

कार्बेंडाजिम के जोखिम 

कार्बेंडाजिम के गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर दुनिया भर की स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा एजेंसियां चिंतित हैं. ऑस्ट्रेलियाई स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, कार्बेंडाजिम इंसानी शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करता है, जिससे लीवर की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं. दूसरी ओर खून में क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ने से किडनी खराब हो जाती है. यही नहीं, अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (US EPA) ने इसे संभावित मानव कैंसरकारक माना है, जिसके कारण अमेरिका में खाद्य फसलों पर इसे पूरी तरह बैन किया जा चुका है. 

वैज्ञानिक जांच में साबित हुआ कि कार्बेंडाजिम पुरुषों के शुक्राणुओं को गंभीर नुकसान पहुंचाता है. वैश्विक वर्गीकरण प्रणाली (GHS) ने इसे Category 1B Mutagen और टेराटोजेनिक माना. इसका मतलब है क‍ि यह गर्भवती महिलाओं के जरिए गर्भस्थ शिशु का विकास रोक देता है और जन्मजात शारीरिक विकृतियां पैदा करता है. 

खाने पर बैन, पर घास पर लीगल 

इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पन्ना अमेरिका से जुड़ता है. हां, कार्बेंडाजिम अमेरिका में खाने वाली फसलों पर पूरी तरह बैन है, लेकिन यहां चालाकी का एक गजब विरोधाभास देखने को मिलता है. अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने इसके स्वास्थ्य खतरों को देखते हुए फल, सब्जियों और अनाज जैसी सभी खाद्य फसलों पर इसके छिड़काव को कड़ाई से बैन कर दिया है. अमेरिकी नागरिकों के भोजन में इसकी मौजूदगी की अनुमति नहीं है. हालांक‍ि चालाकी देखिए, अमेरिकी कानून ने इसके गैर खाद्य उपयोगों के लिए एक चोर दरवाजा खुला छोड़ रखा है. 

अमेरिका में आज भी गोल्फ कोर्स की मखमली घास, कुछ चुनिंदा सजावटी पौधों और लकड़ी के संरक्षण के लिए इसके बेहद सीमित इस्तेमाल की छूट है. यानी, जो केम‍िकल इंसानी पेट में जाने के लिए जहर घोषित हो चुका है, वही केमकिल अमीरों के गोल्फ खेलने वाले मैदानों की हरियाली चमकाने के लिए फैक्ट्रियों में धड़ल्ले से बन रहा है. अमेरिकी कंपनियां इस लूपहोल का फायदा उठाकर भारी मुनाफा कमाती हैं और वैश्विक बाजार में इसका निर्यात करती हैं, जबकि खुद अपने देश के नागरिकों के भोजन से इसे दूर रखती हैं.

कागजी खेल और यू टर्न

ऐसा नहीं है कि भारत सरकार को इसके खतरों का पता नहीं था. कृष‍ि मंत्रालय ने मई 2020 के अपने नोट‍िफ‍िकेशन में यह माना था क‍ि 'कार्बेंडाजिम' इंसानी सेहत के लिए एक अत्यंत गंभीर खतरा है. यह सीधे गर्भस्थ शिशु और प्रजनन क्षमता को गंभीर क्षति पहुंचाता है. फंगीसाइड रेजिस्टेंस प्रतिरोध कार्य समिति (FRAC) ने भी फसलों में बढ़ती फंगल प्रतिरोधी क्षमता को देखते हुए इसे 'उच्च जोखिम' की श्रेणी में डाला है. इसके बावजूद यहां पर इसे पूरी तरह से बैन नहीं क‍िया गया है. 

साल 2020 में सरकार ने कार्बेंडाजिम समेत 27 खतरनाक कीटनाशकों को बैन करने का ड्राफ्ट निकाला, लेक‍िन, अरबों रुपये का कारोबार करने वाली एग्रोकेमिकल कंपनियों के संघों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. दलीलें दी गईं कि अगर यह सस्ता केम‍िकल बैन हुआ, तो देश में खाद्यान्न का संकट आ जाएगा, किसानों की लागत बढ़ जाएगी. फ‍िर सरकार ने समीक्षा के लिए एक कृष‍ि वैज्ञान‍िक डॉ. टीपी राजेंद्रन की कमेटी बना दी. कमेटी बनने के बाद जो होता है वही हुआ. 

कुछ महीने तक फाइलें घूमती रहीं और आखिरकार अक्टूबर 2023 में जब अंतिम आदेश (Insecticides Prohibition Order, 2023) आया, तो सरकार ने जनता की सेहत के दावों पर पूरी तरह यू टर्न ले लिया. 27 में से सिर्फ 4 केम‍िकल को बैन किया गया और इस खतरनाक कार्बेंडाजिम को प्रतिबंध की सूची से चुपचाप बाहर कर दिया गया. जो दलीलें सरकार ने खुद 2020 के कागजों में लिखी थीं, उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

चूंकि यह केम‍िकल पेटेंट मुक्त यानी जेनेरि‍क है, इसल‍िए इसे बनाने की लागत बहुत कम आती है.  कंपनियों को इस पर मोटा प्रॉफिट मार्जिन मिलता है. इसी अकूत मुनाफे के दम पर यह केम‍िकल लॉबी इतनी मजबूत है कि वह नीति निर्माताओं के फैसलों को प्रभावित कर देती है.

दोहरा मापदंड

यहां नीतियों का एक और कड़वा दोहरा मापदंड देखने को मिलता है. पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने स्थानीय स्तर पर बासमती चावल उगाने वाले जिलों में कार्बेंडाजिम पर आंशिक या अस्थायी रोक लगाई है. लेकिन यह रोक उन्होंने भारतीय नागरिकों की सेहत की चिंता में नहीं लगाई. यह रोक इसलिए लगाई गई क्योंकि यूरोपीय संघ ने भारत के बासमती चावल की खेप को यह कहकर रिजेक्ट करना शुरू कर दिया था कि इसमें कार्बेंडाजिम के अवशेष हैं.

यानी, जब देश के करोड़ों डॉलर के विदेशी व्यापार और निर्यात पर आंच आई, तो सरकारों ने तुरंत स्थानीय प्रतिबंध लगा दिए. लेकिन जो सब्जियां, जो अनाज सीधे आम भारतीय नागरिकों, गर्भवती माताओं और बच्चों की थाली में परोसा जा रहा है, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

जान की कीमत 

इस पूरी क्रोनोलॉजी, अमेरिकी विरोधाभासों और भारतीय फैक्ट्स का विश्लेषण करने के बाद एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा होता है: क्या विकसित देशों के नागरिकों की जान ज्यादा कीमती है और भारतीयों की जान की कीमत कंपनियों के टर्नओवर से कम है? जब विज्ञान चीख चीख कर कह रहा है कि यह केम‍िकल आने वाली नस्लों को बीमार बना सकता है, तब भी इसे केवल इसलिए बिकने देना क्योंकि यह सस्ता है, प्रशासनिक और नैतिक लापरवाही की पराकाष्ठा है.

सीरीज की खबरें यहां पढ़ें: 

पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?

पार्ट-2: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?

पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अध‍िकारी: WHO ने ज‍िसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?

पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली व‍िदेशी दाल और न‍ियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?

पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों

पार्ट-6: सरकार ने ज‍िस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कात‍िल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?

पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?

पार्ट-8: दुन‍िया के 31 देशों में बैन, भारत में ब‍िक्री जारी...डाइमेथोएट कीटनाशक पर स‍िस्टम की 'यारी' या लाचारी?

पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान

पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में स‍िस्टम का 'चहेता' क्यों?

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