पान की खेती में बिहार के किसान का कमालगया, बिहार के श्याम सुंदर ने पान की खेती में मिसाल पेश की है. जब गर्मी का पारा 45 डिग्री के पार पहुंचता था, तो मगही पान की खेती करने वाले किसानों के लिए अपनी फसल बचाना नामुमकिन हो जाता था. लू की लहरें कोमल पान के पत्तों को जलाकर राख कर देती थीं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था. भीषण संकट के बीच, युवा किसान श्याम सुंदर ने हार मानने के बजाय अपनी सूझबूझ का परिचय दिया. उन्होंने महंगे उपकरणों के बजाय बांस और सूखी घास जैसे लोकल संसाधनों का उपयोग करके एक विशेष 'देसी शेड हाउस' तैयार किया. यह ढांचा बाहर की तपती गर्मी को अंदर आने से रोकता है और नमी बनाए रखता है.
इस 'जुगाड़' का नतीजा चमत्कारिक रहा. न केवल पान के पत्ते झुलसने से बच गए, बल्कि पैदावार भी 4 गुना बढ़ गई. यह जुगाड़ हवा में नमी बनाए रखकर पान की गुणवत्ता को भी निखारता है.
पान की खेती करने वाले श्याम सुंदर का यह देसी शेड हाउस 2 से 2.5 मीटर ऊंचा होता है, जिसे विशेष रूप से ढालू बनाया गया है ताकि बारिश का पानी आसानी से निकल सके. यह संरचना सूरज की सीधी रोशनी को छानकर केवल 30-35 फीसदी छाया पौधो को मिलता है, जो मगही पान के विकास के लिए सबसे बेहतर है. वही दूसरी ओर लोकल स्तर पर उपलब्ध बांस और सूखी घास का उपयोग करने के कारण इसकी लागत बहुत कम आती है, जिससे यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए सस्ता विकल्प है. यह देसी शेड न केवल पान के नाजुक पत्तों को जलने से बचाता है, बल्कि यह शेड पान के पौधों को अधिक पाले से भी बचाता है औऱ काले धब्बे जैसी बीमारियों को भी 5 से 10 प्रतिशत तक कम कर देता है.
इस शेड की सबसे बड़ी खास बात यह होती है पान के पौधों की सघन बुवाई की जाती है. इसमे केवल 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पान की बेलें लगाई हैं, जिससे न केवल खेत की जगह का सही उपयोग होता है, बल्कि घनी पत्तियों के कारण खरपतवार भी नहीं उग पाते. वैज्ञानिक नजरिये से देखा जाए तो इस चेंज किए गए शेड के भीतर बाहर की तुलना में अधिक ठंड और नमी रहती है. नतीजतन, जहां सामान्य तरीके से खेती करने पर एक बेल से केवल 20-25 पत्ते मिलते थे, वहीं इस नई तकनीक से किसान को अब प्रति बेल 100 तक पत्ते मिल रहे हैं. यह चार गुना वृद्धि खेती की पूरी तस्वीर बदल देती है जिससे किसान का मुनाफा काफी बढ़ जाता है.
खेती में तकनीक का असली पैमाना किसान की जेब में आने वाला मुनाफा है. श्याम सुंदर के इस प्रयोग ने उनकी सालाना आय को 1 लाख 40 हजार से बढ़ाकर सीधे 2.0 लाख रुपये पहुंचा दिया है. कम लागत वाले इस देसी शेड ने न केवल फसल के नुकसान को कम किया है, बल्कि बाजार में मिलने वाले पत्तों की चमक और गुणवत्ता को भी बढ़ाया है. अब उन्हें मौसम की अनिश्चितताओं, जैसे भीषण लू या अत्यधिक ठंड का डर नहीं सताता. श्याम सुंदर का कहना है कि अगर सही तरीके से संसाधनों का प्रबंधन किया जाए, तो खेती घाटे का सौदा कभी नहीं हो सकती.
श्याम सुंदर की यह सफलता केवल गया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. बिहार के मगही पान बेल्ट और उसके जैसे अन्य कृषि क्षेत्रों में इस कम लागत वाले मॉडल को आसानी से अपनाया जा सकता है. इस तकनीक को अन्य पान किसानों तक पहुंचाने की जरूरत है ताकि उन किसानों को लाभ मिल सके. पान की खेती में छोटे किसानों के लिए गर्मी और पाले की टेंशन रहती है, लेकिन देसी शेड जलवायु परिवर्तन से लड़ने का एक मजबूत हथियार है. श्याम सुंदर का इनोवेशन बताता है कि खेती की समस्याओं को हल करने के लिए बड़ी डिग्री की नहीं बल्कि एक नई सोच की जरूरत होती है.
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