खेती में अमोनिया के इस्तेमाल को मंजूरी (AI Image)देश में बढ़ती यूरिया मांग और नाइट्रोजन आधारित खादों पर निर्भरता के बीच केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है. किसानों को यूरिया की संभावित किल्लत से बचाने और उर्वरक क्षेत्र में नए विकल्प तैयार करने के मकसद से सरकार ने फसलों में एनहाइड्रस अमोनिया (Anhydrous Ammonia) के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है. यह कदम लंबे समय में भारत के उर्वरक आयात बिल को कम करने और घरेलू उत्पादन क्षमता को अधिक प्रभावी बनाने में मददगार साबित हो सकता है.
कृषि क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, जहां यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है, वहीं एनहाइड्रस अमोनिया में कम से कम 82 प्रतिशत नाइट्रोजन मौजूद रहता है. नाइट्रोजन फसलों की वृद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में से एक है और इसकी कमी की शिकायतें लगभग हर कृषि सीजन में सामने आती हैं.
23 जुलाई को जारी अधिसूचना के अनुसार, केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने फर्टिलाइजर (इनऑर्गेनिक, ऑर्गेनिक या मिक्स्ड) कंट्रोल ऑर्डर, 1985 के क्लॉज 20A के तहत किसी भी योग्य कारखाने को गैजेट नोटिफिकेशन की तारीख से तीन साल के लिए एनहाइड्रस अमोनिया खाद के उत्पादन की अनुमति प्रदान की है. मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उर्वरक में वजन के आधार पर कम से कम 82 प्रतिशत नाइट्रोजन होना जरूरी होगा.
उद्योग जगत से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि अमोनिया आधारित उर्वरक तकनीक सफल साबित होती है तो भारत दुनिया का चौथा देश बन जाएगा जहां बड़े पैमाने पर नाइट्रोजन पोषण के लिए अमोनिया का उपयोग किया जाएगा. वर्तमान में अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में यह तकनीक पहले से अपनाई जा चुकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि अमोनिया का उपयोग भारतीय कृषि क्षेत्र में उर्वरक प्रबंधन को नई दिशा दे सकता है, हालांकि इसके लिए विशेष तकनीकी और सुरक्षा व्यवस्थाओं की जरूरत होगी.
यूरिया और अमोनिया दोनों नाइट्रोजन स्रोत हैं, लेकिन इनके प्रयोग की विधि अलग-अलग है. यूरिया को सामान्य रूप से खेतों में छिड़का जाता है, जबकि एनहाइड्रस अमोनिया गैस स्वरूप में होने के कारण इसे मिट्टी के अंदर इंजेक्ट करना पड़ता है. इसके लिए खास तरह के उपकरण, भंडारण टैंक और परिवहन व्यवस्था की जरूरत होती है. यही कारण है कि कृषि विशेषज्ञ और उद्योग जगत इसके व्यापक उपयोग से पहले इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा मानकों को सबसे बड़ी चुनौती मान रहे हैं.
यूरिया निर्माण क्षेत्र की एक प्रमुख कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अमोनिया के उपयोग की अनुमति मिलना अच्छी पहल है, लेकिन इसे वास्तविक रूप से लागू करना आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा कि गैस रिसाव की संभावनाएं और उससे जुड़े सुरक्षा जोखिम इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती होंगी.
उद्योग सूत्रों के मुताबिक, कई यूरिया प्लांट हर साल 2,000 से 6,000 टन अतिरिक्त अमोनिया का उत्पादन करते हैं. उत्पादन क्षमता की सीमाओं के कारण इस पूरी मात्रा का उपयोग यूरिया निर्माण में नहीं हो पाता और कंपनियां इसे बाजार में बेच देती हैं. सरकार ने इस अमोनिया की बिक्री को प्राथमिकता देते हुए निर्देश दिया है कि इसे सबसे पहले कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर (एनपीके) निर्माताओं को उपलब्ध कराया जाए ताकि घरेलू उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा मिल सके.
मंजूरी मिलने में देरी के कारण खरीफ 2025 सीजन में इसका उपयोग शुरू नहीं हो पाया. अब रबी 2025-26 सीजन के दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के 13 संस्थानों में एनहाइड्रस और एक्वस अमोनिया के परीक्षण किए जाएंगे. सूत्रों के अनुसार, शुरुआती योजना तीन कृषि मौसमों में परीक्षण करने की थी, लेकिन उत्पादन बढ़ाने की रणनीति के तहत मंजूरी प्रक्रिया को तेज किया गया है. उम्मीद है कि आगामी खरीफ सीजन में कुछ क्षेत्रों को पायलट परियोजना के तहत शामिल किया जा सकेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, हर दिन 1,200 टन क्षमता वाले ग्रीन अमोनिया प्लांट लगाने के लिए करीब 13,000 से 15,000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी. हालांकि शुरुआती लागत अधिक है, लेकिन लंबे समय में इससे आयातित उर्वरकों और एलएनजी पर निर्भरता कम हो सकती है.
देश में जुलाई के शुरुआती दस दिनों में अच्छी बारिश होने के बाद यूरिया की मांग में तेज उछाल दर्ज किया गया है. 17 जुलाई तक महीने की कुल अनुमानित मांग का 60 प्रतिशत से अधिक यूरिया बिक चुका था. इसके मुकाबले डीएपी और कॉम्प्लेक्स खादों की बिक्री 50 प्रतिशत से कम और एमओपी की बिक्री लगभग 30 प्रतिशत रही. जुलाई कृषि कैलेंडर का सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है क्योंकि इसी दौरान खरीफ फसलों की बुवाई अपने चरम पर होती है और मॉनसून की सबसे अधिक बारिश भी इसी अवधि में होती है.
भारत वर्तमान में लगभग 100 लाख टन यूरिया का आयात करता है, जबकि देश में लगभग 300 लाख टन उत्पादन होता है. हालांकि घरेलू उत्पादन का बड़ा हिस्सा आयातित एलएनजी पर आधारित है. ऐसे में अमोनिया के सफल उपयोग से उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और आयात पर होने वाले भारी खर्च को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है. सरकार और कृषि वैज्ञानिकों की नजर अब आईसीएआर के ट्रायल पर टिकी है. यदि प्रयोग सफल रहते हैं तो भारतीय कृषि में नाइट्रोजन पोषण के लिए एक नया और अधिक प्रभावी विकल्प किसानों के सामने उपलब्ध होगा.
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