
देश में खरीफ सीजन के बीच किसानों के लिए एक नई चुनौती सामने आ गई है. पानी में घुलनशील उर्वरकों की कीमतों में पिछले एक साल के दौरान 60 से 100 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है. उद्योग जगत की संस्था सॉल्यूबल फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SFAI) का कहना है कि अगर इस बार मॉनसून में कम बारिश होती है तो इन उर्वरकों की मांग बढ़ सकती है, लेकिन बढ़ती कीमतें किसानों की खरीद क्षमता पर असर डाल सकती हैं.
'बिजनेस लाइन' के अनुसार, SFAI के अध्यक्ष राजीव चक्रवर्ती के मुताबिक, घुलनशील उर्वरकों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल आया है. इसकी सबसे बड़ी वजह चीन द्वारा कुछ प्रमुख उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव हैं. इन दोनों कारणों से वैश्विक सप्लाई प्रभावित हुई है और भारत में आयात महंगा हो गया है. उन्होंने बताया कि मोनोअमोनियम फॉस्फेट (MAP) की अंतरराष्ट्रीय कीमत, जो पहले लगभग 1,000 डॉलर प्रति टन थी, अब बढ़कर 1,500 से 1,600 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार में भी देखने को मिल रहा है.
राजीव चक्रवर्ती का कहना है कि सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो किसान इन उर्वरकों का इस्तेमाल कम कर सकते हैं. जब कोई उत्पाद बहुत महंगा हो जाता है, तो किसान सस्ते विकल्प तलाशने लगते हैं. उनका कहना है कि कीमतों पर उद्योग का नियंत्रण नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार और आयात लागत पर निर्भर हैं.
भारत में घुलनशील उर्वरकों का घरेलू उत्पादन बहुत कम है. ऐसे में देश की जरूरतों का बड़ा हिस्सा इंपोर्ट किया जाता है. हर साल भारत लगभग 4 लाख टन घुलनशील उर्वरकों का आयात करता है. इस वित्तीय वर्ष में कुल आयात 2 से 2.5 लाख टन रहने का अनुमान है, जिसमें से करीब 1 लाख टन जून तक भारत पहुंच चुका है. राजीव चक्रवर्ती के मुताबिक, फिलहाल बाजार में आपूर्ति को लेकर कोई बड़ी चिंता नहीं है, क्योंकि पिछले साल भारी बारिश और बाढ़ के कारण इन उर्वरकों की खपत कम रही थी. इसका कुछ स्टॉक अभी भी उपलब्ध है. हालांकि, अगर इस सीजन में अचानक मांग बढ़ती है तो आने वाले महीनों में आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है.
महंगी कीमतों के कारण कई किसान अब सस्ते उर्वरकों की ओर रुख कर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर किसान सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) का उपयोग बढ़ा रहे हैं. हालांकि, इसमें फॉस्फोरस की मात्रा MAP की तुलना में काफी कम होती है, लेकिन इसकी कीमत भी काफी कम है. एक्सपट्स का मानना है कि यदि किसान फिर से यूरिया और डीएपी जैसे पारंपरिक उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करते हैं तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है.
एसएफएआई का कहना है कि अगर इस बार मॉनसून की बारिश सभी जगह बराबर नहीं होती और कई इलाकों में कम बारिश होती है, तो किसानों को पानी में घुलने वाले उर्वरकों की जरूरत ज्यादा पड़ सकती है. इन उर्वरकों को कम पानी में भी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है. यदि किसी क्षेत्र में बारिश कम होती है या लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनती है तो किसान फसलों को बचाने के लिए इन उर्वरकों का अधिक उपयोग कर सकते हैं. विशेष तौर पर कपास जैसी फसलों में इनका इस्तेमाल ज्यादा होता है. यदि बारिश समय पर नहीं होती और पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, तो किसान पौधों को पोषण देने के लिए घुलनशील उर्वरकों का छिड़काव बढ़ा सकते हैं.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पूरे देश में पहुंच चुका है, लेकिन फिलहाल सक्रिय मॉनसून का दौर कमजोर पड़ रहा है. मौसम विभाग ने संकेत दिए हैं कि जुलाई के मध्य से देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है. ऐसे में जिन इलाकों में वर्षा कम होगी, वहां किसानों को सिंचाई और पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा.