
एक समय था जब महिलाओं का गाड़ी चलाना समाज के लिए हैरानी की बात माना जाता था। गांवों और छोटे शहरों में तो महिलाएं स्टीयरिंग संभालें, यह कल्पना से भी परे था. ऐसे दौर में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक महिला ने न केवल खुद ड्राइविंग सीखी, बल्कि हजारों लोगों को आत्मनिर्भर बनने का रास्ता भी दिखाया.यह प्रेरणादायक कहानी है सुखिया वर्मा की, जिन्होंने संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई.
महतारी गौरव वर्ष के अवसर पर सुखिया वर्मा की कहानी महिलाओं के साहस, आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव की मिसाल बनकर सामने आई है. उनका जीवन यह साबित करता है कि यदि हौसले मजबूत हों और परिवार का साथ मिले, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती.
ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी सुखिया वर्मा की शादी करीब 22-23 वर्ष की उम्र में हो गई थी. गांव में रहते हुए वे बैलगाड़ी चलाया करती थीं. उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि यही अनुभव एक दिन उन्हें ड्राइविंग ट्रेनर और सफल उद्यमी बना देगा.
शादी के बाद उन्होंने खेती-किसानी के कामों के बीच ट्रैक्टर चलाना सीखा. ट्रैक्टर चलाते-चलाते उनके मन में गाड़ी चलाने और दूसरों को सिखाने का विचार आया. हालांकि उस दौर में महिलाओं के वाहन चलाने को समाज सहज रूप से स्वीकार नहीं करता था. कई बार उन्हें तानों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
सुखिया वर्मा ने अपने शुरुआती दिनों में अस्पताल की एंबुलेंस भी चलाई. करीब चार वर्षों तक वे मरीजों को अस्पताल लाने और ले जाने का काम करती रहीं.रात के दो बजे भी यदि किसी मरीज को लाने का फोन आता, तो वे बिना किसी डर के निकल पड़ती थीं.
यह काम उनके लिए सिर्फ नौकरी नहीं था, बल्कि लोगों की मदद करने का माध्यम बन गया. मरीजों और उनके परिजनों की दुआओं ने उन्हें और मजबूत बनाया. इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि ड्राइविंग केवल वाहन चलाना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का रास्ता भी है.
ड्राइविंग स्कूल शुरू करने का सपना तो था, लेकिन आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी.ऐसे में सुखिया ने बड़ा फैसला लेते हुए अपने खेत की जमीन गिरवी रखकर मारुति 800 कार खरीदी. यही छोटी सी कार उनके बड़े सपनों की शुरुआत बनी.
इसके बाद उन्होंने ‘विद्या ड्राइविंग स्कूल’ शुरू किया और लोगों को सड़क पर गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया. उनका मानना है कि मैदान की बजाय सीधे सड़क पर वाहन चलाने से डर जल्दी खत्म होता है और आत्मविश्वास तेजी से बढ़ता है.
सुखिया वर्मा मानती हैं कि महिलाओं के लिए ड्राइविंग सीखना आत्मनिर्भरता की अहम सीढ़ी है. वे महिलाओं को घर से बाहर निकलकर वाहन चलाना सीखने के लिए प्रेरित करती हैं. यदि कोई जरूरतमंद महिला उनके पास प्रशिक्षण लेने आती है, तो वे कई बार सिर्फ ईंधन खर्च लेकर ही उसे ड्राइविंग सिखा देती हैं.
उनका कहना है कि ड्राइविंग सीखने के बाद महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपने फैसले खुद लेने लगती हैं. यही कारण है कि उनके स्कूल से प्रशिक्षण लेने वाली कई महिलाएं आज नौकरी कर रही हैं या अपना स्वयं का काम शुरू कर चुकी हैं.
आज सुखिया वर्मा 4000 से अधिक महिलाओं और पुरुषों को ड्राइविंग सिखा चुकी हैं. उनके माध्यम से 500 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिला है. कई लोग अलग-अलग संस्थानों में ड्राइवर के रूप में काम कर रहे हैं, जबकि कई लोगों ने खुद का वाहन चलाकर रोजगार शुरू किया है.
वे बताती हैं कि जब उनके पास प्रशिक्षण लेने वाले लोग बाद में सफल होकर वापस आते हैं और बताते हैं कि उन्हें नौकरी मिल गई या वे आत्मनिर्भर बन गए हैं, तो वही उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी होती है.
ड्राइविंग स्कूल से हुई कमाई से सुखिया वर्मा ने अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं. उन्होंने अपनी तीनों बेटियों की शादी की और परिवार को आर्थिक मजबूती दी. वे मानती हैं कि उनकी इस पूरी यात्रा में परिवार का सहयोग सबसे बड़ी ताकत रहा. उनके पति, बच्चों और ससुर ने हर कदम पर उनका साथ दिया.
आज सुखिया वर्मा की कहानी सिर्फ एक महिला की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो समाज या परिस्थितियों के डर से अपने सपनों को पीछे छोड़ देती हैं.
बैलगाड़ी से शुरू हुआ उनका सफर आज हजारों लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की मिसाल बन चुका है. महतारी गौरव वर्ष में सुखिया जैसी महिलाएं यह संदेश दे रही हैं कि मेहनत, आत्मविश्वास और हौसले के दम पर हर मंजिल हासिल की जा सकती है.
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