'Brand India' की साख पर चोट की साजिश या अपने ही उत्पाद में खोट? निशाने पर मूंगफली, आम, चावल और मसाले

'Brand India' की साख पर चोट की साजिश या अपने ही उत्पाद में खोट? निशाने पर मूंगफली, आम, चावल और मसाले

भारतीय कृषि निर्यात को हाल के वर्षों में कई झटके लगे हैं. जापान ने आम, चीन ने गैर-बासमती चावल और इंडोनेशिया ने मूंगफली पर कार्रवाई की, जबकि मसालों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे. ऐसे में चर्चा तेज है कि समस्या मानकों की है या भारतीय उत्पादों के खिलाफ कोई बड़ी रणनीति चल रही है.

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'Brand India' की साख पर चोट की साजिश या अपने ही उत्पाद में खोट? निशाने पर मूंगफली, आम, चावल और मसालेनिशाने पर भारतीय कृषि उत्‍पाद! (AI Image)

भारत लगातार अपनी खेती में उत्‍पादन के साथ-साथ कृषि निर्यात को भी तेजी से बढ़ावा दे रहा है. दुनिया के कई देशों में भारतीय चावल, आम, मूंगफली, मसाले और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ी है. लेकिन हाल के महीनों में भारतीय कृषि उत्पादों और वैल्यू एडेड फूड प्रोडक्ट्स की क्‍वालिटी को लेकर कई आयातक देशों ने सवाल उठाए हैं, जिससे 'ब्रांड इंडिया' की साख को नुकसान पहुंच रहा है. इस तरह की शिकायतें पहली बार नहीं है, लेकिन एक के बाद एक सामने आ रहे मामलों ने चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसी शिकायतें लगातार बढ़ती रहीं तो दूसरे खरीदार देशों में भी भारतीय उत्पादों को लेकर आशंका पैदा हो सकती है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं? क्या भारत के निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था में कहीं कमी है? या फिर वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धा के बीच भारतीय निर्यात पर दबाव बनाने की कोशिशें भी हो रही हैं? हाल के प्रमुख मामलों पर नजर डालें तो आम, गैर-बासमती चावल और मूंगफली जैसे उत्पादों को लेकर कई देशों ने सख्त कदम उठाए हैं. 

जापान ने फिर रोका भारतीय आम का आयात

भारत से जापान को भेजे जाने वाले आमों पर इस सीजन यानी 2026 में फिर रोक लग गई है. जापान ने लगभग 20 साल बाद भारतीय आमों के आयात को सस्‍पेंड किया है. इससे पहले 1986 में जापान ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगाया था, जिसे 2006 में हटाया गया था. यानी करीब दो दशक तक भारतीय आम जापानी बाजार से बाहर रहे. ताजा प्रतिबंध की वजह जापानी प्लांट क्वारंटीन अधिकारियों द्वारा भारत के वेपर हीट ट्रीटमेंट (VHT) केंद्रों में पाई गई खामियां बताई गई हैं. जापान हर साल आम निर्यात सीजन से पहले भारतीय ट्रीटमेंट सुविधाओं का निरीक्षण करता है. 

मार्च 2026 में हुए निरीक्षण के दौरान फ्यूमीगेशन और डिसइन्फेक्शन प्रक्रिया में कमियां मिलने की बात कही गई. इसके बाद 25 मार्च 2026 के बाद प्रमाणित खेपों को स्वीकार करना बंद कर दिया गया. इस फैसले से अल्फांसो, केसर, लंगड़ा, बंगनपल्ली, चौसा और मलिका जैसी प्रमुख किस्मों का निर्यात प्रभावित हुआ. जापान ने किसी कीट संक्रमण की पुष्टि नहीं की, लेकिन क्वारंटीन प्रक्रिया में कथित गैर-अनुपालन को आधार बनाया है.

चीन ने गैर-बासमती चावल की खेपें लौटाईं

मार्च 2026 में चीन ने भारत से भेजी गई गैर-बासमती चावल की कुछ खेपों को यह आरोप लगाते हुए अस्वीकार कर दिया कि उनमें जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म (GMO) के अंश पाए गए हैं. भारतीय निर्यातकों के अनुसार, ये खेपें रवाना होने से पहले चीन की ही सरकारी एजेंसी China Certification and Inspection Group (CCIC) से जांच और मंजूरी प्राप्त कर चुकी थीं. इसके बावजूद चीन ने बंदरगाह पर उन्हें वापस कर दिया.

इसके बाद भी मामला यहीं नहीं रुका. अप्रैल 2026 में चीन ने तीन भारतीय निर्यातक कंपनियों के आयात लाइसेंस भी निलंबित कर दिए. इनमें हरियाणा की एनएम फूडइम्पेक्स, नागपुर की श्रीराम फूड इंडस्ट्री और रायपुर की स्पोन एंटरप्राइजेज शामिल थीं. चीन का कहना था कि संबंधित चावल में GMO तत्व पाए गए हैं.

दूसरी तरफ भारतीय पक्ष का तर्क है कि भारत में व्यावसायिक स्तर पर GMO धान की खेती की अनुमति ही नहीं है, इसलिए आरोपों पर सवाल उठ रहे हैं.  इस विवाद ने भारतीय चावल निर्यातकों के बीच चिंता बढ़ा दी, क्योंकि चीन भारत के गैर-बासमती और ब्रोकन राइस का बड़ा खरीदार रहा है. कई व्यापारियों ने इसे सामान्य गुणवत्ता विवाद से आगे बढ़कर व्यापारिक दबाव की रणनीति होने की आशंका भी जताई है.

इंडोनेशिया की भारतीय मूंगफली पर रोक

इससे पहले इंडोनेशिया ने 2 सितंबर 2025 से भारत से मूंगफली (ग्राउंडनट) आयात को सस्‍पेंड कर दिया था. इंडोनेशियाई अधिकारियों ने आरोप लगाया कि भारतीय मूंगफली की खेपों में अफ्लाटॉक्सिन का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक पाया गया. अफ्लाटॉक्सिन एक विषैला फंगस जनित पदार्थ माना जाता है, जो खाद्य सुरक्षा के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय होता है.

भारतीय निर्यातकों ने इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि अगर किसी खेप में समस्या थी तो इसकी सूचना महीनों बाद क्यों दी गई और जांच प्रक्रिया भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार मानकों के अनुरूप नहीं थी. इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत हुई और जनवरी 2026 में इंडोनेशिया ने प्रतिबंध हटाने की घोषणा की, लेकिन साथ में कई सख्त शर्तें लागू कर दीं. इनमें अफ्लाटॉक्सिन मानक, ट्रेसबिलिटी, जियो-टैगिंग और अतिरिक्त प्रमाणन प्रक्रियाएं शामिल थीं. कई भारतीय निर्यातकों ने इन शर्तों को व्यावसायिक रूप से कठिन बताया है.

मसालों पर भी उठे क्‍वालिटी को लेकर सवाल

आम, चावल और मूंगफली के बाद भारतीय मसालों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद सामने आया. 2024 में हांगकांग ने एमडीएच (MDH) और एवरेस्‍ट (Everest) के कुछ मसाला उत्पादों की बिक्री रोक दी थी, जबकि सिंगापुर ने एवरेस्‍ट के एक मसाला उत्पाद को बाजार से वापस मंगाने का आदेश दिया था. इन मामलों में एथिलीन ऑक्साइड की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए गए थे. इसके बाद कई देशों ने भारतीय मसाला उत्पादों की अतिरिक्त जांच शुरू की. हालांकि, यह पूरे भारतीय मसाला निर्यात पर लगा प्रतिबंध नहीं था, बल्कि कुछ विशेष उत्पादों और ब्रांडों तक सीमित कार्रवाई थी.

इन मामलों ने भारतीय कृषि निर्यात व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्योंकि अगर क्‍वालिटी, ट्रेसबिलिटी, फाइटोसैनिटरी और खाद्य सुरक्षा मानकों को लेकर लगातार विवाद बढ़ते हैं तो इसका असर सिर्फ एक उत्पाद या एक बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय कृषि निर्यात की वैश्विक साख पर भी पड़ सकता है. वहीं, दूसरी तरफ भारत के कई निर्यातक संगठनों का दावा है कि कुछ मामलों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और गैर-शुल्क बाधाओं (Non-Tariff Barriers) का इस्तेमाल भी किया जा रहा है.

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