
जब तक किसानों की लाशों पर एग्रो केमिकल कंपनियों की तिजोरियां भरती रहीं, तब तक सब ऑल इज वेल था. लेकिन जैसे ही एक फिल्म ने इस अरबों रुपये के धंधे की खाल खींचने की कोशिश की, देश के पेस्टिसाइड आकाओं को जोर का करंट लग गया. इसी महीने 24 जुलाई 2026 को रिलीज होने वाली फिल्म 'द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस' का अभी सिर्फ ट्रेलर ही आया है, और उतने में ही कीटनाशक बेचने वाले लोगों की बेचैनी बढ़ गई है. इस इंडस्ट्री के हितों को पूरा करने का काम करने वाली संस्था एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) के लोग भी तिलमिला उठे हैं.
कंपनियों ने आनन-फानन में सेंसर बोर्ड (CBFC) का दरवाजा खटखटाया है कि हुजूर, इस फिल्म को रोकिए, नहीं तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी जेबे गर्म करने वाली इस लॉबी के दोहरे व्यवहार का पूरा कच्चा चिट्ठा और उनके खोखले तर्क नीचे हाजिर हैं. इस आधिकारिक पत्र में कीटनाशक कंपनियों ने खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए कुछ ऐसे तर्क दिए हैं जो उनके डर को साफ बयां करते हैं.
इंडस्ट्री ने कहा है कि हम जहर नहीं छिड़कते, फसल बचाते हैं. संगठन के मुताबिक फिल्म के ट्रेलर में मुख्य रूप से कई चिंताजनक बयान दिए गए हैं, जिनमें से एक बात यह भी है कि देश को 50,000+ मीट्रिक टन कीटनाशक खिलाया गया. एग्रो केमिकल कंपनियों का तर्क है कि भारत की वार्षिक कीटनाशक खपत 50,000 नहीं, बल्कि केवल 40,094 मीट्रिक टन है. उनका कहना है कि खेतों में इसका इस्तेमाल करने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि देश की जनता सीधे कीटनाशक खा रही है. अब एग्रो केमिकल का झूठ देखिए. लोकसभा के दस्तावेज बता रहे हैं कि सालाना केमिकल पेस्टीसाइड की खपत 50,000 मीट्रिक टन से ज्यादा है.
एग्रो केमिकल इंडस्ट्री ने कहा है कि हमारा माल सुरक्षित है. अपनी पीठ थपथपाते हुए इंडस्ट्री ने सरकारी संस्था ICAR के अध्ययनों का हवाला दिया है कि परीक्षण की गई 96.5 फीसदी से अधिक फसलें तय कीटनाशक अवशेष सीमाओं (Residue limits) के भीतर हैं और खाने के लिए पूरी तरह से सेफ हैं.
इंडस्ट्री ने कहा है कि कैंसर का दोष हम पर क्यों? ट्रेलर में दिखाए गए कैंसर के दावों पर कंपनियों ने सीधा पल्ला झाड़ते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट आगे कर दी है. उनका तर्क है कि कैंसर तंबाकू, शराब, यूवी रेडिएशन और खराब जीवनशैली से होता है, इसे जबरन कृषि उत्पादों से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से गलत है. हालांकि, यह आधा सच है. WHO की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने कई कीटनाशकों को संभावित कैंसरकारी बता रखा है.
इंडस्ट्री ने कहा है कि मौत के आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया. कंपनियों ने तर्क दिया कि देश में होने वाली मौतों को फिल्म में बिना किसी संदर्भ के डराने के लिए पेश किया गया है. NCRB का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कीटनाशक से होने वाली मौतों में से केवल 7,821 मौतें ही 'दुर्घटनावश' सेवन की वजह से हुईं, बाकी नहीं.
सेंसर बोर्ड को लिखे गए आधिकारिक पत्र में ये कंपनियां ऐसे विलाप कर रही हैं मानो देश के किसानों की सबसे ज्यादा फिक्र इन्हीं को है. पत्र में लिखा गया है कि यह फिल्म मेहनती किसानों को कलंकित करती है. चलिए इस घड़ियाली आंसू की असलियत की परतें उखाड़ते हैं.
एग्रो केमिकल कंपनियां केमिकल का घातक कॉकटेल बेचकर हर साल हजारों करोड़ रुपये का नेट प्रॉफिट कूट रही हैं. लेकिन जब इन्हीं केमिकल के सही इस्तेमाल और इसके जानलेवा खतरों के प्रति किसानों को जागरूक करने की बात आती है, तो यह पूरी इंडस्ट्री सांप सूंघ जाने की तरह खामोश हो जाती है.
जब सरकार ने संभावित कैंसरकारी हर्बिसाइड 'ग्लाइफोसेट' पर लगाम कसने के लिए कड़े नियम बनाए और कहा कि इसे केवल सर्टिफाइड पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों (PCOs) के जरिए ही छिड़का जाएगा, तब किसानों के हित और 'खाद्य सुरक्षा' की दुहाई देने वाली इसी लॉबी ने सबसे पहले हाथ खड़े कर दिए थे. तब इन्हें किसानों की सेहत नहीं, बल्कि अपना घटता हुआ टर्नओवर दिख रहा था.
कंपनियों ने यह कहकर केंद्र सरकार के आदेश पर स्टे ले लिया कि देश में पीसीओ उपलब्ध नहीं हैं. एक जिम्मेदार उद्योग के नाते उन्होंने कभी ग्रामीण युवाओं को ट्रेनिंग देकर पीसीओ नेटवर्क बनाने या किसानों को मुफ्त सुरक्षा किट उपलब्ध कराने की कोशिश नहीं की ताकि वे सुरक्षित रह सकें. नतीजा यह है कि आज भी भारत के लाखों छोटे और सीमांत किसान बिना किसी जागरूकता और सुरक्षा उपकरणों के इस जहरीले खरपतवारनाशक का खेतों में छिड़काव कर रहे हैं.
पत्र में कंपनियों ने यह भी रोना रोया है कि इस फिल्म से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के कृषि निर्यात को झटका लगेगा और विदेशी नियामक हमारे माल को रिजेक्ट कर देंगे. जबकि सच तो यह है कि कीटनाशकों की वजह से पहले से ही हमारे कंसाइनमेंट रिजेक्ट होते रहे हैं. साफ है कि कंपनियों का यह दर्द देश की प्रतिष्ठा का नहीं है, बल्कि विदेशों में बिकने वाले माल और उससे आने वाले डॉलर के रुक जाने का है.
फिल्म का नाम बिल्कुल सटीक है-द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस. पेस्टिसाइड का 'जहर' सिर्फ हमारी थाली में नहीं, बल्कि एग्रो केमिकल कंपनियों की रगों में दौड़ रहे लालच में भी घुल चुका है. जब तक इनके केमिकल की तारीफ होती रही तब तक ठीक था. लेकिन जैसे ही किसी ने इनका भांडा फोड़ने की हिम्मत दिखाई, तो इन्हें मिर्ची लग गई. अब देखना यह है कि सेंसर बोर्ड जनता की जिंदगी चुनता है या इस रसूखदार एग्रोकेमिकल सिंडिकेट का करोड़ों का धंधा?
'जहर के खिलाफ जंग' सीरीज को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पार्ट-1: कंपनियों का मुनाफा, किसानों का जनाजा: मौत के अंतरराष्ट्रीय 'सौदागरों' को भारत में खुली छूट क्यों?
पार्ट-2: जिस हर्बिसाइड को 'दुनिया' ने नकारा, उसे हमारे 'सिस्टम' ने खेतों में क्यों उतारा?
पार्ट-3: अंधा कानून, बहरे अधिकारी: WHO ने जिसे 'कैंसरकारी' बताया, भारत में उसे 'वीआईपी' पास क्यों?
पार्ट-4: ग्लाइफोसेट वाली विदेशी दाल और नियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ समझौता?
पार्ट-5: खेतों में डाला जा रहा वियतनाम युद्ध वाला घातक केमिकल 2,4-D, कैंसर की चेतावनी पर परदा क्यों
पार्ट-6: सरकार ने जिस ऐसफेट को माना था मधुमक्खियों का 'कातिल' उसे सिस्टम ने खेतों में कैसे उतारा?
पार्ट-7: मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों से खदेड़ा गया वो 'रेड लेबल' जहर भारत में अब भी क्यों है आजाद?
पार्ट-9: पानी बचाने की आड़ में हर्बिसाइड का बड़ा खेल, कंपनियां और वैज्ञानिक निहाल, विलेन बनेगा किसान
पार्ट-10: Carbofuran: विकसित देशों का जहर कार्बोफ्यूरान भारत में सिस्टम का 'चहेता' क्यों?
पार्ट-11: कार्बेंडाजिम पर कृषि मंत्रालय का यू-टर्न, एग्रो-केमिकल लॉबी के आगे क्यों बेबस हुआ सिस्टम?
पार्ट-13: साहब, लोगों की जान सस्ती है या कंपनियों का मुनाफा? कृषि मंत्रालय के यू-टर्न की इनसाइड स्टोरी
पार्ट-14: जिसने 'एट्राजीन' खोजा उसने अपने यहां बैन किया, फिर भारत में क्यों जारी है हार्मोन्स से खिलवाड़?