
वैसे तो मछली पालन साल के 12 महीने किया जा सकता है. लेकिन खासतौर पर दिसम्बर से लेकर फरवरी तक तालाब के पानी को कंट्रोल करना जरा मुश्किल हो जाता है. हालांकि मौजूदा तकनीक को देखते हुए ये कोई नामुमकिन काम भी नहीं है. फिर भी फिशरीज एक्सपर्ट इन तीन महीनों से बचने की सलाह देते हैं. इसी तरह से गर्मियों में भी एक्सपर्ट बहुत ज्यादा अलर्ट रहते हुए मछलियों की देखभाल करने की एडवाइजरी जारी करते हैं. क्योंकि 35 डिग्री से तापमान के तापमान पर मछलियां बीमार पड़ने लगती हैं.
कई बार तो मौत भी हो जाती है. खासतौर से मई-जून के दौरान खास देखभाल की हिदायत दी जाती है. इसी को देखते हुए गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (गडवासु) के मत्स्य कॉलेज के फिशरीज एक्सपर्ट का कहना है कि अगर मछली पालक कुछ टिप्स अपनाते हैं तो गर्मियों में भी मछलियों की भरपूर ग्रोथ होगी. वो खूब वजनदार भी बनेंगी.
गडवासु मत्स्य कॉलेज की डीन डॉ. मीरा डी. अंसल का कहना है कि मछली पालन में तालाब की गहराई बहुत ही मायने रखती है. क्योंकि जैसे ही गर्मियों में तापमान 35 डिग्री से ऊपर जाता है तो मछलियों की परेशानी बढ़ जाती है. तालाब का पानी गर्म होने लगता है. खासतौर से पानी की ऊपरी लेयर बहुत ज्यादा गर्म हो जाती है. ऐसे में पानी की गहराई कम से कम 5 से 6 फीट तक रखनी चाहिए. इससे होता ये है कि तालाब की ऊपरी लेयर गर्म हो जाती है, लेकिन नीचे ठंडक बनी रहती है.
डॉ. मीरा ने बताया कि गर्मियों के दौरान तालाब में ऑक्सीजन के लेवल पर बहुत पैनी नजर रखनी चाहिए. अगर यहां लापरवाही हो गई तो फिर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. खासतौर से सुबह के वक्त ऑक्सीजन लेवल ज्यादा गिरता है. इसलिए सूरज उगने से पहले तालाब में ताजा पानी मिला दें या फिर एरेटर (पंखे) चलाकर भी पानी के तापमान को सामान्य किया जा सकता है.
मछलियां जब तालाब की सतह पर आकर हांफती हुई दिखाई दें तो समझ जाएं कि उन्हें परेशानी हो रही है. और एक खास बात ये है कि जब तक पानी में ऑक्सीजन का लेवल सही न हो जाए तब तक के लिए तालाब में फीड और खाद डालना रोक दें. समय-समय पर तालाब के पानी को बदलना भी एक बेहतर उपाय है. और बदले हुए पानी को खेती में इस्तेमाल किया जा सकता है.
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