
देश में पोटाश उर्वरकों के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक पोषक स्रोतों को बढ़ावा देने की दिशा में कई कदम तेज कर दिए हैं. सरकार एक ओर चीनी उद्योग से निकलने वाले बाय-प्रोडक्ट पोटैशियम डिराइव्ड फ्रॉम मोलासेस (PDM) के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है. वहीं, दूसरी ओर देश में पोटाश के नए भंडार तलाशने और जैव उर्वरकों (Biofertilizers) के विकास पर भी जोर दे रही है. इन कोशिशों का मकसद किसानों को टिकाऊ विकल्प उपलब्ध कराना और पोटाश के आयाति पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है. केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने मंगलवार को राज्यसभा में एक लिखित जवाब के माध्यम से यह जानकारी दी.
केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने बताया कि पोटैशियम डिराइव्ड फ्रॉम मोलासेस (PDM) चीनी उद्योग का बाय-प्रोडक्ट है, जिसमें न्यूनतम 14.5 प्रतिशत पोटाश होता है. इसका इस्तेमाल खेतों में पारंपरिक म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) के विकल्प के रूप में किया जा सकता है. PDM को वर्ष 2009 में उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO) के तहत नोटिफाइ किया गया था और 13 अक्टूबर 2021 से इसे न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना में शामिल किया गया था.
उन्हाेंने आगे बताया कि सरकार ने खरीफ 2026 सीजन के लिए PDM पर 345 रुपये प्रति टन की सब्सिडी निर्धारित की है. इसका उद्देश्य किसानों तक इस वैकल्पिक उर्वरक की उपलब्धता बढ़ाना और इसके उत्पादन को प्रोत्साहित करना है. साथ ही PDM की कीमतों पर नजर रखने के लिए खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग, उर्वरक विभाग, इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और उर्वरक कंपनियों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक संयुक्त कार्य समूह का गठन किया गया है.
वहीं, राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) के तहत भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने देश में पोटाश की खोज का दायरा बढ़ाया है. मिशन की शुरुआत के बाद राजस्थान और पंजाब में पोटाश के लिए आठ अन्वेषण परियोजनाएं (Exploration Projects) शुरू की गईं. इसके अलावा वर्ष 2026-27 में भी इन दोनों राज्यों में छह नई परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया है.
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2015 के बाद से GSI ने राजस्थान और पंजाब में विभिन्न ग्रेड और कट-ऑफ स्तरों पर कुल 456.52 मिलियन टन पोटाश संसाधनों का आकलन किया है. इससे भविष्य में घरेलू उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं को मजबूती मिलने की उम्मीद है.
वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने ऐसे सूक्ष्मजीव विकसित किए हैं, जो मिट्टी में पहले से मौजूद पोटाश को पौधों के लिए अधिक उपलब्ध बनाने में मदद करते हैं. इनमें फ्रेट्यूरिया ऑरैंटिया (Frateuria aurantia), सेराटिया लिक्विफैशियन्स (Serratia liquefaciens) और बैसिलस (Bacillus) प्रजाति के सूक्ष्मजीव शामिल हैं. इन्हें पोटाश जैव उर्वरक के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि रासायनिक पोटाश उर्वरकों की जरूरत कम हो और किसानों को लंबे समय के लिए और टिकाऊ विकल्प मिल सकें.