क्यों गिर गया है मक्के का दाम? सरकार कहती है- "किसान को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाएंगे." सरकार ही कहती है- "धान छोड़ो, मक्का उगाओ." लेकिन जब किसान ने यह बात मानकर मक्के का रिकॉर्ड उत्पादन कर दिया, तो सरकार ने उसे अपनी नीतियों के चक्रव्यूह में ऐसा फंसा दिया कि आज वो रोने को मजबूर है. केंद्र ने 13 मई को साल 2026-27 के लिए खरीफ फसलों की नई एमएसपी (MSP) घोषित की, जिसने मक्का और मूंग उगाने वाले किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया. खुद कृषि मंत्रालय के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि इस साल मक्के की उत्पादन लागत में 36 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सरकार ने एमएसपी में महज 10 रुपये की नाममात्र बढ़ोतरी की. यह कोई सामान्य उपेक्षा नहीं, बल्कि मक्का किसानों पर 'ट्रिपल अटैक' है.
सरकारी मंचों से 'अन्नदाता को ऊर्जादाता' बनाने और 'क्रॉप डायवर्सिफिकेशन' के जो सब्जबाग दिखाए गए थे, वे आज देश की अनाज मंडियों में दम तोड़ चुके हैं. कृषि मामलों के जानकार साफ कह रहे हैं कि इस खेल के पीछे इथेनॉल और पोल्ट्री लॉबी का तगड़ा दबाव है. ये बड़ी लॉबियां चाहती हैं कि बाजार में मक्के का भाव हमेशा गिरा रहे, ताकि उन्हें फैक्ट्रियों के लिए कौड़ियों के भाव माल मिलता रहे और उनका मुनाफा करोड़ों में चमके.
सरकार ने एमएसपी में सिर्फ 10 रुपये बढ़ाकर यह पक्का कर दिया है कि ओपन मार्केट कभी ऊपर न उठ पाए और उद्योगपतियों को सस्ता माल मिलता रहे. इस नीतिगत खेल को समझने के लिए आंकड़ों की यह सीधी तुलना देखिए. एक तरफ देश का वह किसान है जिसकी लागत लगातार बढ़ रही है और दूसरी तरफ वे इथेनॉल कंपनियां हैं जिनका मुनाफा सरकारी मेहरबानी से आसमान छू रहा है. बहरहाल, ट्रिपल अटैक पर बात कर लेते हैं.
पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की जिद में सरकार ने ढिंढोरा पीटा कि मक्का उगाओ, देश का भविष्य बदलो. अप्रैल 2023 में फिक्की (FICCI) के एक कार्यक्रम में तत्कालीन कृषि सचिव मनोज आहूजा ने कहा था कि देश में इथेनॉल और पोल्ट्री उद्योग की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अगले 5 वर्षों में मक्के के उत्पादन में 10 मिलियन टन की वृद्धि करनी होगी.
उत्पादन को तत्कालीन 34 मिलियन टन से बढ़ाकर 44-45 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया था. इसके बाद 2024-25 में देश का कुल मक्का उत्पादन बढ़कर 43.4 मिलियन टन (434 लाख टन) तक पहुंच गया. यानी किसान सरकार की बातों में आ गया और रिकॉर्ड तोड़ मक्का पैदा कर दिया. लेकिन जैसे ही फसल बाजार में आई, सरकार ने पैंतरा बदल लिया.
इथेनॉल बनाने के लिए सरकारी चावल (FCI Rice) का कोटा दोबारा खोल दिया गया. उसका कोटा बढ़ाकर 52 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया. वो भी बहुत सस्ते दाम पर. इसलिए फैक्ट्रियों ने मक्का पूछना बंद कर दिया. इसलिए मक्का उगाने वाले किसान पिछले एक साल से मंडियों में 1200 से 1600 रुपये प्रति क्विंटल के औसत दाम पर अपना मक्का बेचने को मजबूर है.
जब देश का किसान मक्का उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुका है, तो फिर सरकार ने करीब 9.7 लाख टन मक्का विदेशों से क्यों मंगाया? यह सीधा-सीधा देश के किसान की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है. पोल्ट्री लॉबी के दबाव में आकर सरकार ने विदेशों से सस्ता मक्का मंगवाने की छूट दे दी. इस विदेशी मक्के ने घरेलू बाजार में देसी मक्के के दाम उठने ही नहीं दिए. बड़े-बड़े कॉरपोरेट पोल्ट्री हाउसों को सस्ता कच्चा माल दिलाने के लिए देश के छोटे किसानों की कमर तोड़ दी गई.
कृषि मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, ए2+एफएल (A2+FL) फॉर्मूले के आधार पर मक्के की प्रति क्विंटल उत्पादन लागत साल 2025-26 के 1,508 से बढ़कर साल 2026-27 में 1,544 रुपये हो गई है. यानी 36 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा खुद सरकार ही मान रही है. जबकि इसके मुकाबले सरकार ने इसके न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में महज 10 रुपये की बढ़ोतरी करते हुए इसे 2,400 से बढ़ाकर 2,410 प्रति क्विंटल तय किया है.
डीजल, बीज, खाद और कीटनाशकों के आसमान छूते दामों के बीच जब खुद सरकार मान रही है कि मक्के की खेती पर किसान की जेब से प्रति क्विंटल 36 रुपये ज्यादा खर्च हुए हैं, तब न्यूनतम समर्थन मूल्य को सिर्फ 10 रुपये बढ़ाना किसानों की बदहाली पर अट्टहास करने जैसा है.
यह सीधे तौर पर किसानों को आधिकारिक रूप से घाटा सहने और कर्ज के दलदल में डूबने का सरकारी फरमान लगता है. लेकिन, सवाल है कि सिर्फ 10 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि किसके दबाव या किसके हितों को पूरा करने के लिए की गई? इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों के या फिर पोल्ट्री इंडस्ट्री के. बहरहाल, अगर यही हाल रहा तो कल को किसान मक्का उगाना बंद कर देगा.
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