'उंझा जीरा' के GI टैग पर उठे सवालगुजरात के उंझा से जुड़े प्रसिद्ध 'उंझा जीरा' (Unjha Jeera) के भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं. राजस्थान के कृषि क्षेत्र से जुड़े एक जानकार ने भारतीय भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री (Geographical Indications Registry), चेन्नई को पत्र लिखकर इस GI पंजीकरण की वैज्ञानिक और कानूनी जांच करने की मांग की है. उनका कहना है कि किसी उत्पाद को GI टैग तभी मिलना चाहिए, जब उसकी खास पहचान और गुणवत्ता किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पैदा होने से जुड़ी हो.
जानकारी के मुताबिक, 'उंझा जीरा' को GI नंबर 1289 के तहत रजिस्टर किया गया है. यह पंजीकरण कृषि उपज बाजार समिति (APMC), उंझा के नाम से किया गया है. यह उत्पाद मसालों की श्रेणी यानी क्लास 30 (Spices) के तहत दर्ज है. GI रजिस्ट्री के प्रमाण पत्र के अनुसार, इसका पंजीकरण 14 जून 2004 को हुआ था और प्रमाण पत्र बाद में 28 मार्च 2026 को जारी किया गया.
GI टैग किसी भी उत्पाद की खास पहचान को कानूनी सुरक्षा देता है. इसके तहत किसी खास क्षेत्र में बनने वाले उत्पाद की गुणवत्ता, प्रसिद्धि और विशेषताओं को उस क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है.
पत्र में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया गया है कि क्या उंझा की व्यापारिक पहचान ही 'उंझा जीरा' को GI टैग देने के लिए पर्याप्त आधार है. जानकारों का कहना है कि उंझा देश के सबसे बड़े जीरा व्यापार केंद्रों में से एक है, जहां बड़ी मात्रा में जीरे की खरीद, बिक्री, छंटाई और पैकिंग होती है.
हालांकि, उनका तर्क है कि GI टैग किसी बाजार या व्यापारिक केंद्र की प्रसिद्धि के आधार पर नहीं दिया जाता, बल्कि यह उस उत्पाद की उन विशेषताओं से जुड़ा होता है, जो किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादन के कारण आती हैं.
पत्र में यह भी कहा गया है कि उंझा मंडी में आने वाला जीरा केवल गुजरात के किसी एक क्षेत्र से नहीं आता, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा राजस्थान के कई जिलों और देश के अन्य क्षेत्रों से भी पहुंचता है.
राजस्थान भारत में जीरे का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है. यहां के कई जिलों में बड़े पैमाने पर जीरे की खेती होती है. ऐसे में जानकारों ने सवाल उठाया है कि अगर उंझा की पहचान मुख्य रूप से जीरे की खरीद और व्यापार केंद्र के रूप में बनी है, तो क्या इसे वहां उत्पादित जीरे की विशेष गुणवत्ता के रूप में माना जा सकता है?
विशेषज्ञ ने अपने पत्र में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 का हवाला देते हुए कहा है कि GI टैग के लिए यह साबित होना जरूरी है कि किसी उत्पाद की गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषता उस निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी हुई है.
उनका कहना है कि GI टैग का उद्देश्य किसी क्षेत्र विशेष में पैदा होने वाले उत्पादों की पहचान और किसानों को लाभ पहुंचाना है, लेकिन केवल किसी व्यापारिक केंद्र की लोकप्रियता के आधार पर किसी उत्पाद को GI सुरक्षा देना नियमों की मूल भावना पर सवाल खड़े कर सकता है.
जीरे की खेती और व्यापार से जुड़े किसानों और कारोबारियों के लिए GI टैग काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. किसी उत्पाद को GI पहचान मिलने से उसकी बाजार में अलग पहचान बनती है और कई बार बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ती है.
हालांकि, इस मामले में उठे सवालों के बाद अब यह चर्चा तेज हो गई है कि GI टैग देने की प्रक्रिया में उत्पाद की वास्तविक भौगोलिक पहचान और उत्पादन क्षेत्र की भूमिका को और स्पष्ट तरीके से देखा जाना चाहिए.
अब सभी की नजरें भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री पर हैं कि इस मामले में आगे क्या कदम उठाया जाता है. यदि समीक्षा होती है, तो इसमें यह जांच की जा सकती है कि 'उंझा जीरा' की पहचान वास्तव में उंझा क्षेत्र में उत्पादित जीरे की विशेषताओं से जुड़ी है या फिर यह केवल एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में बनी प्रतिष्ठा का परिणाम है.
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