
भारत सरकार अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के तहत देश के परिवहन ईंधन क्षेत्र में एक बहुत बड़े और युगांतकारी बदलाव का दावा कर रही है. इस पूरी मुहिम में 'इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल' (ईबीपी) कार्यक्रम को देश की ऊर्जा नीति के एक सबसे मुख्य और मजबूत स्तंभ के रूप में पेश किया गया है. सरकारी नीतिगत दस्तावेजों के अनुसार, पेट्रोल में गन्ने के रस, मक्के, अनाज और टूटे हुए चावल से तैयार किए जाने वाले ईंधन-ग्रेड इथेनॉल को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जा रहा है. सरकार का आधिकारिक तौर पर कहना है कि इस रणनीतिक कदम का सीधा और मुख्य मकसद देश की ऊर्जा सुरक्षा को हर लिहाज से मजबूत करना, विदेशों से आयात होने वाले महंगे कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना और इसके साथ ही पर्यावरण को प्रदूषण के घातक प्रभावों से बड़ी राहत देना है.
नीति निर्माताओं के मुताबिक, यह कार्यक्रम देश में ही उपलब्ध प्राकृतिक और नवीकरणीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करके भारत को ईंधन के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बेहद सोची-समझी और वैज्ञानिक रूप से परखी हुई रणनीति है. सरकार का मानना है कि इस योजना के जरिए न केवल देश का विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहेगा,बल्कि यह सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लक्ष्यों को हासिल करने में भी अपनी एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
इस पूरे कार्यक्रम का एक सबसे बड़ा पहलू किसानों की खुशहाली से जोड़कर पेश किया जाता है, जिस पर सरकार विशेष रूप से जोर देती रही है. सरकार का आधिकारिक दावा है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग योजना से देश के किसानों को सीधे तौर पर ₹1.60 लाख करोड़ से ज्यादा की अतिरिक्त आमदनी हुई है. नीतिगत बयानों के अनुसार, चीनी मिलों के अलावा अब मक्का और सरप्लस चावल का इस्तेमाल इथेनॉल के लिए होने से किसानों को अपनी फसलों के लिए एक नया और पक्का बाजार मिला है. सरकार का कहना है कि समय पर भुगतान और फसल के सही दाम मिलने से ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है और किसान अब देश की गाड़ियों के लिए ईंधन तैयार करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है.
सरकारी आंकड़ों और रिपोर्टों पर नजर डालें, तो इस प्रोग्राम की रफ्तार को लेकर बड़े दावे किए गए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, साल 2013-14 में पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट 1.5 फीसदी से भी कम थी, जिसे सरकार ने साल 2025-26 तक बढ़ाकर 20 प्रतिशत (E20) करने का दावा किया है. पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि भारत ने इस 20% ब्लेंडिंग के लक्ष्य को अपनी तय समय-सीमा से पूरे पांच साल पहले ही पूरा कर लिया है. सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट कहती है कि साल 2013-14 में जहां 38 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद होती थी, वहीं अब इसके 1,200 करोड़ लीटर से अधिक होने का अनुमान है, जिसके लिए देश में उत्पादन क्षमता को भी पांच गुना तक बढ़ाया गया है.
चूंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 88.5 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए सरकार इस योजना को आर्थिक रूप से बेहद अहम बताती है. सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, साल 2014-15 से लेकर अब तक मई 2026 तक इस ब्लेंडिंग कार्यक्रम की बदौलत देश के ₹1.90 लाख करोड़ से ज्यादा की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. इसके साथ ही, करीब 310 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल को प्रतिस्थापित करने और लगभग 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने का आधिकारिक दावा किया गया है, जिसे पर्यावरण के लिहाज से एक बड़ी राहत बताया जा रहा है.
इंटरनेट पर E20 ईंधन को लेकर चल रही आशंकाओं और भ्रामक बातों पर ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स और सरकारी एजेंसियों ने स्थिति स्पष्ट की है माइलेज पर दावा: सरकार और मारुति सुजुकी जैसी कंपनियों का कहना है कि माइलेज में 30% कमी की बात सिर्फ थ्योरी पर आधारित है. वास्तविक परिस्थितियों में यह कमी बेहद मामूली लगभग 0.6 किमी प्रति लीटर होती है, और माइलेज ईंधन से ज्यादा गाड़ी चलाने के तरीके और मेंटेनेंस पर निर्भर करता है. वही इंजन और वारंटी की स्थिति पर ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन (ARAI) और SIAM के परीक्षणों के हवाले से स्पष्ट किया गया है कि E20 से इंजन खराब होने का कोई पैटर्न नहीं मिला है.
कंपनियों ने साफ किया है कि इस ईंधन के इस्तेमाल से वाहनों की वारंटी या बीमा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. विशेषज्ञों के मुताबिक, इथेनॉल बनाने की डिस्टिलेशन प्रक्रिया में चीनी पूरी तरह खत्म हो जाती है, इसलिए ईंधन टैंक के पास चींटियों के आने का दावा वैज्ञानिक रूप से गलत है. साथ ही, पानी सोखने की समस्या को रोकने के लिए आधुनिक गाड़ियों के टैंक पहले से ही सुरक्षित डिजाइन किए गए हैं.
सरकारी विमर्श में इस बात पर जोर दिया गया है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना सिर्फ भारत का फैसला नहीं है, बल्कि यह एक स्वीकृत वैश्विक रणनीति है. उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में E10 और E15 का इस्तेमाल आम है, जबकि ब्राजील अपनी नीति के तहत 27 से 35 फीसदी तक इथेनॉल मिला रहा है. भारत सरकार का निष्कर्ष है कि विभिन्न मंत्रालयों, वैज्ञानिकों और वाहन निर्माताओं के साथ मिलकर तैयार की गई यह नीति देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए अनिवार्य है. सरकार के मुताबिक, यह कार्यक्रम आने वाले समय में देश की परिवहन व्यवस्था को स्वच्छ और अधिक मजबूत बनाने में अपनी भूमिका जारी रखेगा.