भारत में प्राकृतिक खेती का बढ़ता चलनभारत जैसे देश में मिट्टी सिर्फ खेत की माटी नहीं, बल्कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था और जिंदगी की सबसे मजबूत नींव है. देश की 46 प्रतिशत से अधिक आबादी अपनी रोजी-रोटी और रोजगार के लिए खेती और इससे जुड़े कामकाज पर ही निर्भर करती है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत का कुल इलाका करीब 306.65 मिलियन हेक्टेयर है, जिसमें से लगभग 59 प्रतिशत हिस्सा खेती-बाड़ी के लिए इस्तेमाल होता है. यह विशाल भूभाग हमारी बढ़ती हुई आबादी के लिए अनाज और खुराक की जरूरत को पूरा करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है. अगर जमीन की सेहत अच्छी होगी, तो फसलों की पैदावार में इजाफा होगा और किसानों को बेवजह महंगे खादों या रसायनों पर ज्यादा पैसा नहीं खर्च करना पड़ेगा.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार टिकाऊ विकास लक्ष्यों, खासकर भुखमरी खत्म करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मिट्टी का संरक्षण एक बेहद जरूरी कदम है. आज भारत सरकार इस अमूल्य प्राकृतिक संपदा की हिफाजत करने, जमीनी स्तर पर सुधार लाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर कई दूरदर्शी राष्ट्रीय रणनीतियों पर तेजी से काम कर रही है.
खेती में वैज्ञानिक सोच और सही संतुलन लाने के लिए सरकार 'मृदा स्वास्थ्य कार्ड' (Soil Health Card) योजना को एक बड़ी कामयाबी के रूप में पेश करती है. सरकारी दावों और जारी आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के तहत अब तक देश भर के किसानों को 25.89 करोड़ से ज्यादा कार्ड बांटे जा चुके हैं. सरकार का कहना है कि इस कार्ड की मदद से किसानों को यह समझने में आसानी होती है कि उनके खेत की मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है और किस खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. प्रशासन का दावा है कि जहां पहले किसान बिना जांच-परख के खेतों में बेहिसाब यूरिया और रसायन कीटनाशक डालते थे, वहीं अब संतुलित पोषण प्रबंधन को बढ़ावा मिल रहा है. हालांकि, इन दावों के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी स्तर पर किसानों को इस कार्ड की रिपोर्ट के आधार पर सही सलाह और खादों की उपलब्धता सुनिश्चित करना अभी भी एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है.
रासायनिक खादों के बुरे असर से खेतों को बचाने के लिए केंद्र सरकार 'राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन' (NMNF) को पूरे देश में फैलाने की बात कहती है. आधिकारिक रिपोर्टों के मुताबिक, इस मिशन का दायरा 18,786 क्लस्टरों तक पहुंच चुका है, जिसके तहत लगभग 8.80 लाख हेक्टेयर जमीन को प्राकृतिक खेती से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है. इसके साथ ही 'खेत बचाओ अभियान' जैसी जमीनी मुहिमों के जरिए सरकार का दावा है कि आम लोगों और किसानों के बीच जागरुकता बढ़ रही है. इसमें जन-भागीदारी को सबसे बड़ी ताकत बनाया गया है ताकि हर गांव और किसान मिट्टी के गिरते स्तर को लेकर जागरूक हो सके. कुदरती खेती अपनाने से न सिर्फ मिट्टी के भीतर मौजूद मित्र कीट और बैक्टीरिया जीवित रहते हैं, बल्कि पानी की खपत भी कम होती है और लागत घटती है. जब किसान जमीन को मां मानकर उसकी हिफाजत करेंगे, तभी हमें जहरीले रसायनों से मुक्त, शुद्ध और सेहतमंद खुराक मिल पाएगी.
आधुनिक दौर में खेती को तकनीक से जोड़ने के लिए सरकार बड़े पैमाने पर डिजिटल ढांचे को बढ़ावा दे रही है. मंत्रालय के अनुसार, आज भारत की कृषि प्रणाली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और जिओस्पेशियल मैपिंग जैसी एडवांस तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. सरकार का मानना है कि इन डिजिटल जरियों से जमीन की नमी, मिट्टी के प्रकार और फसलों की सेहत का बहुत सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है. अब किसानों को उनके मोबाइल पर ही मौसम और मिट्टी के हिसाब से सलाह देने का तंत्र विकसित किया जा रहा है ताकि वे जान सकें कि कब सिंचाई करनी है और कब देखभाल की जरूरत है. यह आधुनिक ढांचा खेती में जोखिम को कम करता है और पैदावार की क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है. डिजिटल मैपिंग के जरिए सरकार और वैज्ञानिकों को भी यह समझने में आसानी होती है कि किस इलाके की जमीन को किस तरह के सुधार की जरूरत है.
भारत की भौगोलिक बनावट और मौसम की विविधता ही हमारी असली कृषि शक्ति है. हमारे देश में अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग किस्म की मिट्टी पाई जाती है, जो अलग-अलग फसलों के लिए मुफीद होती है. उदाहरण के तौर पर, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानों से लेकर नदियों के डेल्टा तक फैली जलोढ़ यानी एलुवियल मिट्टी बेहद उपजाऊ होती है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह अनाज उत्पादन का मुख्य जरिया है. इसी तरह महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश की काली मिट्टी कपास और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए जानी जाती है. मिट्टी की यह रंगत और विविधता ही भारत को दुनिया में एक बहुआयामी कृषि प्रधान देश बनाती है. जब हम अपनी मिट्टी की खासियतों को समझकर उसी हिसाब से फसलें चुनते हैं, तो कम संसाधन में भी बेहतरीन उपज हासिल होती है और जमीन पर जरूरत से ज्यादा दबाव भी नहीं पड़ता.
संक्षेप में कहें तो स्वस्थ मृदा ही समृद्ध भारत की असली गारंटी है. अगर हमारी जमीन उपजाऊ और सुरक्षित रहेगी, तो देश का किसान खुशहाल होगा और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अनाज का संकट कभी खड़ा नहीं होगा. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में टिकाऊ कृषि पद्धतियों, वैज्ञानिक देखभाल और कुदरती तौर-तरीकों का यह मेल बेहद जरूरी हो चुका है. सरकार की योजनाओं, नई तकनीकों और किसानों की मेहनत ने मिलकर इस दिशा में एक ठोस नींव रख दी है. अब जिम्मेदारी हम सबकी है कि हम अपनी माटी का सम्मान करें, रसायनों के बेवजह इस्तेमाल से बचें और 'खेत बचाओ' के इस संकल्प को हर घर तक पहुंचाएं. समृद्ध खेत और स्वस्थ मिट्टी ही एक मजबूत, आत्मनिर्भर और तरक्कीपसंद भारत के सुनहरे कल का निर्माण करेंगे.
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