शादी नहीं, 150 दुर्लभ बीजों को बचाना चुना; मिट्टी के घर में बनाया अनोखा ‘मिलेट बैंक

शादी नहीं, 150 दुर्लभ बीजों को बचाना चुना; मिट्टी के घर में बनाया अनोखा ‘मिलेट बैंक

मध्य प्रदेश की डिंडोरी जिले की लहरी बाई का नाम मिलेट क्वीन के तौर पर लिया जाता है .उन्होंने अब तक 150 से ज्यादा देसी किस्म के विलुप्त हो रहे मिलेट के बीज का संरक्षण किया है. उन्होंने पूरा जीवन संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया.

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शादी नहीं, 150 दुर्लभ बीजों को बचाना चुना; मिट्टी के घर में बनाया अनोखा ‘मिलेट बैंक

मध्य प्रदेश के जनजातीय बहुल डिंडोरी जिले के सिलपड़ी गांव की रहने वाली 31 वर्षीय लहरी बाई आज देशभर में मिलेट संरक्षण की मिसाल बन चुकी हैं. बैगा जनजाति से आने वाली लहरी ने अपना पूरा जीवन उन देशी बीजों को बचाने में लगा दिया, जो धीरे-धीरे खेतों और लोगों की यादों से गायब होते जा रहे थे.

उन्होंने अपने छोटे से कच्चे घर को ही ‘बीज बैंक’ में बदल दिया है, जहां 150 से अधिक दुर्लभ और विलुप्त होती मिलेट प्रजातियों के बीज सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें कई ऐसे बीज भी हैं, जिन्हें पहचानने वाले लोग अब बहुत कम बचे हैं.

मिट्टी की कोठियों में सहेजा 150 से ज्यादा दुर्लभ बीजों का खजाना

लहरी बाई पारंपरिक मिट्टी के बने तीन कमरों के घर में अपने माता-पिता के साथ रहती हैं. एक कमरे में परिवार रहता है, दूसरे में घरेलू सामान रखा जाता है, जबकि तीसरा कमरा पूरी तरह बीज बैंक के रूप में इस्तेमाल होता है.

बीजों को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने मिट्टी की बड़ी-बड़ी कोठियां बनाई हैं. इन्हीं में कोदो, कुटकी, सांवा, चेना, सलहार, सिकिया समेत 150 से ज्यादा देशी मिलेट किस्मों को संरक्षित किया गया है.

गांव-गांव जाकर किसानों को बांटती हैं बीज

लहरी बाई सिर्फ बीजों को सहेज नहीं रहीं, बल्कि उन्हें दोबारा खेतों तक पहुंचाने का भी काम कर रही हैं. वह आसपास के 25 गांवों के किसानों को मुफ्त में बीज देती हैं और फसल तैयार होने के बाद उतनी ही मात्रा में बीज वापस ले लेती हैं.

इस अनोखे मॉडल से हर सीजन में दुर्लभ बीजों को नया जीवन मिल रहा है. अब तक 500 से ज्यादा किसान उनके बीज बैंक से जुड़ चुके हैं.

दादी की सीख ने बदल दी जिंदगी

लहरी बताती हैं कि बचपन में उनकी दादी ने उन्हें मोटे अनाजों के फायदे और उनकी अहमियत के बारे में बताया था. वहीं से उनके मन में देशी बीजों को बचाने का विचार आया.

शुरुआत में गांव के लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. धीरे-धीरे उनका काम पहचान बनने लगा और आज वही लोग उनके प्रयासों की सराहना करते हैं.

मजदूरी कर चलाती हैं घर, बीज संरक्षण के लिए नहीं की शादी 

बीज संरक्षण का यह काम लहरी बाई किसी कमाई के लिए नहीं करतीं.परिवार चलाने के लिए वह मजदूरी करती हैं और जंगल से मिलने वाले उत्पाद बेचती हैं. सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने मिशन को कभी नहीं छोड़ा. उन्होंने माता-पिता की सेवा और बीज संरक्षण करने के लिए पूरे जीवन को ही समर्पित कर दिया. आज वह 31 साल की है लेकिन उन्होंने शादी करने का ख्याल पूरी तरह से त्याग दिया है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने किया सम्मानित

लहरी बाई के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है.राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें श्रीअन्न प्रजातियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए वर्ष 2021-22 का ‘पादप जीनोम संरक्षक किसान सम्मान’ प्रदान किया. इसके अलावा, उन्हें डिंडोरी जिले का मिलेट ब्रांड एंबेसडर भी बनाया गया है.

लहरी का सपना — फिर लौटें देशी अनाज खेतों में

लहरी बाई ने किसान तक को बताया कि वे चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ियां देशी श्रीअन्न और उनकी पारंपरिक खेती को भूलें नहीं. उनका सपना है कि गांव-गांव तक फिर से कोदो, कुटकी और दूसरे दुर्लभ मिलेट बीज पहुंचें और किसान एक बार फिर इन पौष्टिक अनाजों की खेती करें. आज उनकी इस मुहिम की मदद से पूरे डिंडोरी जिले में पूरे प्रदेश का 60% से अधिक श्रीअन्न का उत्पादन हो रहा है.

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