मिट्टी भी बचेगी, किसान भी होंगे समृद्ध; जानिए ‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ की सफलता

मिट्टी भी बचेगी, किसान भी होंगे समृद्ध; जानिए ‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ की सफलता

सद्गुरु की परिकल्पना से शुरू हुआ ‘सेव सॉयल-कावेरी कॉलिंग’ एक अनूठा किसान-आधारित पर्यावरण अभियान है. इसका उद्देश्य केवल कावेरी नदी को पुनर्जीवित करना ही नहीं, बल्कि किसानों को पेड़-आधारित खेती से जोड़कर उनकी आय बढ़ाना भी है.

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मिट्टी भी बचेगी, किसान भी होंगे समृद्ध; जानिए ‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ की सफलता‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ की सफलता

मिट्टी और नदियों को बचाने की दिशा में चलाया जा रहा ‘सेव सॉयल-कावेरी कॉलिंग’ अभियान लगातार नई मिसालें कायम कर रहा है. अब तक इस अभियान के तहत 13.4 करोड़ से अधिक पेड़ लगाए जा चुके हैं, जबकि 2.6 लाख किसानों ने पेड़-आधारित खेती अपनाकर अपनी खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया है. अभियान का लक्ष्य वर्ष 2026-27 में 1.2 करोड़ नए पौधे लगाने का है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आजीविका को भी मजबूती मिलेगी.

सद्गुरु की परिकल्पना से शुरू हुआ ‘सेव सॉयल-कावेरी कॉलिंग’ एक अनूठा किसान-आधारित पर्यावरण अभियान है. इसका उद्देश्य केवल कावेरी नदी को पुनर्जीवित करना ही नहीं, बल्कि किसानों को पेड़-आधारित खेती से जोड़कर उनकी आय बढ़ाना भी है. यह पहल खेती और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए हरित भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है, जहां पेड़ सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि किसानों की समृद्धि का आधार भी बन रहे हैं.

242 करोड़ पेड़ लगाने का बड़ा लक्ष्य

कभी घने जंगलों से पोषित होने वाली कावेरी नदी आज गंभीर संकट का सामना कर रही है. पिछले 70 वर्षों में इसके जल प्रवाह में 40 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है, जबकि नदी के आसपास का 87 प्रतिशत प्राकृतिक वृक्ष आवरण खत्म हो चुका है. इसी चुनौती से निपटने के लिए ‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ अभियान शुरू किया गया है, जिसका लक्ष्य किसानों की निजी कृषि भूमि पर 242 करोड़ पेड़ लगाना है.

यह अभियान किसानों को खेती के साथ पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है. इससे न केवल किसानों की आय बढ़ती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है और जमीन की पानी रोकने की क्षमता भी बढ़ती है. साथ ही, कावेरी नदी में सालभर पानी का प्रवाह बनाए रखने में मदद मिलती है, जिससे इस नदी पर निर्भर करीब 8.4 करोड़ लोगों को लाभ पहुंच सकता है.

पेड़-आधारित खेती से किसानों की बढ़ी आय

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालु ने कहा कि 13 करोड़ पेड़ लगाना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह 2.6 लाख किसानों के प्रयासों और उनकी सोच में आए बदलाव की कहानी है. इन किसानों ने पारंपरिक एकल फसल (मोनोकल्चर) खेती से निकलकर पेड़-आधारित खेती को अपनाया है. उन्होंने कहा कि यही बदलाव आने वाले वर्षों में तय करेगा कि कावेरी नदी में सालभर पानी बना रहेगा या नहीं. उनके अनुसार, जब सरकार की नीतियां और किसानों की भागीदारी साथ आती हैं, तो मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनाया जा सकता है, जल संसाधनों को मजबूत किया जा सकता है और ग्रामीण परिवारों की आजीविका को सुरक्षित किया जा सकता है.

कैसे बढ़ रहा है कावेरी कॉलिंग अभियान

आनंद एथिराजालु ने बताया कि ‘कावेरी कॉलिंग’ व्यापक ‘सेव सॉइल’ अभियान की तीन प्रमुख पहलों में से एक है. इसके अलावा दो अन्य पहलें भी चलाई जा रही हैं. इनमें ‘सेव सॉइल पुनरुत्पादक क्रांति’ (SS-RR) शामिल है, जिसके तहत किसानों को वैज्ञानिक और टिकाऊ खेती के तरीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है. वहीं ‘सेव सॉइल किसान अभियान’ किसानों को किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) से जोड़कर उनकी बाजार तक पहुंच और आर्थिक स्थिति मजबूत करने का काम करता है. उन्होंने कहा कि ये तीनों पहलें मिलकर किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और सामुदायिक सहयोग उपलब्ध कराती हैं. इसका उद्देश्य मिट्टी की सेहत सुधारना, किसानों की आय बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना है.

मिट्टी भी बचेगी, किसान भी होंगे समृद्ध

तमिलनाडु के 58 वर्षीय किसान वल्लुवन, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र (UN) से सम्मान मिल चुका है. उन्होंने बताया कि उन्हें वर्ष 2024 में खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की “किसान प्रतियोगिता: मिट्टी के स्वास्थ्य के रक्षक” में जो अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, उसमें ‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ अभियान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. वल्लुवन ने कहा कि उन्होंने खेत में कम जुताई, मल्चिंग और कवर क्रॉपिंग जैसी आधुनिक और टिकाऊ खेती तकनीकों को अपनाया. इससे उनकी मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हुई और उसमें जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ी. उन्होंने अपने केवल नारियल वाले खेत को एक बहु-फसली ‘फूड फॉरेस्ट’ में बदल दिया, जहां अब लकड़ी, काली मिर्च और कई फलदार फसलें भी उगाई जाती हैं.

उन्होंने बताया कि इन तरीकों को अपनाने से रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर उनकी निर्भरता कम हुई. साथ ही उनका खेत सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने में भी अधिक सक्षम बन गया. सबसे बड़ी बात यह रही कि इन बदलावों के कारण पिछले कुछ वर्षों में उनकी खेती से होने वाली आय करीब छह गुना बढ़ गई.

जानिए कैसे बदल रही है यह अनोखी पहल

‘कावेरी कॉलिंग’ अभियान किसानों तक अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे पहुंचाने पर विशेष ध्यान दे रहा है. इसके लिए तमिलनाडु के कुड्डालोर में एशिया की सबसे बड़ी एकल-स्थल नर्सरी स्थापित की गई है, जिसे पूरी तरह महिलाएं संचालित करती हैं. यहां हर साल करीब 85 लाख पौधे तैयार किए जाते हैं. इसके अलावा तिरुवन्नामलाई में स्थित दूसरी नर्सरी में भी हर वर्ष 15 लाख पौधे तैयार किए जाते हैं. आनंद एथिराजालु ने बताया कि ये नर्सरियां तमिलनाडु के 45 और कर्नाटक के 8 वितरण केंद्रों को पौधे उपलब्ध कराती हैं. किसानों के लिए 54 तरह के पौधे उपलब्ध हैं, जिनमें टीक, लाल चंदन, रोज़वुड और महोगनी जैसी 29 मूल्यवान लकड़ी की प्रजातियां भी शामिल हैं. किसानों को लकड़ी वाले पौधे सिर्फ 5 रुपये और फल-फूल वाले पौधे 10 रुपये की रियायती दर पर दिए जाते हैं.

किसानों की मदद के लिए अभियान ने 200 से अधिक फील्ड एग्जीक्यूटिव तैनात किए हैं. इन अधिकारियों ने केवल वर्ष 2025 में ही 26,500 से ज्यादा खेतों का दौरा किया और किसानों को पौधे लगाने से पहले और बाद तक मुफ्त सलाह दी. इसमें मिट्टी की जांच, पानी की उपलब्धता और क्षेत्र के अनुसार उपयुक्त पौधों के चयन की जानकारी शामिल है. अभियान किसानों तक पहुंच बनाने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPO), स्वयंसेवी संस्थाओं, कृषि विज्ञान केंद्रों, ग्राम पंचायतों और कृषि मेलों का भी सहारा ले रहा है. इसके अलावा 225 व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से 60 हजार से अधिक किसानों को लगातार जानकारी और सलाह दी जा रही है. एक विशेष हेल्पलाइन भी संचालित की जाती है, जो सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक किसानों की समस्याओं का समाधान करती है.

‘सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग’ की सफलता

कावेरी कॉलिंग ने वर्ष 2025 में तीन बड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें 14 हजार से अधिक किसानों ने भाग लिया. इन कार्यक्रमों में देश के प्रमुख कृषि और अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञों ने किसानों को पेड़-आधारित खेती की व्यावहारिक जानकारी दी. इसी तरह ‘सेव सॉयल पुनरुत्पादक क्रांति’ (SS-RR) पहल के तहत किसानों को वैज्ञानिक और टिकाऊ खेती के तरीके सिखाए जा रहे हैं. 31 मार्च 2026 तक इस पहल के तहत 532 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 40,311 किसानों को पुनरुत्पादक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया गया. साथ ही 54,982 किसानों को व्हाट्सएप समूहों से जोड़कर उन्हें लगातार तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है.

पिछले तीन वर्षों में 185 किसानों को विशेष इंटर्नशिप प्रशिक्षण भी दिया गया है. डिजिटल माध्यमों पर भी इस पहल की पहुंच तेजी से बढ़ी है. अभियान ने यूट्यूब पर 1,260 तकनीकी वीडियो साझा किए हैं, जिन्हें विभिन्न प्लेटफॉर्म पर मिलाकर 29.6 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है, जबकि इसके 11.83 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं. इससे हजारों किसान आधुनिक और टिकाऊ खेती की जानकारी आसानी से प्राप्त कर रहे हैं.

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