खरीफ कॉन्फ्रेंस में शिवराज सिंह चौहानराष्ट्रीय राजधानी के पूसा कैंपस में इस बार का राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन (खरीफ-2026) लच्छेदार भाषणों या फाइलों के लेन-देन का गवाह नहीं बना, बल्कि इसने देश की ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक दिग्गजों को एक नया 'शिवराज मॉडल' दिखाया है. मध्य प्रदेश की चौपालों से निकलकर दिल्ली में खेती-किसानी की कमान संभालने वाले शिवराज सिंह चौहान ने साफ कर दिया है कि वे केवल उद्घाटन करने वाले 'रिबन-कटिंग' मंत्री नहीं हैं. बैठक में नदारद रहने वाले राज्यों के मंत्रियों को सीधे उनके मुख्यमंत्रियों के जरिए 'कारण बताओ' नोटिस भेजने की तैयारी, भारतीय कृषि नीति में एक बड़े प्रशासनिक सर्जरी और राजनीतिक पावर शिफ्ट का संकेत है.
अमूमन केंद्रीय सम्मेलनों की एक तय पटकथा होती है. मंत्री आते हैं, भाषण देते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और रवाना हो जाते हैं. मगर शिवराज सिंह ने दोनों दिन कुर्सी संभाली, अफसरों-मंत्रियों के प्रेजेंटेशन देखे और 'फ्लाइट छूटने' जैसे क्लासिक बहानों को ऑन-रिकॉर्ड खारिज कर दिया. यह दिल्ली की वातानुकूलित राजनीति पर 'मैदान' से आए एक कद्दावर नेता का सीधा प्रहार है. उनका यह सख्त अंदाज केवल एक प्रशासनिक डांट नहीं, बल्कि राज्यों को यह संदेश है कि केंद्र अब कृषि को 'पार्ट-टाइम' जिम्मेदारी मानने की ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेगा.
सम्मेलन के दौरान चौहान ने साफ लहजे में कहा, "अच्छे सुझाव दीजिए, मौनी बाबा मत बनिए!" इस तेवर के राजनीतिक मायने गहरे हैं. जो मंत्री बैठक से नदारद रहे, उनके खिलाफ उनके ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों को शिकायती खत लिखने का फैसला एक रणनीतिक दांव है. इसके जरिए शिवराज ने उन राज्यों के प्रशासनिक मुखियाओं को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है, जो किसानों के नाम पर राजनीति तो करते हैं लेकिन नीतियों के समय अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं.
एक दिन पहले शिवराज सिंह चौहान द्वारा दिए गए वक्तव्य के बावजूद खरीफ सम्मेलन में केवल 20 राज्यों के मंत्रियों का पहुंचना यह दिखाता है कि कई राज्यों में कृषि जैसे गंभीर विषय को कितनी सुस्ती से लिया जा रहा है. शिवराज का यह रुख राज्यों को अपनी कैबिनेट में कृषि मंत्रियों के परफॉर्मेंस की समीक्षा करने पर मजबूर करेगा. मंत्री का यह गुस्सा केवल हाजिरी को लेकर नहीं था, बल्कि इसके पीछे खरीफ सीजन के लिए एक बेहद आक्रामक योजना को लेकर राज्यों द्वारा बरती जा रही लापरवाही भी शामिल है.
इस सम्मेलन से निकले तेवरों ने यह साबित कर दिया है कि शिवराज सिंह चौहान दिल्ली में मध्य प्रदेश जैसी ही धमक के साथ काम कर रहे हैं. किसानों के मुद्दों पर वे किसी भी राज्य (चाहे वह एनडीए शासित हो या विपक्ष) को ढिलाई बरतने का मौका नहीं देना चाहते. मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखने का उनका फैसला यह दिखाता है कि वे अपनी प्रशासनिक सीमाओं के भीतर रहकर भी राज्यों की राजनीति को प्रभावित करने और सीधे मुख्यमंत्रियों से संवाद साधने का पूरा रसूख रखते हैं. यह मोदी सरकार 3.0 में कृषि मंत्रालय के काम करने के बिल्कुल नए और आक्रामक तौर-तरीकों की शुरुआत है.
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