कितना खतरनाक है पैराक्वाट डाइक्लोराइड? भारत के खेतों, पर्यावरण और इंसानी फूड चेन में घुले सबसे खतरनाक केमिकल में से एक पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) का खेल अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है. मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा कदम उठाया है. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इस जानलेवा खरपतवारनाशक (हर्बिसाइड) पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आधिकारिक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. इस आदेश के लागू होने की तारीख से देश में कोई भी व्यक्ति पैराक्वाट डाइक्लोराइड का आयात, निर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण और उपयोग नहीं कर सकेगा. इस पर पूरी तरह से कानूनी रोक लगा दी गई है. यह जहर 70 से ज्यादा देशों में बैन है. जिनमें इसके आविष्कारक और उत्पादक शामिल हैं. 'किसान तक' 'जहर के खिलाफ जंग' नाम से कीटनाशकों के खिलाफ सीरीज चला रहा है. जिसका यह बड़ा असर हुआ है.
केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उच्च स्तरीय विशेषज्ञ पैनल और रजिस्ट्रेशन कमेटी की कड़े प्रतिबंध की सिफारिशों के बाद जारी इस गजट नोटिफिकेशन ने देश की ताकतवर एग्रो-केमिकल लॉबी के उन आर्थिक हितों पर सबसे तगड़ी चोट की है, जो बरसों से 'किसानों की जरूरत' और 'सस्ते विकल्प' की आड़ में देश के नागरिकों की सेहत का सौदा कर करोड़ों का मुनाफा कूट रही थीं. जबकि पैराक्वाट डाइक्लोराइड को चिकित्सा जगत में 'काल' माना जाता है, क्योंकि इसके संपर्क में आने पर जान बचाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके कोई एंटीडोट न होने और इलाज के दौरान फेफड़ों के तेजी से गलने के कारण यह अत्यधिक जानलेवा है यह लिवर, किडनी को डैमेज करने के साथ ही त्वचा और आंखों के लिए भी गंभीर खतरा है.
केरल सहित अन्य राज्यों द्वारा इस घातक केमिकल पर लगाए गए प्रतिबंधों को अदालतों द्वारा तकनीकी आधार पर पलटे जाने के बाद, अब केंद्र सरकार ने कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27 के तहत देशव्यापी कड़ा रुख अपनाया है. स्विट्जरलैंड, चीन, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे देशों द्वारा दशकों पहले प्रतिबंधित किए जा चुके इस जहर पर अब भारत के कृषि मंत्रालय ने भी पूरी तरह रोक लगा दी है.
एग्रो-केमिकल कंपनियों को जारी सभी पंजीकरण प्रमाणपत्र तुरंत रद्द माने जाएंगे. जिन भी निर्माताओं या डीलरों के पास इसके वैध प्रमाणपत्र हैं, उन्हें 3 महीने के भीतर अपनी पंजीकरण समिति को इसे सरेंडर करना होगा, ऐसा न करने पर उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक व कानूनी कार्रवाई की जाएगी. केंद्र ने राज्य सरकारों को इस आदेश को अपने-अपने स्तर पर सख्ती से लागू करने, औचक निरीक्षण करने और उल्लंघनकर्ताओं पर सीधी कानूनी कार्रवाई करने के पूरे अधिकार सौंप दिए हैं.
13 जुलाई 2026 के बाद 30 दिनों के भीतर, सभी प्रभावित पक्ष (किसान, कंपनियां) अपने सुझाव कृषि मंत्रालय को लिखित रूप में भेज सकते हैं. चूंकि यह अभी एक ड्राफ्ट ऑर्डर है, इसलिए सरकार ने प्रभावित होने वाले किसानों, आम जनता या कंपनियों को अपनी आपत्तियां और सुझाव भेजने के लिए 30 दिनों का समय दिया है. ये सुझाव संयुक्त सचिव (प्लांट प्रोटक्शन), कृषि भवन, नई दिल्ली को भेजे जा सकते हैं, जिन पर विचार करने के बाद इसे अंतिम रूप से लागू कर दिया जाएगा. 'किसान तक' की 'जहर के खिलाफ जंग' मुहिम ऐसे खतरनाक रसायनों के खिलाफ जारी रहेगी.
पैराक्वाट को केवल 9 स्वीकृत फसलों-चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर के लिए मंजूरी दी गई थी, लेकिन देश के कई हिस्सों जैसे राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसान स्वीकृत फसलों से अलग, कटाई से पहले मूंग की खड़ी फसल को तेजी से सुखाने के लिए इसका अवैध और अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे थे ताकि लेबर का खर्च बच सके. इससे यह जहर सीधे इंसानी फूड चेन में प्रवेश कर रहा था. जिस मूंग को आप सेहत ठीक करने के लिए खा रहे थे, हो सकता है कि उसमें पैराक्वाट का अवशेष हो. सरकार ने इस खतरनाक 'ऑफ-लेबल' उपयोग को बैन का एक बड़ा आधार माना है.
यह केमिकल अब केवल खेती तक सीमित न रहकर समाज के लिए खतरा बन चुका है. शेरोन राज हत्याकांड मामले में, केरल सेशंस कोर्ट ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर मानते हुए दोषी को मौत की सजा दी, जो इसकी भयावहता को दर्शाता है. यह मामला इसलिए सबसे अलग और डरावना था क्योंकि इसमें एक 22 साल की कॉलेज छात्रा ने अपने प्रेमी को रास्ते से हटाने के लिए किसी धारदार हथियार या बंदूक का नहीं, बल्कि खेतों में इस्तेमाल होने वाले इसी खतरनाक खरपतवारनाशक पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इस्तेमाल किया था. अनुपम वर्मा कमेटी (2015) की रिपोर्ट को आड़ बनाकर कंपनियों द्वारा की जा रही 'ऑफ-लेबल' बिक्री से मक्का, मूंग जैसी फसलों में यह जहर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा था. अब 'किसान तक' की रिपोर्ट और डॉक्टरों के आंकड़ों ने इस कानूनी कवच को तोड़ दिया है.
इस विनाशकारी केमिकल का इतिहास करीब 144 साल पुराना है. इसे पहली बार साल 1882 में ऑस्ट्रिया के दो वैज्ञानिकों ने लैब में तैयार किया था, जिसे शुरुआती दौर में 'मिथाइल वायलोन' नाम दिया गया. उस वक्त दुनिया इसके इस कदर जानलेवा होने से बिल्कुल अनजान थी, इसलिए इसका इस्तेमाल फसलों पर नहीं बल्कि कपड़ों को रंगने वाली एक रासायनिक डाई के रूप में होता था.
टेक्सटाइल डाई से दुनिया का सबसे खतरनाक हर्बिसाइड बनने का इसका सफर दशकों बाद शुरू हुआ. साल 1955 में ब्रिटेन के बर्कशायर में स्थित 'इम्पीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज' (ICI) की प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने खोजा कि यह केमिकल पौधों को बेहद तेजी से सुखाकर नष्ट कर सकता है. इसके बाद कंपनी ने इसे औद्योगिक रूप दिया और साल 1961 में ब्रिटेन में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया. इसके ठीक एक साल बाद, यानी साल 1962 में इसे पहली बार दुनिया के व्यावसायिक बाजार में 'ग्रामोक्सोन' (Gramoxone) ब्रांड नाम से उतारा गया.
यह बेहद विरोधाभासी है कि जिन मुल्कों ने इस जानलेवा केमिकल का आविष्कार किया और इसे पाला-पोसा, बाद में वहां की हुकूमतों ने भी इसे मानव जीवन के लिए 'काल' मान लिया. यही वजह है कि आज उन देशों के किसान अपनी फसलों पर इसका छिड़काव तक नहीं कर सकते. इसके बेहद खतरनाक दुष्प्रभावों को देखते हुए ऑस्ट्रिया ने साल 1993 में ही अपने देश में इसके उपयोग पर मुकम्मल पाबंदी लगा दी थी. इसी राह पर आगे बढ़ते हुए इंग्लैंड ने भी साल 2007 में अपनी सीमाओं के भीतर पैराक्वाट के वितरण और इसके छिड़काव को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित कर दिया था.
मगर इस पूरी कहानी का सबसे काला और चौंकाने वाला पहलू यह है कि इंग्लैंड ने साल 2007 में अपनी जमीन और अपने लोगों की सेहत की हिफाजत के लिए इस केमिकल को बैन तो किया, लेकिन वहां की कंपनियों को दूसरे देशों की कीमत पर तिजोरियां भरने की खुली आजादी दे दी. ब्रिटिश कारखानों में इस खतरनाक जहर का प्रोडक्शन लगातार जारी रहा और वहां से इसे भारत समेत दुनिया के कई विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट किया जाता रहा.
इससे भी बड़ी विडंबना देखिए कि इस जानलेवा जहर को बनाने वाली सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी 'सिंजेंटा' का हेडक्वार्टर जिस स्विट्जरलैंड में है, उसने अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए साल 1989 में ही इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था. इतना ही नहीं, साल 2017 में चीन ने भी अपनी धरती पर इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी, जबकि कड़वी हकीकत यह है कि इस केमिकल को बनाने वाली पैरेंट कंपनी का मालिकाना हक अब खुद चीन के पास ही है.
'जहर के खिलाफ जंग' सीरीज को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?
पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी
पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फिर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?
पार्ट-15: एक्सपर्ट पैनल ने पैराक्वाट पर सौंपी रिपोर्ट, किसान-कंज्यूमर या कंपनी किसके साथ खड़ी होगी सरकार?
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