सरकार ने कहा है कि खरीफ सीजन में खाद की कमी नहीं होगीउर्वरकों की उपलब्धता को लेकर सरकार ने एक बार फिर किसानों को भरोसा दिलाया है कि आगामी खरीफ सीजन में खाद की कोई कमी नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा है कि इस साल अनुमानित 390 लाख टन खाद की मांग को पूरा कर लिया जाएगा, क्योंकि घरेलू उत्पादन और आयात दोनों में सुधार हुआ है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस समय देश में कुल उर्वरक स्टॉक 180 लाख टन से अधिक है, जो पिछले साल इसी अवधि के 147 लाख टन के मुकाबले काफी ज्यादा है. पिछले खरीफ सीजन में कुल 361 लाख टन उर्वरकों की वास्तविक बिक्री दर्ज की गई थी, जिससे इस साल की मांग का आधार भी मजबूत दिख रहा है.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस शर्मा ने बताया कि मौजूदा स्टॉक में 62 लाख टन यूरिया, 23.4 लाख टन डीएपी, 12.7 लाख टन एमओपी और 86.8 लाख टन कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर शामिल हैं. उन्होंने कहा कि अप्रैल-मई के कम मांग वाले समय का इस्तेमाल भंडारण बढ़ाने के लिए किया जाएगा, ताकि पीक सीजन में कोई कमी न रहे.
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने उर्वरक संयंत्रों को गैस आपूर्ति बढ़ाने के बाद उत्पादन में सुधार दर्ज किया है. फिलहाल 30 में से 27 यूरिया प्लांट चालू हैं और गैस सप्लाई पहले के 60 फीसदी से बढ़कर करीब 80 फीसदी तक पहुंच गई है. संघर्ष के कारण जहां पहले रोजाना उत्पादन में 30-35 हजार टन की गिरावट आई थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब 67 हजार टन प्रतिदिन हो गया है, हालांकि यह अभी भी सामान्य 80 हजार टन से थोड़ा कम है.
सरकार के अनुसार, भारत के डीएपी और यूरिया आयात का करीब 30-30 फीसदी हिस्सा खाड़ी देशों से आता है, जबकि एलएनजी का 50 फीसदी भी इसी क्षेत्र से आता है, जो नाइट्रोजन उर्वरकों के लिए जरूरी कच्चा माल है. ऐसे में सरकार ने मोरक्को, रूस जैसे देशों से कच्चा माल मंगाने के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो जैसे देशों के साथ नए समझौते की दिशा में बातचीत तेज की है.
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, यूरिया प्लांट्स की कुल एलएनजी मांग करीब 52 एमएमएससीएमडी है, जबकि फिलहाल उन्हें करीब 32 एमएमएससीएमडी गैस मिल रही थी, जो जरूरत का 62 फीसदी है. हालांकि, सरकार ने 18 से 31 मार्च के बीच स्पॉट खरीद के जरिए 7.31 एमएमएससीएमडी गैस जुटाई, जिससे सप्लाई बढ़कर 39.31 एमएमएससीएमडी तक पहुंच गई है. सरकार ने राज्यों को सलाह दी है कि डीएपी पर दबाव कम करने के लिए एसएसपी और टीएसपी जैसे विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. इससे आपूर्ति संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी.
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