मछली पालनपहाड़ों की बर्फीली नदियों और झीलों में होने वाला ठंडे पानी की मछली पालन अब किसानों और युवाओं के लिए आय का बड़ा स्रोत बनता जा रहा है. कभी पारंपरिक मछली पकड़ने तक सीमित यह क्षेत्र अब आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों की मदद से तेजी से विकसित हो रहा है. यह मछली पालन उन इलाकों में किया जाता है जहां पानी का तापमान 5 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. यहां मुख्य रूप से रेनबो ट्राउट, गोल्डन महसीर और स्नो ट्राउट जैसी मछलियों का पालन किया जाता है.
मछलियों की बेहतर परवरिश के लिए हैचरी, आरएएस, बायोफ्लॉक और कोल्ड चेन जैसी आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि ठंडे पानी की मछली पालन रोजगार बढ़ाने, पोषण सुधारने और पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
भारत में ठंडे पानी की मछली पालन का दायरा लगातार बढ़ रहा है. जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड जैसे पहाड़ी राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के पर्वतीय इलाकों में भी इसका तेजी से विस्तार हो रहा है. ये सभी क्षेत्र मिलकर देश के 53 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक पर्वतीय इलाके को कवर करते हैं. खास बात यह है कि भारत में ठंडे पानी की मछलियों की 278 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. यही वजह है कि यह क्षेत्र न केवल रोजगार और आय बढ़ाने में मदद कर रहा है, बल्कि जैव विविधता संरक्षण और पहाड़ी क्षेत्रों के सतत विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
भारत में मछली उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. वर्ष 2024-25 में देश का कुल मछली उत्पादन करीब 197.75 लाख टन तक पहुंच गया. इसमें ठंडे पानी की मछली पालन का योगदान अंतर्देशीय मछली उत्पादन का लगभग 3 प्रतिशत है. वर्तमान में देश में ठंडे पानी की मछलियों का उत्पादन करीब 7,000 मीट्रिक टन है. खास बात यह है कि ट्राउट मछली का उत्पादन पिछले 10 वर्षों में लगभग 1.8 गुना बढ़ गया है और 2024-25 में यह करीब 6,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया.
जम्मू-कश्मीर देश का सबसे बड़ा ट्राउट उत्पादक क्षेत्र बनकर उभरा है. कोकरनाग हैचरी और 2,000 से अधिक निजी ट्राउट इकाइयों की मदद से यहां 2024-25 में लगभग 3,010 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन हुआ. वहीं, हिमाचल प्रदेश में 909 ट्राउट पालक और 1,739 ट्राउट पालन इकाइयां संचालित हैं, जहां 2025-26 में करीब 1,673 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन दर्ज किया गया. उत्तराखंड के पिथौरागढ़, बागेश्वर और चमोली जैसे जिलों में करीब 2,500 रेसवे की मदद से 2024-25 में लगभग 710 मीट्रिक टन ट्राउट और कुल 10,486 मीट्रिक टन मछली उत्पादन हुआ.
कठोर मौसम के लिए प्रसिद्ध लद्दाख भी इस क्षेत्र में पीछे नहीं है. यहां 120 रेसवे और 4 हैचरी की मदद से 50 मीट्रिक टन से अधिक मछली उत्पादन किया गया है. यह दिखाता है कि ठंडे पानी की मछली पालन पहाड़ी राज्यों में रोजगार और आय का एक मजबूत साधन बनती जा रही है.
पूर्वोत्तर भारत के राज्य जैसे अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड भी ठंडे पानी की मछली पालन को तेजी से बढ़ावा दे रहे हैं. इन राज्यों में नई हैचरियां स्थापित की जा रही हैं और ट्राउट मछली पालन का विस्तार किया जा रहा है. वहीं, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के पहाड़ी इलाकों जैसे वायनाड, नीलगिरी और उत्तर कन्नड़ में आधुनिक तकनीकों जैसे आरएएस (रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम) और बायोफ्लॉक सिस्टम का प्रयोग शुरू किया गया है.
इस क्षेत्र ने पहाड़ी राज्यों में रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा किए हैं. ठंडे पानी वाले राज्यों में करीब 23.51 लाख परिवारों को इससे आजीविका का सहारा मिला है, जबकि 33.78 लाख मछुआरे विभिन्न बीमा योजनाओं के दायरे में आए हैं. खास बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में ही 31 हजार से अधिक पंजीकृत मछुआरे और मछली पालक हैं, जो इस क्षेत्र की बढ़ती लोकप्रियता और आर्थिक महत्व को दर्शाता है.
भारत सरकार ठंडे पानी की मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए लगातार बड़े निवेश कर रही है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत 2020-26 के दौरान देशभर में लगभग 21,963 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 5,638 करोड़ रुपये से अधिक ठंडे पानी वाले राज्यों के लिए स्वीकृत किए गए हैं. इन परियोजनाओं के तहत हजारों रेसवे, ट्राउट हैचरी, आरएएस (रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम), तालाब, कोल्ड स्टोरेज और मछली परिवहन वाहन विकसित किए गए हैं. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे राज्यों को विशेष वित्तीय सहायता दी गई है, जिससे मछली पालन की आधुनिक सुविधाएं विकसित हो सकें.
सरकार की अन्य योजनाओं जैसे मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF), ब्लू रिवोल्यूशन योजना और पीएम-एमकेएसएसवाई के माध्यम से भी हैचरी, प्रशिक्षण केंद्र, बीमा, स्टार्टअप और छोटे उद्यमों को सहायता दी जा रही है. इससे मछली पालकों को आधुनिक तकनीक अपनाने और बेहतर बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिल रही है. जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में बनाए गए इंटीग्रेटेड एक्वा पार्क आधुनिक मछली पालन केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं. इनमें हैचरी, कोल्ड चेन, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं.
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