
बकरा हेल्दी हो. बकरे की हाइट अच्छी हो. दिखने में खूबसूरत भी हो. और सबसे बड़ी बात की वो चोटिल और बीमार न हो. अगर किसी बकरे में जब ये खूबियां होती हैं तो वो बकरीद के लिए लगने वाली बकरों की मंडी में हाथों-हाथ बिक जाता है. गोट एक्सपर्ट की मानें तो इस तरह की खूबियां जब राजस्थान के बकरों की खास तीन नस्ल में मिलती हैं तो उनके दाम और बढ़ जाते हैं. खास बात ये भी है कि राजस्थान के बकरों की हाइट अच्छी होती है. और बकरों की हाइट उन्हें और ज्यादा खूबसूरत बना देती है.
और कुर्बानी की तो शतों में शामिल है कि जिस पशु की कुर्बानी दी जा रही है वो खूबसूरत हो. लूला-लंगड़ा और काना न हो. इसलिए जैसे ही बकरा बाजार में राजस्थान के सोजत, सिरोही और जखराना नस्ल के बकरे पहुंचते हैं तो ग्राहकों की भीड़ उनके आसपास जमा हो जाती है. कुछ तो वाकई में खरीददार होते हैं और कुछ उन बकरों की खूबसूरती और उनकी चाल-ढाल देखते हैं.
बकरे की जखराना नस्ल अलवर, राजस्थान के एक गांव जखराना से निकली है. इसलिए इसका नाम भी जखराना पड़ गया है. असली जखराना की पहचान यह है कि यह पूरी तरह से काले रंग की होती है. लेकिन इसके कान और मुंह पर सफेद रंग के धब्बे होते हैं. इसके अलावा जखराना बकरी के पूरे शरीर पर किसी भी दूसरे रंग का कोई धब्बा नहीं मिलेगा. इस नस्ल के बकरे और बकरी एक साल में 25 से 30 किलो वजन तक पर आ जाते हैं.
सोजत नस्ल का बकरा राजस्थान के नागौर, पाली, जैसलमेर और जोधपुर में पाया जाता है. यह जमनापरी की तरह से सफेद रंग का बड़े आकार वाली नस्ल का बकरा है. इसे खासतौर पर मीट के लिए पाला जाता है. इस नस्ल का बकरा औसत 60 किलो वजन तक का होता है. वहीं बकरी दिनभर में एक लीटर तक दूध देती है. सोजत की नार्थ इंडिया समेत महाराष्ट्रा में भी खासी डिमांड रहती है.
सिरोही- ये ब्राउन और ब्लैक कलर में पाया जाता है. इस पर सफेद रंग के धब्बे होते हैं. इस नस्ल का बकरा दिखने में खासा ऊंचा होता है. ये नस्ल सिर्फ राजस्थान में ही पाई जाती है. ये बकरा बाजार में कम से कम 15 से 20 हजार रुपये में मिल जाता है.
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