
भारत की रसोई किन देशों के भरोसे?सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, भारतीय रसोई में तेल का इस्तेमाल रोज होता है. लेकिन जिस तेल की बोतल हम बाजार से खरीदकर घर लाते हैं, उसकी कहानी सिर्फ खेत से शुरू होकर दुकान तक खत्म नहीं होती. इसके पीछे हजारों किलोमीटर लंबी एक ग्लोबल सप्लाई चेन काम करती है.
कहीं इंडोनेशिया के उष्णकटिबंधीय जंगलों के बीच पाम के पेड़ खड़े हैं, कहीं ब्राजील और अमेरिका में सोयाबीन के विशाल खेत हैं, तो कहीं रूस और यूक्रेन के खेतों में सूरजमुखी की फसल लहलहा रही है. कनाडा के प्रेयरी इलाके से निकलने वाला कैनोला भी दुनिया के खाद्य तेल बाजार का बड़ा हिस्सा है. यानी दुनिया का खाने का तेल कुछ खास देशों और कुछ खास फसलों के इर्द-गिर्द घूमता है. और भारत इस बाजार का बहुत बड़ा खरीदार है.
भारत अपनी जरूरत के करीब दो-तिहाई खाद्य तेल का इंतजाम आयात से करता है. 2025-26 में घरेलू उत्पादन करीब 9.6 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि करीब 16.7 मिलियन टन तेल आयात करने की जरूरत बताई गई है. यानी भारत की रसोई का एक बड़ा हिस्सा विदेशी खेतों और विदेशी सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि दुनिया के किसी बड़े तेल उत्पादक देश में मौसम खराब हो, युद्ध छिड़े, सरकार निर्यात पर रोक लगाए या ईंधन की कीमत बढ़ जाए, तो उसका असर भारत की रसोई तक पहुंच सकता है.
दुनिया में खाने के तेल की कई किस्में हैं, लेकिन वैश्विक बाजार में चार तेल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं-
USDA के 2025-26/2026-27 आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में पाम, सोयाबीन, रेपसीड और सूरजमुखी तेल का उत्पादन मिलाकर वैश्विक वनस्पति तेल बाजार का बहुत बड़ा हिस्सा बनता है. पाम ऑयल का उत्पादन करीब 81 मिलियन टन, सोयाबीन तेल करीब 72 मिलियन टन, रेपसीड तेल करीब 36 मिलियन टन और सूरजमुखी तेल करीब 21 मिलियन टन के आसपास है. अब एक-एक करके समझते हैं कि दुनिया में किस तेल की चाबी किस देश के हाथ में है.
अगर दुनिया के खाने के तेल के बाजार में किसी एक तेल का सबसे बड़ा साम्राज्य है, तो वह पाम ऑयल है और पाम ऑयल की सबसे बड़ी ताकत है- इंडोनेशिया.
USDA के जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में इंडोनेशिया का पाम ऑयल उत्पादन करीब 47.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है. मलेशिया करीब 20.2 मिलियन टन के साथ दूसरे बड़े उत्पादक देशों में है. यानी दोनों देशों का उत्पादन मिलाकर करीब 68 मिलियन टन बैठता है. लेकिन सिर्फ उत्पादन ही कहानी नहीं है. निर्यात में भी इन दोनों का दबदबा है.
2025-26 में इंडोनेशिया से करीब 24.15 मिलियन टन और मलेशिया से करीब 15.8 मिलियन टन पाम ऑयल निर्यात का अनुमान है. दोनों मिलकर वैश्विक पाम ऑयल निर्यात का विशाल हिस्सा नियंत्रित करते हैं.

इसलिए अगर इंडोनेशिया या मलेशिया में पाम ऑयल की सप्लाई में बड़ी समस्या आती है, तो सिर्फ इन देशों के बाजार में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के वनस्पति तेल बाजार में हलचल हो सकती है.
भारत पाम ऑयल का बहुत बड़ा खरीदार है. 2025-26 में भारत के कुल पाम ऑयल आयात का बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है. फरवरी 2026 में IVPA ने अनुमान लगाया था कि भारत 2025-26 में करीब 8-8.5 मिलियन टन पाम ऑयल आयात कर सकता है. इतना ही नहीं यह तेल सिर्फ घर की कड़ाही तक सीमित नहीं है. इसका इस्तेमाल फ्राइंग, नमकीन, बिस्कुट, बेकरी, पैकेज्ड फूड और कई प्रोसेस्ड फूड उत्पादों में होता है.
सोयाबीन की बात आते ही तीन नाम सबसे पहले सामने आते हैं- ब्राजील, अमेरिका और अर्जेंटीना. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है.
सोयाबीन उत्पादन में ब्राजील और अमेरिका बहुत बड़े खिलाड़ी हैं, जबकि सोयाबीन तेल के निर्यात में अर्जेंटीना की खास ताकत है.
USDA के जून 2026 आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में सोयाबीन तेल का उत्पादन लगभग:
2025-26 में अर्जेंटीना से करीब 6.45 मिलियन टन सोयाबीन तेल के निर्यात का अनुमान है, जबकि ब्राजील करीब 1.6 मिलियन टन के आसपास है. अमेरिका का निर्यात इससे काफी कम है, क्योंकि वहां सोयाबीन तेल का बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर बायोफ्यूल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है.
ब्राजील और अमेरिका सोयाबीन के बड़े उत्पादक हैं, लेकिन अर्जेंटीना सोयाबीन तेल के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण निर्यातक है. इसकी एक बड़ी वजह अर्जेंटीना की विशाल सोयाबीन क्रशिंग इंडस्ट्री है. वहां सोयाबीन को प्रोसेस करके तेल और सोयामील दोनों बनाए जाते हैं.

USDA ने 2026-27 में भी अर्जेंटीना को सोयाबीन तेल के सबसे बड़े निर्यातकों में सबसे आगे रखा है.
अमेरिका का असर केवल इस बात से नहीं तय होता कि वह भारत को कितना तेल बेचता है. अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादकों में है. इसलिए अमेरिका की फसल, उसकी क्रशिंग क्षमता और उसकी घरेलू मांग पूरी दुनिया की कीमतों को प्रभावित करती है. खासकर अब बायोफ्यूल बाजार सोयाबीन तेल की तस्वीर बदल रहा है. अमेरिका में सोयाबीन तेल का बड़ा हिस्सा रिन्यूएबल डीजल और दूसरे बायोफ्यूल में इस्तेमाल हो रहा है. USDA के अनुसार अमेरिकी बायोफ्यूल सेक्टर की बढ़ती मांग ने घरेलू सोयाबीन तेल की खपत बढ़ाई है और इससे निर्यात के लिए उपलब्ध तेल पर दबाव पड़ा है. यानी अमेरिका में अगर बायोफ्यूल की मांग बढ़ती है, तो वहां से खाद्य तेल के लिए उपलब्ध सोयाबीन तेल कम हो सकता है. इसके बाद दुनिया के खरीदार अर्जेंटीना या ब्राजील की ओर ज्यादा जा सकते हैं. और जब मांग अचानक किसी एक देश की ओर बढ़ती है, तो कीमत पर भी असर पड़ता है.
सनफ्लावर ऑयल की दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण जगह ब्लैक सी क्षेत्र की है. रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के सबसे बड़े सूरजमुखी उत्पादक और निर्यातक क्षेत्रों में आते हैं. USDA के जून 2026 आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में रूस का सूरजमुखी तेल उत्पादन करीब 6.90 मिलियन टन, जबकि यूक्रेन का करीब 4.73 मिलियन टन रहने का अनुमान है. निर्यात में भी दोनों बेहद महत्वपूर्ण हैं.
2025-26 में रूस से करीब 4.2 मिलियन टन और यूक्रेन से करीब 4.74 मिलियन टन सूरजमुखी तेल निर्यात का अनुमान है. दोनों मिलकर करीब 9 मिलियन टन का निर्यात करते हैं.

2025-26 में भारत की घरेलू खाद्य तेल उत्पादन क्षमता करीब 9.6 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि मांग पूरी करने के लिए करीब 16.7 मिलियन टन आयात की जरूरत बताई गई है. यानी घरेलू उत्पादन कुल जरूरत का लगभग 40% ही पूरा कर पाता है.
| तेल | भारत की प्रमुख निर्भरता |
| पाम ऑयल | इंडोनेशिया, मलेशिया |
| सोयाबीन तेल | अर्जेंटीना, ब्राजील |
| सनफ्लावर तेल | रूस, यूक्रेन, अर्जेंटीना |
| रेपसीड/कैनोला तेल | सीमित आयात; घरेलू सरसों/रेपसीड उत्पादन महत्वपूर्ण |
IVPA के 2025-26 अनुमान के अनुसार भारत करीब 8-8.5 मिलियन टन पाम ऑयल, 5-5.5 मिलियन टन सोयाबीन तेल और 2.8-3 मिलियन टन सनफ्लावर तेल आयात कर सकता है.
नवंबर 2025 से जून 2026 के आठ महीनों के SEA आंकड़ों के अनुसार भारत ने करीब 103.88 लाख टन खाद्य तेल आयात किया. इस अवधि में सबसे ज्यादा आयात अर्जेंटीना से हुआ.
| देश | आयात (लाख टन) | कुल में लगभग हिस्सा |
| अर्जेंटीना | 23.39 | 22.5% |
| मलेशिया | 19.81 | 19.1% |
| इंडोनेशिया | 19.04 | 18.3% |
| रूस | 10.37 | 10.0% |
| ब्राजील | 7.08 | 6.8% |
| थाईलैंड | 6.75 | 6.5% |
| यूक्रेन | 3.60 | 3.5% |
| अन्य | 13.84 | 13.3% |
आंकड़ों से साफ है कि भारत किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं है, लेकिन कुछ खास देशों और खास तेलों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है.
इसमें एक दिलचस्प बदलाव भी दिखा है. अर्जेंटीना अब भारत के कुल खाद्य तेल आयात में सबसे बड़ा सप्लायर बन गया है, मुख्य रूप से उसके सोयाबीन तेल और सनफ्लावर तेल के कारण.
जुलाई 2026 में भारत का खाद्य तेल आयात अचानक बढ़कर करीब 14.9 लाख टन पहुंच गया, जो 10 महीने का सबसे ऊंचा स्तर था.
पाम ऑयल का आयात जून के मुकाबले करीब 50% और सोयाबीन तेल का करीब 32% बढ़ा.
इससे एक बात साफ है- जब घरेलू सप्लाई कम होती है और त्योहारी मांग बढ़ती है, तो भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर और ज्यादा देखना पड़ता है.
यह खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय, आयात बिल, रुपये की कीमत और वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ा मामला है. दुनिया के तेल बाजार में फिलहाल कुछ देशों का दबदबा है- पाम के लिए इंडोनेशिया-मलेशिया, सोयाबीन तेल के लिए अर्जेंटीना-ब्राजील-अमेरिका, सनफ्लावर के लिए रूस-यूक्रेन और कैनोला/रेपसीड के लिए कनाडा-EU. इसलिए भारत के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाया जाए, किसानों को बेहतर उत्पादन और बाजार मिले, आयात के स्रोतों को फैलाया जाए और पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाए. क्योंकि दुनिया में तेल की जंग कहीं और लड़ी जाती है, लेकिन उसका असर आखिरकार भारत की रसोई की कड़ाही तक पहुंचता है.
ये भी पढ़ें:
Ban Indian Product: भारत से गए गेहूं-चावल, आम, मसाले और झींगा-अंडे को दूसरे देशों की ‘NO’
इथेनॉल की बढ़ती मांग भी नहीं बचा सकी मक्का? एक साल में 6.59 लाख हेक्टेयर घटी बुवाई
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today