
पिछले कुछ सालों में भारत ही नहीं दुनिया में प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ा है. इसके साथ ही जैविक दूध व पोल्ट्री के बाजार में इजाफा देखने को मिला है. प्राकृतिक तरीके से कैसे देसी मुर्गी पालन व सुअर पालन से एक अच्छी कमाई की जा सकती है. इसके बारे में कैमूर जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ पशु विशेषज्ञ डॉ राहुल कुमार कहते हैं कि अगर कोई किसान या युवा प्राकृतिक तरीके से पशु पालन या देसी मुर्गी का पालन करता है. तो कम खर्च में अधिक मुनाफा के साथ बेहतर उत्पादन कर सकते हैं. इसके साथ ही वैक्सीन, दवा आदि से काफी हद तक निजात मिल सकता है.
बता दें कि प्राकृतिक तरीके से खेती व पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. वहीं प्राकृतिक तरीके से मुर्गा पालन व सुअर पालन कोरियन तकनीक से भी भारत में किया जाता है. इस तकनीक में स्थानीय स्तर पर पाए जाने वाले जीवाणुओं की भूमिका खास रहती हैं.
पशु विशेषज्ञ व वैज्ञानिक डॉ राहुल कुमार बताते हैं कि प्राकृतिक तरीके से सुअर पालन या मुर्गा पालन में कुछ विशेष बातों का ध्यान दिया जाता है. इस विधि से मुर्गा व सुअर पालन करने वाले मकान के फर्श को पक्का नहीं किया जाता है. इसका बेड तैयार करने के दौरान सबसे पहले अच्छे जीवाणु को इकट्ठा किया जाता है. ये स्थानीय जीवाणु होते हैं. यानी जिस स्थान पर मुर्गा पालन या पशुपालन कर रहे हैं. उसी के आसपास के जीवाणुओं को इकठ्ठा करना सही होता है. वहीं जीवाणुओं को इकट्ठा करने के बाद पहली बार बिछाली बनाने के दौरान आईएमओ टू का फर्श पर छिड़काव कर देना चाहिए.
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इसके साथ फर्श पर छिड़काव करने वाले भूसा या कना के साथ इकट्ठा किए गए जीवाणुओं को मिला देना चाहिए, जिसका सात से आठ दिनों बाद फर्श पर छिड़काव कर देना चाहिए. अगर 100 स्क्वायर फीट का घर हैं. तो उसमें तीन से चार किलो लकड़ी का कोयला रख देना चाहिए. इसके साथ ही दो से तीन किलो दीमक की मिट्टी का भी छिड़काव कर देना चाहिए. बिछावन करने के दौरान यह सब करने से मुर्गी या सुअर पालन के दौरान बदबू नहीं आती है. इसके साथ ही मुर्गियों के पेशाब या बीट का जीवाणु क्रियान्वयन करके मुर्गियों को खाने लायक बना देते हैं. हर सप्ताह फर्श पर लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया (लैब) का घोल बनाकर पर स्प्रे करते रहना चाहिए. इससे पशुओं व मुर्गियों को बीमार होने का खतरा कम हो जाता है.
जीवाणुओं को इकठ्ठा करने के लिए सबसे पहले आधा पका हुआ चावल लेते हैं. और उसे एक लकड़ी के डब्बे में भरकर सफेद कागज या सूती कपड़े से ढक देतें हैं. इसके बाद डिब्बे को उस मिट्टी के पास जाकर रखना चाहिए,जहां कभी भी केमिकल दवा का प्रयोग नहीं किया गया है. इसके लिए बांसवाड़ या बरगद के पेड़ सबसे उपयुक्त स्थान है. और लकड़ी के डिब्बे को पुआल से ढक कर रख देना चाहिए. एक सप्ताह के बाद चावल सफेद रुई की तरह दिखने लगता है. इसके साथ ही जितनी मात्रा चावल की रहती है. उतनी ही मात्रा गुड़ लेकर दोनों को मिला देना चाहिए. इसके बाद एक शीशे के बर्तन में रखकर मुंह को सफेद कपड़ा या सूती कपड़ा से ढक देना चाहिए.
डॉ राहुल कुमार बताते हैं कि लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया (लैब) बनाने के लिए सबसे पहले धोए हुए चावल का पहला पानी लेते हैं. उसके बाद उसे शीशे के बर्तन में 24 घंटे के लिए रख देते हैं. अगले दिन जितनी चावल की पानी का मात्रा रहेगा. उतना ही कच्चा दूध मिलाकर 24 से 48 घंटे तक रख देना चाहिए. गर्मी में 24 घंटे में लैब तैयार होता है, जबकि ठंडी के मौसम में 48 घंटे तक समय लग जाता है. उसके बाद उसे छानकर स्प्रे मशीन की मदद से पूरे फर्श एवं आसपास स्प्रे कर देना चाहिए.
प्राकृतिक तरीके से मुर्गी पालन या पशुपालन करने में पशु या मुर्गी बीमार नहीं होती हैं. इसमें प्राकृतिक से जुड़े भोजन दिया जाता है. वहीं ठंडी हो या गर्मी वे आसानी से रहती हैं. आने वाले समय में अब लोग जैविक की ज्यादा मांग कर रहे हैं. इसके लिए मुर्गे-मुर्गियों को प्राकृतिक अवस्था में रखें और उन्हें वही दाना चारा खिलाएं जो बिना किसी पेस्टीसाइड या केमिकल्स के बिना प्राकृतिक तरीके से उगाया गया हो.
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