50 साल इंतजार के बाद गांव ने खुद बनाया पुल, ढाई लाख में लिख दी विकास की नई कहानी

50 साल इंतजार के बाद गांव ने खुद बनाया पुल, ढाई लाख में लिख दी विकास की नई कहानी

बिहार के बगहा में 50 साल के लंबे इंतजार के बाद ग्रामीणों ने खुद अपनी समस्या का समाधान निकाल लिया. शिवपुर कॉलोनी के लोगों ने चंदा जुटाकर और श्रमदान से करीब ढाई लाख रुपये की लागत में 60 फीट लंबा लोहे का पुल बना दिया. इस पुल से हजारों लोगों की आवाजाही आसान हुई है, लेकिन यह व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है.

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50 साल इंतजार के बाद गांव ने खुद बनाया पुल, ढाई लाख में लिख दी विकास की नई कहानीगांव वालों ने चंदे से बना दिया 60 फीट लंबा पुल

बिहार के बगहा से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने विकास के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. यहां एक गांव के लोगों ने वह काम कर दिखाया, जिसका इंतजार वे पिछले 50 सालों से कर रहे थे. जब सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाने के बाद भी पहाड़ी नदी पर पुल नहीं बन सका, तो ग्रामीणों ने खुद अपनी समस्या का समाधान निकालने का फैसला किया.

रामनगर प्रखंड के सोनखर पंचायत स्थित शिवपुर कॉलोनी के लोगों ने आपसी सहयोग से चंदा इकट्ठा किया और दिन-रात मेहनत करके नदी पर लोहे का पुल बना दिया. करीब ढाई लाख रुपये की लागत से तैयार यह 60 फीट लंबा पुल अब गांव के लोगों के लिए बड़ी राहत बन गया है.

50 साल से पुल का कर रहे थे इंतजार

ग्रामीणों के अनुसार, शिवपुर कॉलोनी के लोग लंबे समय से पहाड़ी नदी पर एक पक्के पुल की मांग कर रहे थे. उन्होंने कई बार प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों के अधिकारियों से संपर्क किया. हर बार उन्हें जल्द पुल बनाने का भरोसा दिया गया, लेकिन वर्षों बीतने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ.

बारिश के मौसम में यह नदी ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती थी. नदी में पानी बढ़ने के बाद गांव का संपर्क टूट जाता था और लोगों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. आखिरकार ग्रामीणों ने फैसला किया कि अब वे किसी का इंतजार नहीं करेंगे और अपनी मदद खुद करेंगे.

चंदे और श्रमदान से तैयार हुआ पुल

गांव के लोगों ने मिलकर पुल बनाने के लिए चंदा जुटाना शुरू किया. किसी ने अपनी क्षमता के अनुसार पैसे दिए, तो कई लोगों ने निर्माण कार्य में अपना समय और मेहनत लगाई. कुछ ग्रामीणों ने लोहे और दूसरी जरूरी सामग्री जुटाने में भी मदद की.

कई दिनों की मेहनत के बाद करीब ढाई लाख रुपये की लागत से 60 फीट लंबा लोहे का पुल तैयार हो गया. ग्रामीणों की यह कोशिश अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है. यह पुल सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं है, बल्कि गांव की एकता और आत्मविश्वास की पहचान बन गया है.

स्कूल, खेती और इलाज के लिए बड़ी राहत

पहले बारिश के दिनों में पहाड़ी नदी में पानी बढ़ने के कारण गांव वालों की मुश्किलें बढ़ जाती थीं. नदी पार करने के लिए लोग अस्थायी बांस के पुल का इस्तेमाल करते थे, जो अक्सर पानी के तेज बहाव में बह जाता था. इस वजह से बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी होती थी. किसानों को खेतों तक पहुंचने में दिक्कत आती थी. वहीं, बीमार लोगों और बुजुर्गों को अस्पताल ले जाना भी मुश्किल हो जाता था. कई बार लोगों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती थी.

अब लोहे का पुल बनने के बाद ग्रामीणों को पूरे साल आने-जाने की सुविधा मिलेगी. इससे बच्चों की पढ़ाई, किसानों का काम और लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें काफी आसान हो जाएंगी.

ग्रामीणों की एकता बनी मिसाल

शिवपुर कॉलोनी के लोगों ने अपनी मेहनत और एकजुटता से यह साबित कर दिया कि मजबूत इच्छा शक्ति से बड़ी से बड़ी परेशानी का समाधान निकाला जा सकता है. ग्रामीणों की यह पहल आत्मनिर्भरता की एक शानदार मिसाल बन गई है. हालांकि, इस घटना ने सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. ग्रामीणों का कहना है कि जिस पुल का निर्माण सरकार को करना चाहिए था, उसे मजबूरी में उन्हें खुद बनाना पड़ा. 50 साल तक एक पुल का इंतजार करना यह बताता है कि आज भी कई गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है.

गांव वालों की मेहनत ने बदली तस्वीर

शिवपुर कॉलोनी के लोगों ने अपने प्रयास से न सिर्फ एक पुल बनाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि गांव की एकता किसी भी चुनौती को पार कर सकती है. उनकी यह कहानी अब पूरे क्षेत्र में प्रेरणा बन गई है. यह पुल ग्रामीणों के संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की पहचान है, लेकिन साथ ही यह भी याद दिलाता है कि हर गांव तक जरूरी सुविधाएं पहुंचाना प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है. (अभिषेक पांडेय का इनपुट)

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