
मंगलवार की सुबह चंडीगढ़ में हजारों लीटर प्योर दूध सड़कों पर बह रहा था. दूध बहाने वाले डेयरी फार्मर नारेबाजी कर रहे थे. या कह लें कि सिस्टम के खिलाफ हाथ खड़े कर रहे थे. विरोध था मिलावटी और सिंथेटिक कहे जाने वाले दूध के खिलाफ. अगर याद करें तो देश के केन्द्रीय पशुपालन और डेयरी मंत्री भी दूध माफिया के खिलाफ अपनी पीड़ा सुना चुके हैं. गुजरात में एक मंच से वो साफ-साफ कह चुके हैं कि जब में दिल्ली में होता हूं तो वहां पनीर नहीं खाता हूं. क्योंकि रात को पनीर खाने का मतलब है सुबह तक आपका पेट खराब होना तय है.
अब इससे आगे क्या ही कहा जाए, लेकिन डेयरी एक्सपर्ट की मानें तो ये वो ही दूध है जो देश के डेयरी सेक्टर की तरक्की में रोढ़ा बना हुआ है. इसी की वजह से हमारा पशुपालक दूध के सही दाम नहीं पा रहा है. इसका एक सही रास्ता यही है कि हमे पशुपालकों को उसके दूध की सही कीमत देनी होगी. तभी पशुपालक भी मजबूत होगा और मिलावटी दूध के काले कारोबार पर भी लगाम लगेगी.
अमूल के पूर्व एमडी और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी ने किसान तक को बताया कि सामान्य सी बात है कि बाजार में मिलावटी और उससे बने प्रोडक्ट सस्ते बिकते हैं. जबकि प्योर दूध के दाम ज्यादा होते हैं. इसलिए सस्ता दूध और सस्ते मिल्क प्रोडक्ट जल्दी बिकते हैं. पनीर और खोए का उदाहरण ही देख लिजिए, बाजार में इनके चार से पांच तरह के दाम मिल जाएंगे. जबकि, वहीं गांव से प्योर दूध लेकर आने वाले डेयरी फार्मर को अच्छा मुनाफा तो छोडि़ए उसके दूध की लागत मिलना मुश्किल हो जाता है.
डॉ. सोढ़ी ने बताया कि बीते तीन साल में ग्राहकों को बेचे जाने वाले दूध के दाम 2-2 रुपये कर के 6 रुपये बढ़े. जबकि इसी दौरान महंगाई बढ़ने की दर 5.5 फीसद रही. अब ऐसे में डेयरी फार्मर के हाथ में क्या ही मुनाफा आया होगा इसा अंदाजा लगाया जा सकता है. जबकि फीड के दाम बहुत ज्यादा बढ़ चुके हैं. डेयरी की लागत बढ़ चुकी है.
उदाहरण के तौर पर बाजार में टोंड मिल्क 60 रुपये लीटर बिक रहा है. जबकि पशुपालक से यही दूध 40 रुपये लीटर खरीदा जा रहा है. मतलब खरीद और बिक्री के बीच में 20 रुपये लीटर का अंतर है. अब अगर हमे पशुपालक को दूध के सही दाम देने हैं तो खरीद और बिक्री के बीच ये अंतर 15 रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए.
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