E20 पर घमासान: राहुल-केजरीवाल के दावों के बीच सामने आई 2013 की इथेनॉल कहानी

E20 पर घमासान: राहुल-केजरीवाल के दावों के बीच सामने आई 2013 की इथेनॉल कहानी

E20 और इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच सियासी घमासान तेज है. 2013 के सरकारी रिकॉर्ड में 5 फीसदी ब्लेंडिंग लक्ष्य, घरेलू इथेनॉल की कमी और ग्लोबल टेंडर का जिक्र मिलता है. वहीं आज भारत में इथेनॉल उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ चुकी है. जानिए 2013 से 2026 तक पूरी कहानी.

E20 पर वार-पलटवारE20 पर वार-पलटवार
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Aug 12, 2026,
  • Updated Aug 12, 2026, 11:09 AM IST

इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर देश में सियासी बहस तेज है. राहुल गांधी E20 पेट्रोल को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं अरविंद केजरीवाल भी इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति पर लगातार निशाना साध रहे हैं. इसी बीच बीजेपी नेता अमित मालवीय ने दोनों नेताओं के आरोपों पर पलटवार करते हुए इथेनॉल ब्लेंडिंग की पुरानी कहानी सामने रखी है. उन्होंने 2013 की कांग्रेस सरकार के फैसलों और उस समय इथेनॉल की कमी के चलते निकाले गए ग्लोबल टेंडर का जिक्र किया है. उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड भी बताते हैं कि 2013 में 5 फीसदी अनिवार्य इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय किया गया था और घरेलू सप्लाई कम पड़ने पर 82.03 करोड़ लीटर के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किया गया था.

E20 को लेकर क्यों मचा है बवाल?

भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति कोई नई शुरुआत नहीं है. पिछले कई सालों से सरकारें पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की दिशा में काम करती रही हैं. अब जब देश में E20 यानी पेट्रोल में 20 फीसदी तक इथेनॉल मिश्रण की नीति लागू हो रही है, तो इसे लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल में E20 को लेकर सरकार पर हमला बोला और इसे आम लोगों तथा उनके वाहनों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बताया. उन्होंने E20 के असर और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर सवाल उठाए हैं. दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी E20 के खिलाफ सवाल उठा चुके हैं. उन्होंने पेट्रोल पंपों पर लोगों को सामान्य पेट्रोल और E20 में से विकल्प देने की मांग की है.

इसी राजनीतिक बहस के बीच बीजेपी की ओर से कहा जा रहा है कि आज E20 पर सवाल उठाने वाले नेताओं को पहले यह देखना चाहिए कि इथेनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत और शुरुआती दौर में इसकी सप्लाई की स्थिति क्या थी.

2012 में ही तय हो गया था 5 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य

इस पूरी कहानी को समझने के लिए करीब 13 साल पीछे जाना होगा. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक 22 नवंबर 2012 को कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स यानी CCEA ने देशभर में पेट्रोल में 5 फीसदी इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य तय किया था. इसे 30 जून 2013 तक हासिल करने की बात कही गई थी. इसके बाद 2 जनवरी 2013 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया गया. इसमें ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को BIS मानकों के अनुसार पेट्रोल में 10 फीसदी तक इथेनॉल मिलाकर बेचने का निर्देश दिया गया था, ताकि देशभर में औसतन 5 फीसदी ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल किया जा सके. संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट भी इस घटनाक्रम की पुष्टि करती है.

यानी यह बात रिकॉर्ड में है कि 2013 में ही पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की दिशा में एक स्पष्ट सरकारी व्यवस्था बनाई जा चुकी थी. उस समय केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी.

लेकिन असली समस्या इथेनॉल की उपलब्धता थी

नीति बनाना एक बात थी और उसके लिए पर्याप्त इथेनॉल उपलब्ध कराना दूसरी. 2013 में यही सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, तेल कंपनियों को बड़ी मात्रा में इथेनॉल की जरूरत थी, लेकिन घरेलू उत्पादकों से उतनी मात्रा में इथेनॉल नहीं मिल पा रहा था. संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक 2013 में 82.03 करोड़ लीटर इथेनॉल के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किया गया था. हालांकि ऊंची कीमतों के कारण यह ग्लोबल टेंडर बाद में बंद कर दिया गया.

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. ग्लोबल टेंडर जारी होने का मतलब यह नहीं था कि उतनी पूरी मात्रा में विदेशी इथेनॉल भारत में आ ही गया था. सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि टेंडर निकाला गया था, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण इसे बंद कर दिया गया. इसके बाद घरेलू स्रोतों से इथेनॉल जुटाने पर जोर दिया गया. यही वह रिकॉर्ड है जिसे लेकर अब बीजेपी कांग्रेस पर सवाल उठा रही है.

2013 में जरूरत ज्यादा, घरेलू सप्लाई काफी कम थी

उस समय भारत में इथेनॉल उत्पादन और उपलब्धता आज की तुलना में काफी कम थी. संसद की रिपोर्ट में बताया गया है कि तेल कंपनियां 5 फीसदी ब्लेंडिंग के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त इथेनॉल नहीं जुटा पा रही थीं. बाद में सरकार ने घरेलू स्रोतों से इथेनॉल खरीदने की व्यवस्था पर जोर दिया. जुलाई 2013 में तेल कंपनियों ने एक और टेंडर जारी किया, जिसमें 133.2 करोड़ लीटर इथेनॉल की मांग रखी गई थी. इसके जवाब में करीब 61.8 करोड़ लीटर की सप्लाई के प्रस्ताव मिले थे. इससे साफ होता है कि उस दौर में समस्या केवल नीति की नहीं, बल्कि इथेनॉल की घरेलू उत्पादन क्षमता और उपलब्धता की भी थी.

आज तस्वीर कितनी बदल चुकी है?

यहीं से इथेनॉल ब्लेंडिंग की मौजूदा कहानी दिलचस्प हो जाती है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2013-14 में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने करीब 38 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद की थी. 2023-24 में यही आंकड़ा बढ़कर 707 करोड़ लीटर हो गया. इसी अवधि में पेट्रोल में औसत इथेनॉल ब्लेंडिंग भी काफी बढ़ी. यानी करीब एक दशक में देश की इथेनॉल सप्लाई क्षमता में बड़ा बदलाव आया है. सरकार ने इसके पीछे अलग-अलग फीडस्टॉक से इथेनॉल बनाने की अनुमति, इथेनॉल की कीमतों में बदलाव, डिस्टिलरी क्षमता बढ़ाने और लंबे समय की खरीद नीति जैसे कदमों को महत्वपूर्ण बताया है.

2025-26 के लिए तेल कंपनियों ने करीब 1,050 करोड़ लीटर इथेनॉल की मांग रखी थी. ICRA के अनुसार इसके मुकाबले घरेलू निर्माताओं ने करीब 1,776 करोड़ लीटर की पेशकश की थी. यानी उपलब्धता अब उस दौर से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती है जब घरेलू उत्पादन मांग पूरी करने में पीछे रह जाता था.

इथेनॉल के लिए किसानों तक पहुंची नीति

इथेनॉल की कहानी सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं है. इसके पीछे गन्ना, मक्का और दूसरे कृषि उत्पादों से जुड़ा एक बड़ा बाजार भी है. सरकार ने समय के साथ इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का दायरा बढ़ाया. पहले जहां मुख्य रूप से C-heavy molasses से इथेनॉल उत्पादन की अनुमति थी, वहीं बाद में B-heavy molasses, गन्ने का रस, चीनी, सिरप और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त खराब अनाज जैसे स्रोतों को भी शामिल किया गया. इसका मकसद घरेलू इथेनॉल की उपलब्धता बढ़ाना था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल के आयात में कमी और विदेशी मुद्रा की बचत का भी फायदा हुआ है.

अब अमेरिका से इथेनॉल आयात का मुद्दा क्या है?

E20 की बहस के बीच अमेरिका से इथेनॉल आयात की खबरों ने भी विवाद बढ़ा दिया है. विपक्ष की ओर से इस बात को लेकर सवाल उठाए गए कि क्या भारत-अमेरिका व्यापार बातचीत के तहत अमेरिकी इथेनॉल को भारतीय पेट्रोल में मिलाने का रास्ता खोला जा रहा है. लेकिन 6 अगस्त 2026 को वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत ने अमेरिका से ईंधन में मिलाने के लिए इथेनॉल आयात करने को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं की है. सरकार ने ऐसी खबरों को गलत बताया और कहा कि पेट्रोल में ब्लेंडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला इथेनॉल घरेलू नीति के तहत घरेलू स्रोतों से हासिल किया जाता है.

इसलिए अमेरिका से इथेनॉल आयात को लेकर राजनीतिक आरोपों और सरकार के आधिकारिक बयान को अलग-अलग समझना जरूरी है.

2019 में इथेनॉल और बायोफ्यूल के आयात पर भी लगी थी पाबंदी

इथेनॉल आयात की चर्चा में 2019 का फैसला भी महत्वपूर्ण है. मई 2019 में सरकार ने बायोफ्यूल के आयात को 'restricted' श्रेणी में डाल दिया था. इसके बाद बायोफ्यूल के आयात के लिए DGFT से लाइसेंस की जरूरत हो गई थी. इससे पहले कुछ परिस्थितियों में गैर-ईंधन इस्तेमाल के लिए आयात की अनुमति थी. यही वजह है कि आज जब अमेरिका से ईंधन के लिए इथेनॉल आयात की बात होती है, तो 2019 के आयात नियम और मौजूदा सरकारी नीति दोनों को साथ में देखना जरूरी हो जाता है.

असली सवाल: E20 पर बहस कहां तक सही है?

इथेनॉल ब्लेंडिंग पर बहस को केवल कांग्रेस बनाम बीजेपी या राहुल गांधी बनाम सरकार की लड़ाई बनाना शायद पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. E20 के फायदे और नुकसान दोनों पर बात होनी चाहिए. सरकार का तर्क है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है, किसानों के लिए एक अतिरिक्त बाजार बनता है और विदेशी मुद्रा की बचत होती है. दूसरी ओर E20 को लेकर वाहन मालिकों की चिंता भी सामने आई है, खासकर पुराने वाहनों की माइलेज, इंजन और ईंधन प्रणाली पर संभावित असर को लेकर. राहुल गांधी और केजरीवाल इसी तरह के मुद्दों को उठा रहे हैं.

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि इथेनॉल अच्छा है या खराब. बड़ा सवाल यह है कि E20 को लागू करते समय उपभोक्ताओं, किसानों, वाहन कंपनियों और ईंधन कंपनियों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

2013 से 2026 तक की कहानी क्या बताती है?

अगर केवल इथेनॉल की उपलब्धता के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर में बड़ा बदलाव दिखाई देता है. 2013-14 में तेल कंपनियों की इथेनॉल खरीद करीब 38 करोड़ लीटर थी. 2023-24 में यह बढ़कर 707 करोड़ लीटर हो गई. 2025-26 के लिए घरेलू उत्पादकों की ओर से 1,776 करोड़ लीटर की पेशकश की गई, जबकि तेल कंपनियों ने करीब 1,050 करोड़ लीटर की मांग रखी थी. यानी 2013 की तुलना में आज भारत के पास घरेलू इथेनॉल उत्पादन की कहीं ज्यादा क्षमता है. इसी बदलाव को बीजेपी नेता अमित मालवीय ने राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के E20 विरोध के जवाब में राजनीतिक मुद्दा बनाया है.

हालांकि, इस पूरी बहस का दूसरा पहलू भी उतना ही जरूरी है. किसी नीति की पुरानी शुरुआत का हवाला देने से वर्तमान नीति पर उठे हर सवाल अपने आप खत्म नहीं हो जाते. E20 से पुराने वाहनों पर असर, माइलेज में बदलाव, उपभोक्ता की पसंद और कीमत जैसे सवालों का जवाब भी आंकड़ों और स्वतंत्र परीक्षणों के आधार पर दिया जाना चाहिए.

यानी इथेनॉल की कहानी सिर्फ राजनीति की कहानी नहीं है. यह किसानों, चीनी मिलों, मक्का उत्पादकों, तेल कंपनियों, वाहन मालिकों और देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है. 2013 में भारत इथेनॉल की कमी से जूझ रहा था, जबकि आज घरेलू उत्पादन क्षमता कहीं ज्यादा है. अब असली चुनौती यह है कि इस बढ़ी हुई क्षमता का फायदा किसानों और देश को मिले और साथ ही E20 को लेकर आम उपभोक्ताओं की चिंताओं का भी पारदर्शी तरीके से समाधान किया जाए.

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