आलू की खास वैरायटीदेश के आलू किसानों के लिए अच्छी खबर है. दरअसल, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने 'कुफरी रूबी' नाम की नई आलू किस्म विकसित की है. यह किस्म खासतौर पर बेबी पोटैटो (छोटे आकार के आलू) के उत्पादन के लिए तैयार की गई है. इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत ये है कि सिर्फ 90 दिनों में तैयार होने वाली फसल में लगभग 60 प्रतिशत बेबी पोटैटो प्राप्त हो जाते हैं. इसलिए यह किस्म उन किसानों के लिए काफी फायदेमंद मानी जा रही है, जो प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, होटल, रेस्टोरेंट और सुपरमार्केट की बढ़ती मांग को पूरा करना चाहते हैं.
कुफरी रूबी एक मध्यम अवधि वाली आलू किस्म है. इसकी फसल लगभग 90 दिनों में तैयार हो जाती है. कम समय में तैयार होने के कारण किसान एक ही मौसम में बेहतर उत्पादन लेकर अगली फसल की तैयारी भी जल्दी कर सकते हैं. इस किस्म के आलू का छिलका आकर्षक लाल रंग का होता है, जबकि अंदर का गूदा (फ्लेश) पीले रंग का होता है. इसकी आकर्षक बनावट और रंग के कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग रहने की उम्मीद है. वहीं, इस किस्म की औसत उपज 23 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है. अगर किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें और समय पर सिंचाई, उर्वरक और रोग-कीट प्रबंधन अपनाएं, तो अच्छी क्वालिटी के साथ बेहतर उत्पादन ले सकते है.
कुफरी रूबी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 90 दिनों में तैयार होने वाली फसल का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा बेबी पोटैटो होता है. छोटे आकार के आलू की मांग आजकल फूड प्रोसेसिंग कंपनियों, चिप्स, फ्रेंच फ्राइज, होटल, कैफे और पैकेज्ड फूड सेक्टर में लगातार बढ़ रही है. ऐसे में किसानों को इस किस्म से बेहतर बाजार और अच्छा दाम मिलने की संभावना है. वहीं, कुफरी रूबी में क्रैकिंग (आलू का फटना) और होलो हार्ट (आलू के अंदर खाली जगह बन जाना) जैसी समस्याएं बहुत कम देखने को मिलती हैं, इससे किसानों को बेहतर क्वालिटी की उपज मिल सकती है.
ICAR-CPRI के अनुसार, कुफरी रूबी किस्म भारत के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों जैसे, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, और गुजरात जैसे क्षेत्रों में खेती के लिए बेस्ट है. इसलिए उत्तर भारत से लेकर अन्य आलू उत्पादक इलाकों के किसान भी इस किस्म को अपनाकर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं.
कुफरी रूबी आलू की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी बुवाई उत्तर भारत में अक्टूबर–नवंबर के दौरान की जाती है. किसान केवल प्रमाणित और रोगमुक्त बीज कंद का उपयोग करें और कतार से कतार 60 सेमी और पौधे से पौधे 20–25 सेमी की दूरी रखें. खेत में गोबर की सड़ी खाद के साथ संतुलित मात्रा में उर्वरक दें और समय-समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण करें.
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