
इन दिनों सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'द इंडिया स्टोरी' पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है. 24 जुलाई को रिलीज हुई यह फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती में बढ़ते रासायनिक कीटनाशकों, खाद्य पदार्थों में मिलावट, दूध की शुद्धता और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के संभावित कारणों पर व्यापक बहस छेड़ रही है.
फिल्म में पंजाब की चर्चित 'कैंसर ट्रेन' से लेकर केरल में कीटनाशकों से जुड़े विवादों जैसी वास्तविक घटनाओं का उल्लेख किया गया है.कहानी यह सवाल उठाती है कि क्या अधिक उत्पादन की दौड़ में हमारी खेती और भोजन दोनों जहरीले होते जा रहे हैं.
फिल्म का सबसे प्रमुख विषय खेती में बेतहाशा कीटनाशकों का उपयोग है. इसमें दिखाया गया है कि अधिक पैदावार और चमकदार फल-सब्जियां तैयार करने के लिए खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. फिल्म यह भी संकेत देती है कि ऐसे रसायनों के लगातार संपर्क का संबंध गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं, विशेषकर कैंसर जैसी बीमारियों से जोड़ा जाता रहा है.
हालांकि फिल्म इन मुद्दों को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, लेकिन यह समाज में इस विषय पर गंभीर चर्चा की जरूरत को सामने लाती है.
फिल्म में दूध में मिलावट के मुद्दे को भी प्रमुखता से दिखाया गया है.इसमें बताया गया है कि देश में दूध की बढ़ती मांग और वास्तविक उत्पादन के बीच मौजूद अंतर का फायदा उठाकर कुछ लोग मिलावटी दूध, खोवा, पनीर और अन्य डेयरी उत्पाद बाजार में पहुंचा रहे हैं.
फिल्म में जेल में बंद मिलावट के आरोपियों से बातचीत और चिकित्सकों की राय के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि मिलावटी खाद्य पदार्थ लंबे समय में मानव स्वास्थ्य पर कितना गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं.
फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि हरित क्रांति के बाद देश में खाद्यान्न उत्पादन तो कई गुना बढ़ा, लेकिन इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग भी तेजी से बढ़ा. आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है, लेकिन खेती में रसायनों पर निर्भरता भी लगातार बढ़ रही है.
मध्य प्रदेश के हरदा जिले के किसान रामनिवास का कहना है कि किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती फसल को कीट और बीमारियों से बचाना होती है.इसलिए उन्हें मजबूरी में कीटनाशकों का इस्तेमाल करना पड़ता है.
उनका कहना है कि अधिकांश किसानों को इन रसायनों के स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों की पूरी जानकारी नहीं होती.न तो कंपनियां उत्पादों पर पर्याप्त चेतावनी देती हैं और न ही एजेंट या दुकानदार किसानों को इसके संभावित खतरों के बारे में विस्तार से बताते हैं. कई बार लागत कम करने के लिए किसान सस्ते और अधिक जहरीले रसायनों का भी उपयोग कर लेते हैं.
मध्य प्रदेश के किसान नेता गजेंद्र जाट का कहना है कि केंद्र सरकार ने हाल ही में पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे खतरनाक रसायन पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन इसके बावजूद यह कई जगह चोरी-छिपे किसानों को बेचा जा रहा है.उनके अनुसार यह रसायन सस्ता और प्रभावी होने के कारण कुछ किसान इसे खरीद लेते हैं, जबकि इसका इंसानों और पशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है. उन्होंने प्रतिबंधित रसायनों की बिक्री पर प्रभावी निगरानी की मांग की.
फिल्म में यह सवाल भी उठाया गया है कि कीटनाशकों को बाजार में लाने से पहले उनके स्वास्थ्य और पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभावों का अधिक कठोर परीक्षण होना चाहिए.साथ ही यह भी दिखाया गया है कि यदि निगरानी और नियंत्रण मजबूत नहीं होंगे तो खतरनाक रसायनों के दुष्प्रभावों को रोकना मुश्किल होगा.
'द इंडिया स्टोरी' ने खेती, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि किसानों, उपभोक्ताओं, वैज्ञानिकों और उद्योग जगत सभी की जिम्मेदारी है कि सुरक्षित खेती और सुरक्षित भोजन की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं.
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