
एक बार फिर पूरे देश में कश्मीर की चर्चा हो रही है. लेकिन ये चर्चा दूसरी आम चर्चाओं से जरा अलग हटकर है. इस चर्चा में कश्मीर की दिल खोलकर तारीफ हो रही है. तारीफ इसलिए कि कश्मीरी युवा पशुपालन, मछली और भेड़ पालन में जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं. युवाओं की मेहनत का ही नतीजा है कि दूध और मछली उत्पादन के आंकड़े असमान को छू रहे हैं. इतना ही नहीं कश्मीर में दूध-मछली उत्पादन के ये आंकड़े देखकर दिल्ली भी गदगद है. जिस कश्मीर से कभी सिर्फ आतंकवाद, दहशत, गोलीबारी की खबरें आती थीं, वहां से युवाओं की तरक्की की बड़ी-बड़ी खबरें आ रही हैं.
केन्द्र और राज्य सरकार भी साथ मिलकर मछली और पशुपालन से जुड़ी योजनाओं को युवाओं तक पहुंचा रहे हैं. सरकार की पहल के चलते ही कश्मीर में 50 हजार लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाले अल्ट्रा हाई टेम्परेचर (यूएचटी) दूध प्रोसेसिंग यूनिट खुल चुकी है. जल्द एक्वाकल्चर पार्क शुरू करने की तैयारियां चल रही हैं. पार्क बन जाने के बाद कश्मीर के मछली पालन को रफ्तार मिलेगी. लोगों को रोजगार मिलने के साथ ही खेती कर रहे किसानों की इनकम भी डबल होगी.
फिशरीज एक्सपर्ट का कहना है कि मछली उत्पादन बीज की क्वालिटी पर टिका होता है. इसी को देखते हुए केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लिए डेनमार्क से रेनबो और ब्राउन ट्राउट मछपलियों के 13.40 लाख आनुवंशिक रूप से उन्नत अंडे (ओवा) आयात की सुविधा दी थी. इससे ट्राउट मछली पालने वालों को अच्छा बीज मिल गया. जिसके चलते कश्मीर में ट्राउट मछली का उत्पादन रफ्तार पकड़ गया. अगर साल 2020-21 में हुए उत्पादन की बात करें तो 650 टन हुआ था. वहीं साल 2023-24 में ट्राउट का उत्पादन 2380 टन पर पहुंच गया है.
वहीं जम्मू-कश्मीर का सालाना मछली उत्पादन साल 2013-14 में 20 हजार टन से बढ़कर 2024-25 में 29 हजार टन पर पहुंच गया है. जबकि ट्राउट मछली का उत्पादन 262 टन से बढ़कर 2380 टन हो गया है, जो ट्राउट उत्पादन में 800 फीसद से ज्यादा की बढ़ोतरी दिखा रहा है. इतना ही नहीं ट्राउट मछली का बीज उत्पादन भी 90 लाख से बढ़कर 1.5 करोड़ से भी ज्यादा हो गया है, जबकि कार्प मछली बीज उत्पादन चार करोड़ से बढ़कर 6.35 करोड़ हो गया है.
जम्मू-कश्मीर में सिर्फ मछली उत्पादन ही नहीं पशुपालन भी तेजी से बढ़ रहा है. देसी नस्ल की गाय पाली जा रही हैं. कश्मीरी पशुपालन पंजाब-हरियाणा से मुर्रा भैंस खरीदकर ले जा रहे हैं. धीरे-धीरे कश्मीर में पशुओं की संख्या बढ़ रही है. अगर सभी तरह की ब्रीड वाली गायों की बात करें तो उनकी संख्या 9 लाख से ज्यादा और भैंसों की संख्या दो लाख से ज्यादा है. अब अगर दूध उत्पादन की बात करें तो जम्मू-कश्मीर में दूध उत्पादन 2014-15 में 19.50 लाख टन हुआ था. जो साल 2024-25 में बढ़कर 29.73 लाख टन हो गया है. एक्सपर्ट दूध उत्पादन में इसे 50 फीसद की बढ़ोतरी बता रहे हैं.
जानकारों की मानें तो मछली और दूध उत्पादन के संबंध में मजबूत बुनियादी ढांचे के निर्माण और किसानों को बाजारों से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) तथा राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) जैसे प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों को शामिल करते हुए एक योजना तैयार की जा रही है. साथ ही भारत सरकार ने हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए पीएमएमएसवाई के तहत 852 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जिसमें विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के लिए 300 करोड़ रुपये शामिल हैं.
इससे उत्पादन, उत्पादकता, बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा दिया जा सकेगा. केन्द्री य मंत्री ने बताया कि एफआईडीएफ के माध्यम से शीत जल मत्स्य पालन में 120 करोड़ रुपये से अधिक के निजी निवेश का समर्थन किया गया है.
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ऑफ कश्मीर (SKUAST-K) के वाइस चांसलर नजीर अहमद गनई ने किसान तक को बताया कि कश्मीर में भेड़ के मीट की डिमांड पूरी करने के लिए ऑस्ट्रेलिया से डॉर्पर और टेक्सेल भेड़ मंगाई गई हैं. इसके अलावा लोकल ब्रीड पर भी काम चल रहा है. जानकारों की मानें तो डॉर्पर भेड़ के मेमने चार महीने में ही 35 से 40 किलोग्राम वजन तक के हो जाते हैं. जबकि व्यस्क भेड़ का वजन 90 किलो तक हो जाता है. कश्मीर में भेड़ के मीट की 50 फीसद डिमांड को देश के दूसरे राज्य पूरी कर रहे हैं.
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