PM Modi France Visit: भारत के इस गांव में 40 दिन में बनती है ये एक साड़ी जिसे पहनेंगी फ्रांस की फर्स्ट लेडी, पढ़ें पूरी डिटेल

PM Modi France Visit: भारत के इस गांव में 40 दिन में बनती है ये एक साड़ी जिसे पहनेंगी फ्रांस की फर्स्ट लेडी, पढ़ें पूरी डिटेल

पीएम मोदी ने मैक्रॉन और प्रथम महिला ब्रिगिट मैक्रॉन और फ्रांस की नेशनल असेंबली के अध्यक्ष येल ब्रॉन-पिवेट को स्वदेशी शिल्प कौशल से तैयार और निर्मित उपहार भेंट किए

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PM Modi France Visit: भारत के इस गांव में 40 दिन में बनती है ये एक साड़ी जिसे पहनेंगी फ्रांस की फर्स्ट लेडी, पढ़ें पूरी डिटेलकहां से आती है पोचमपल्ली सिल्क

बीते दिनों भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस का दौरा किया. इस मौके पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रशासनिक अमले के साथ उनका जोरदार स्वागत किया. प्रधानमंत्री मोदी बैस्टिल डे के मौके पर बतौर विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए. फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और पीएम मोदी ने दोनों देशों के बीच के रिश्तों को मजबूत करने का काम किया. इन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को और अधिक मजबूती तब मिली जब पीएम मोदी ने भारत की कला और संस्कृति से फ्रांस को रूबरू कराया जिसमें पीएम मोदी ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को चंदन की लकड़ी से बना सितार भेंट किया.

वहीं फ्रांस की फर्स्ट लेडी राष्ट्रपति मैक्रों की पत्नी ब्रिगिट मैक्रों को भारतीय परिधान का प्रतीक तेलंगाना के पोचमपल्ली की मशहूर रेशम की साड़ी भेंट की. जिसमें कला और शिल्प कौशल की समृद्ध विरासत शामिल है. आइए जानते हैं कहां से आती है पोचमपल्ली सिल्क, जिसे पीएम मोदी ने फ्रांस की फर्स्ट लेडी को किया गिफ्ट.  

फर्स्ट लेडी को दी पोचमपल्ली साड़ी

पीएम मोदी ने फ्रांस की फर्स्ट लेडी और राष्ट्रपति मैक्रों की पत्नी ब्रिगिट मैक्रों को तेलंगाना के पोचमपल्ली शहर की मशहूर पोचमपल्ली साड़ी उपहार में दी, जो कि रेशम इकत की बनी हुई है. ये भारत की समृद्ध वस्त्र विरासत का प्रमाण है. जटिल डिजाइनों और जीवंत रंगों के लिए प्रसिद्ध पोचमपल्ली रेशम इकत साड़ी भारत की सुंदरता, शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत को समाहित करती है.

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कहां से आती है पोचमपल्ली रेशम

पोचमपल्ली तेलंगाना के नलगोंडा जिले में स्थित एक काफी लोकप्रिय जगह है. कुछ लोग इसे भारत की सिल्क सिटी के नाम से भी बुलाते हैं, क्योंकि यहां देश की बेहतरीन गुणवत्ता वाली रेशम की साड़ियां बनाई जाती हैं. दरअसल ये अपनी चिकनी और साफ-सुथरी डिजाइनों से एकदम अलग दिखती है. यहां की फैब्रिक एक ऐसी पारंपरिक बुनाई तकनीक है, जिसमें रंगे धागों को ऊपर-नीचे बुनकर पहाड़ जैसी आकृतियां बनाई जाती है. इसे पोचमपल्ली इकत भी कहा जाता है. इकत एक मलेशियाई, इंडोनेशियाई शब्द है जिसका अर्थ है "टाई एंड डाई". गौरतलब है कि ‘पोचमपल्ली इकत’ शैली को वर्ष 2004 में भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग भी मिल चुका है.

क्या है यहां की साड़ी की खासियत

पोचमपल्ली के लगभग 1500 से अधिक परिवारों वाले इस गांव में 10 हजार हरकरघे (साड़ी बनाने का सांचा) हैं. यहां की साड़ियां पूरे देश में भेजी जाती हैं.पोचमपल्ली की साड़ियों का देश में 200 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार है. यहां की 1 साड़ी को तैयार होने में 40 दिन लगते हैं.पोचमपल्ली अपनी हथकरघा से जुड़ी विरासत को संभालने के साथ व्यापारिक दृष्टि से भी आगे बढ़ रहा है. दरअसल यहां कि इकत साड़ियों की श्रीलंका, मलेशिया, दुबई, यूरोप और फ्रांस समेत कई देशों में काफी डिमांड है.वहीं आत्मनिर्भर भारत के तहत पोचमपल्ली की बुनाई शैलियों को पीएम नरेंद्र मोदी के लोकल फॉर वोकल के जरिए विशेष स्थान मिला है.

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