सुरक्षित विकल्प मौजूद फिर भी भारत में बिक रहे खतरनाक कीटनाशक, यह है कोई लाचारी या कंपनियों से यारी?

सुरक्षित विकल्प मौजूद फिर भी भारत में बिक रहे खतरनाक कीटनाशक, यह है कोई लाचारी या कंपनियों से यारी?

Side Effects of Pesticides: पैराक्वाट डायक्लोराइड को बैन करने का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी हो गया है, लेकिम ग्लाइफोसेट का क्या होगा? क्या सरकार इसे भी बैन करने की हिम्मत दिखाएगी? ग्लाइफोसेट संभावित कैंसरकारी और हार्मोन बिगाड़ने वाला विलेन बताया गया है. यह महिलाओं के हार्मोनल सिस्टम को बुरी तरह डैमेज करता है. इस केमिकल के खिलाफ दुनिया भर की अदालतों में कैंसर के हजारों मामले चल रहे हैं, फिर भी भारत में इसे क्यों बेचा जा रहा है?

खतरनाक कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों पर बहस तेजखतरनाक कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों पर बहस तेज
ओम प्रकाश
  • Noida,
  • Jul 19, 2026,
  • Updated Jul 19, 2026, 2:31 PM IST

रोज सुबह जब भारतीय परिवारों की रसोई में ताजी सब्जियों, फलों और अनाज से भोजन तैयार होता है, तो कोई नहीं सोचता कि वे अपनों को पोषण के साथ-साथ धीमा जहर भी परोस रहे हैं. यह कोई सनसनीखेज हेडलाइन नहीं, बल्कि भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेजों से निकला वो कड़वा सच है, जिसे एग्रो केमिकल कंपनियों के अरबों रुपये के टर्नओवर और नीतिगत ढुलमुल रवैये के पीछे छुपा दिया गया है.भारत सरकार द्वारा 2020 में जारी 'कीटनाशक निषेध मसौदा आदेश' में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञ कमेटी ने साफ तौर पर स्वीकार किया था कि देश के खेतों में अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहे 27 केमिकल के सुरक्षित रासायनिक और जैविक विकल्प भारतीय बाजार में मौजूद हैं. फिर आज भी भारत में लोगों की सेहत से खेलने वाले केमिकल क्यों बिक रहे हैं?

दस्तावेज ने गवाही दी थी कि ये केमिकल इंसानों में कैंसर, गर्भवती महिलाओं के भ्रूण को नुकसान और बच्चों के दिमागी विकास को रोकने के लिए जिम्मेदार हैं लेकिन, जब 2023 में इस पर अंतिम फैसला आया, तो कॉर्पोरेट प्रेशर, सरकारी सुस्ती और सेटिंग के आगे विज्ञान हार गया. सरकार ने सिर्फ तीन केमिकल (डिकोफॉल, डाइनोकैप और मेथोमिल) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया. बाकी बचे 24 जानलेवा केमिकल को मामूली कागज़ी पाबंदियों के साथ भारतीय बाजार  में खुलेआम बिकने की छूट दे दी गई. इसके साथ ही, ग्लाइफोसेट, पैराक्वाट डायक्लोराइड और 2,4-डी जैसे सबसे विवादित खरपतवारनाशकों यानी हर्बिसाइड का इस्तेमाल भी 'विकल्प' होने के बावजूद खुलेआम जारी है. ऐसे में हम सरकार और एग्रो केमिकल कंपनियों के सामने बार-बार यह सवाल उठाएंगे कि जब सुरक्षित और आधुनिक विकल्प मौजूद हैं, तो 50 से 100 साल पुराने इन जानलेवा केमिकल को बाजार से बाहर क्यों नहीं किया जा रहा?

सस्ते जहर बनाम महंगे विकल्प

जब आप किसी आम किसान से पूछेंगे कि वह नए और सुरक्षित जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल क्यों नहीं करता, तो जवाब सीधे उसकी जेब से जुड़ा होगा. बाजार में इन खतरनाक केमिकल के टिके रहने का सबसे बड़ा स्तंभ प्राइस वॉर यानी कीमत का अंतर है. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या सस्ते के चक्कर में हम लोगों को जहर खिलाएंगे?

हाशिए पर सुरक्षित केमिकल

इस सूची में शामिल अधिकांश केमिकल आज से 50 से 100 साल पहले खोजे गए थे. इनका पेटेंट  दशकों पहले समाप्त हो चुका है. अब ये जेनेरिक मॉलिक्यूल हैं, जिनसे कोई भी कंपनी बेहद कम लागत पर अपने कारखाने में बना सकती है.

बाजार का क्रूर सच यह है कि एक एकड़ खेत में छिड़काव के लिए पुरानी जेनेरिक दवाओं की लागत मात्र 150 से 250 रुपये के बीच आती है. इसके विपरीत, जो नए जैविक या सुरक्षित रासायनिक विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं, वे ज़्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास पेटेंट हैं या फिर उन्हें बनाने की प्रक्रिया महंगी है. उनकी लागत 800 से 1500 रुपये प्रति एकड़ तक बैठती है.भारत का 85 फीसदी से अधिक किसान छोटा और सीमांत है, जिसके पास निवेश के लिए पूंजी नहीं होती. जब उसे अपनी खड़ी फसल बचाने के लिए 200 के 'जहर' और 1000 के 'सुरक्षित केमिकल' के बीच चुनना होता है, तो वह विवश होकर 200 का डिब्बा उठा लेता है. वह अपनी और देश की सेहत की कीमत पर फसल की लागत बचाता है. ऐसे में सरकार की भूमिका आती है. क्या सरकार खतरनाक केमिकल्स को बैन करके उनके सुरक्षित विकल्प को खरीदने के लिए सब्सिडी नहीं दे सकती? ताकि2 किसानों और आम लोगों की सेहत ठीक रहे.

भारत दुनिया में कीटनाशकों का एक बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश बन चुका है. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि देश के कुल पेस्टिसाइड कारोबार का लगभग 75% हिस्सा इन्हीं पुराने, विवादित और जेनेरिक केमिकल पर टिका हुआ है.

मई 2020 में जब सरकार ने इन 27 केमिकल को पूरी तरह बैन करने का ड्राफ्ट निकाला, तो भारतीय उद्योग जगत में हड़कंप मच गया. केमिकल लॉबी ने सरकार के सामने दलीलें रखीं कि यदि इन सभी केमिकल अचानक बंद किया गया, तो देश की सैकड़ों प्लांट रातों-रात बंद हो जाएंगे. फैक्ट्रियां बंद होने से हजारों करोड़ रुपये के निवेश डूब जाएंगे और एग्रो केमिकल सेक्टर में भारी नुकसान होगा.

अचानक विदेशी महंगी दवाओं पर निर्भरता बढ़ने से खेती की लागत और बढ़ जाएगी. इस भारी औद्योगिक दबाव के कारण नीति निर्माताओं ने बीच का रास्ता चुना. विज्ञान की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए, अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट मुनाफे को तरजीह दी गई.

खेतों में खुलेआम इस्तेमाल

सरकारी दस्तावेज़ों की गहराई से पड़ताल करने पर पता चलता है कि जिन 24 केमिकल को बाजार में ज़िंदा रखा गया है, उनके पीछे कितने भयानक वैज्ञानिक सच छुपे हैं.

  • मोनोक्रोटोफोस को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ने अत्यंत खतरनाक घोषित किया हुआ है और यह दुनिया के 112 देशों में बैन है. खेतों में इसके जहर से सैकड़ों किसानों की मौत और दुर्घटनाओं के इतिहास के बावजूद सरकार ने इसे पूरी तरह बैन करने के बजाय केवल सब्जियों पर रोका है. कपास और अनाज के नाम पर यह आज भी बिक रहा है.
  • क्लोरपायरीफॉस न्यूरोटॉक्सिक है, जो बच्चों और शिशुओं के दिमागी विकास को स्थायी नुकसान पहुंचाती है. दुनिया के 31 देशों में बैन होने के बावजूद भारत में बेर, कपास और तंबाकू को छोड़कर बाकी सब पर इसकी खुली छूट है.
  • कार्बोफ्यूरान भी बेहद खतरनाक है. पक्षियों, मछलियों और मधुमक्खियों के लिए यह काल है. दुनिया के 63 देशों में बैन है . भारत में इसके दानेदार रूप को आज भी मिट्टी में मिलाने के लिए खुलेआम बेचा जा रहा है.
  • ऐसफेट एक ऐसा केमिकल है जो मानव शरीर के पूरे हार्मोनल सिस्टम को तहस-नहस कर सकता है. यह केमिकल 32 देशों में बैन है, मगर हमारे यहां धान और कपास के खेतों में इसका छिड़काव आज भी वैध किया हुआ है.
  • कार्बेन्डाजिम को गर्भवती महिलाओं के लिए घातक और भ्रूण को विकृत करने वाला पाया गया है. यह दुनिया के 29 देशों में प्रतिबंधित होने के बावजूद भारत के बागवानों और फल उत्पादकों को सबसे ज़्यादा बेची जाती है.
  • मैनकोजेब देश में सबसे ज़्यादा बिकने वाला फंगीसाइड बताया जाता है. यह सीधे तौर पर खेतों और फैक्ट्रियों के मजदूरों के थायराइड प्रोफाइल को बिगाड़ता है. इसके सुरक्षित विकल्प होने के बाद भी यह धड़ल्ले से बिक रहा है.
  • कैपटन-हार्मोन बिगाड़ने की पुष्टि के बावजूद फलों पर छिड़का जा रहा है.  इसी तरह थायोफनेट मिथाइल मिट्टी के मित्र केंचुओं का हत्यारा है. और जीनेब-आयोडीन मेटाबॉलिज्म बिगाड़ने वाला है.
  • 2,4-डी का नाम किसानों के बीच काफी प्रचलित है. घास मारने वाले केमिकल्स में यह आज भी देश का सबसे सस्ता रासायनिक हथियार बना हुआ है, जबकि इसमें कैंसरकारी 'डायोक्सिन' तत्वों की मौजूदगी पाई गई है.
  • बुटाक्लोर भी सेहत के लिए खतरनाक है,  यह केमिकल धान के खेतों से रिसकर सीधे कुओं और बोरवेल के पानी में मिल जाता है. यह 31 देशों में बैन होने के बाद भी भारत के बाजार में धड़ल्ले से बिक रहा है.
  • ऑक्सीफ्लोरीन लिवर और खून की बीमारियों के खतरे के बाद भी आलू-मूंगफली जैसी कुछ फसलों को छोड़कर अन्य फसलों के लिए बाजार में वैध है. आखिर क्यों? क्या देश के नागरिकों की सेहत से ज्यादा जरूरी एग्रो केमिकल कंपनियों का लाभ है?

ग्लाइफोसेट पर कब होगा एक्शन?

केवल 24 कीटनाशक ही नहीं, बल्कि भारतीय कृषि में खरपतवार  साफ करने के नाम पर दो और ऐसे 'सुपर-किलर' इस्तेमाल हो रहे हैं, जिनके सुरक्षित विकल्प होने के बाद भी कंपनियां बाज़ार पर कब्ज़ा जमाए बैठी हैं.
पैराक्वाट डायक्लोराइड इसमें सबसे ऊपर है. इसको बैन करने का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी हो गया है. लेकिन कृषि मंत्रालय के इस आदेश के खिलाफ जहर बेचने वाली कंपनियां कोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं.
यह बिना एंटीडोट का सबसे खूंखार जहर है. ऑस्ट्रिया, इंग्लैंड, स्विट्जरलैंड और चीन सहित दुनिया के 74 देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित है. इसकी सबसे डरावनी बात यह है कि इसका कोई एंटीडोट (जहर काटने की दवा) ही नहीं है. यह मानव कोशिकाओं में प्रवेश कर फेफड़ों, किडनी और लिवर को नष्ट कर देता है.

ग्लाइफोसेट को संभावित कैंसरकारी और हार्मोन बिगाड़ने वाला विलेन बताया गया है. यह महिलाओं के हार्मोनल सिस्टम को बुरी तरह डैमेज करता है. इस केमिकल के खिलाफ दुनिया भर की अदालतों में कैंसर के हजारों मामले चल रहे हैं, फिर भी भारत में इसे क्यों बेचा जा रहा है. सवाल यह है कि इसे बैन करने का आदेश कब जारी होगा?

'लेवल क्लेम' का सरकारी छलावा

जब सरकार इन केमिकल को पूरी तरह बैन नहीं कर पाई, तो उसने जनता और पर्यावरणविदों के गुस्से को शांत करने के लिए एक नया प्रशासनिक हथकंडा अपनाया, जिसे कृषि तकनीक की भाषा में 'लेबल क्लेम हटाना' कहा जाता है. नियम बना कि मोनोक्रोटोफोस को अब सब्जियों पर नहीं छिड़का जा सकता, क्लोरपायरीफॉस को बेर या तंबाकू पर बैन किया गया है, और मालाथियान को कई फल-सब्जियों से हटा दिया गया है. लेकिन यह कागजी पाबंदी पूरी तरह से दिखावा साबित हुई है. 

हकीकत यह है कि भारत सरकार के पास ऐसा कोई निगरानी तंत्र नहीं है, जो देश के करोड़ों खेतों में जाकर यह चेक करे कि किसान दुकान से खरीदी हुई दवा को बैंगन पर छिड़क रहा है या कपास पर. ग्रामीण इलाकों में बैठे कीटनाशक डीलर किसानों को वही पुरानी और तेज दवाएं थमा देते हैं जिनमें उन्हें ज्यादा मुनाफा मिलता है, और किसान अनजाने में प्रतिबंधित फसलों पर भी इनका इस्तेमाल कर बैठता है.

खाद्य सुरक्षा का मनोवैज्ञानिक डर

बाजार में सुरक्षित विकल्प मौजूद होने के बाद भी नए जैविक उत्पादों का न टिक पाना सरकारी तंत्र की सुस्ती की ओर भी इशारा करता है. भारत में किसी भी नए, सुरक्षित या जैविक मॉलिक्यूल को पंजीकृत कराने और व्यावसायिक बिक्री की मंजूरी मिलने में 3 से 5 साल का समय लग जाता है, जबकि पुरानी रासायनिक कंपनियां अपने स्थापित नेटवर्क के दम पर पैर जमाए बैठी हैं. इसके साथ ही, नीतिगत स्तर पर एक और बड़ा मनोवैज्ञानिक डर काम करता है देश की खाद्य सुरक्षा का. 
रासायनिक कंपनियां सरकार के सामने यह थ्योरी मजबूती से रखती हैं कि यदि इन कड़े केमिकल को अचानक पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया, तो कीटों के प्रकोप से देश में फसलों का कुल उत्पादन अचानक 20 से 30 प्रतिशत तक गिर सकता है. खाद्यान्न उत्पादन में  गिरावट का डर दिखाकर ये कंपनियां दशकों पुराने केमिकल के जीवनकाल को बढ़ाती चली आ रही हैं. 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की थू-थू

एक्सपोर्ट रिजेक्शन का संकट एक बड़ा मुद्दा है. इस लचर नीति का खामियाजा अब देश की अर्थव्यवस्था भुगत रही है. यूरोपीय संघ ने कीटनाशकों और भारी धातुओं के अवशेष मिलने के कारण भारतीय कृषि उत्पादों जैसे आम, लीची, चावल, चाय की सैकड़ों खेपों को रिजेक्ट करके वापस भेज दिया है. दुनिया हमारी फसलों को 'जहरीला' मानकर ठुकरा रही है, लेकिन हमारे अपने ही देश में नागरिकों को वही खाना परोसा जा रहा है क्योंकि घरेलू बाजार में सेहत की सुरक्षा से जुड़े नियम बेहद लचर हैं. सवाल यह है कि देश की जनता अनजाने में हर निवाले के साथ  50 से 100 साल पुराने इन खतरनाक कॉर्पोरेट जहर को निगलने के लिए कब तक अभिशप्त रहेगी?

'जहर के ख‍िलाफ जंग' सीरीज को पढ़ने के ल‍िए यहां क्ल‍िक करें:

पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?

पार्ट-2: जिस हर्ब‍िसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?

पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अध‍िकारी: WHO ने ज‍िसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?

पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली व‍िदेशी दाल और न‍ियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?

पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों

पार्ट-6: सरकार ने ज‍िस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कात‍िल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?

पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?

पार्ट-8: दुन‍िया के 31 देशों में बैन, भारत में ब‍िक्री जारी...डाइमेथोएट कीटनाशक पर स‍िस्टम की 'यारी' या लाचारी?

पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान

पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में स‍िस्टम का 'चहेता' क्यों?

पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृष‍ि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?

पार्ट-12: किसान-कंज्यूमर की फिक्र कौन करे, बैन पर हुआ खेल, कृषि मंत्रालय का 'जहर' के सौदागरों से क्यों है इतना मेल?

पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी

पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फ‍िर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?

पार्ट-15: एक्सपर्ट पैनल ने पैराक्वाट पर सौंपी रिपोर्ट, किसान-कंज्यूमर या कंपनी किसके साथ खड़ी होगी सरकार?

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